12 साल में लोकतंत्र और संस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा: Sonia Gandhi

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कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि पिछले 12 वर्षों में भारत के सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को गहरा आघात पहुंचा है। अपनी आगामी पुस्तक के विमोचन से पहले एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के हटने के बाद भी व्यवस्था को पटरी पर लाने में वक्त लगेगा। उन्होंने मुख्यधारा के मीडिया और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण का दावा भी किया।

(फाइल फोटो के साथ) नयी दिल्ली, सात नवंबर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि पिछले 12 वर्षों में भारत के सामाजिक ताने-बाने, लोकतंत्र और संस्थाओं को ‘‘भारी नुकसान’’ पहुंचा है तथा मोदी सरकार के सत्ता से हटने के बाद भी देश की व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने में समय लगेगा। अपनी पुस्तक बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव के विमोचन से पहले अंग्रेजी दैनिक अखबार द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि अब लोग देश को हुए नुकसान को महसूस करने लगे हैं और मौजूदा स्थिति को लेकर उनकी बेचैनी बढ़ रही है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ‘‘लेकिन मैं आशावादी हूं और मुझे विश्वास है कि भारत के लोग सुशासन की वापसी का स्वागत करेंगे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘पिछले 12 वर्षों में हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने, लोकतंत्र और संस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा है।

इस सरकार के सत्ता से जाने के बाद भी हमारी व्यवस्थाओं को पहले की तरह फिर से बेहतर और मजबूत बनाने में समय लगेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को भी काफी प्रयास करने होंगे।’’ कांग्रेस के कमजोर होते जनाधार और पार्टी की मौजूदा स्थिति तथा भविष्य की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर गांधी ने कहा, ‘‘मैं इतनी निराशावादी नहीं हूं। इस बात पर गौर कीजिए कि इस सरकार के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिले हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘सभी संस्थाओं पर सरकार की पूरी पकड़ है, खासकर निर्वाचन आयोग पर।

मुख्यधारा के मीडिया पर उसका नियंत्रण है, उसके पास अकूत धनबल है और वह धर्म का इस्तेमाल भी अपने हित में करती है।’’ गांधी ने कहा, ‘‘इसके बावजूद हमारी पार्टी संघर्ष कर रही है और आगे बढ़ रही है। वास्तव में, हमारी पार्टी ही ऐसी है जिसने इस हमले का मजबूती से सामना करने का दमखम दिखाया है।’’ उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं को ‘‘हर तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसके बावजूद हर गांव और हर जिले में कांग्रेस के कार्यकर्ता संविधान में निहित मूल्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’’ कांग्रेस की वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया, ‘‘इसके अलावा, हाल के महीनों में यह बात पर्याप्त रूप से साबित हुई है कि कई चुनावों में धांधली हुई है और लोगों को अब इसकी जानकारी होने लगी है।’’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और पार्टी की संभावनाएं दिन-ब-दिन बेहतर हो रही हैं। हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव एक निजी संस्मरण है, जिसमें राजनीति को उन्होंने पृष्ठभूमि या उनके शब्दों में कहें तो एक तरह के ढांचे के रूप में रखा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके राजनीतिक उभार से कांग्रेस को क्या सबक लेना चाहिए, इस सवाल पर गांधी ने कहा, ‘‘यह सच है कि वह बिल्कुल अलग वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन कांग्रेस पार्टी में भी लोगों के राजनीति में सफल होने के कई रास्ते हैं। उदाहरण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को देख सकते हैं।

मुझे नहीं लगता कि हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से कुछ सीखने की जरूरत है।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें कभी इस बात का ख्याल आता है कि अगर उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की नीतियां और कांग्रेस की रणनीति कैसी होतीं, इस पर गांधी ने कहा, ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। यह विचार कभी मेरे मन में नहीं आया। हमारा अनुभव कुल मिलाकर काफी सकारात्मक रहा।

हमने एक टीम के रूप में काम किया और हम दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग थीं। वह (मनमोहन सिंह) सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और मैं पार्टी का।’’ पिछले महीने सोनिया गांधी ने कहा था कि दूसरे लोग दशकों से उनकी कहानी बताते रहे हैं और अब अपनी कहानी बताने की बारी उनकी है। उन्होंने यह भी कहा था कि 10 नवंबर को उनके संस्मरण के प्रकाशित होने पर कुछ तमाशा होना तय है।

हार्पर कॉलिन्स इंडिया 10 नवंबर को गांधी का 544 पन्नों का संस्मरण बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव भारत में प्रकाशित करेगा। इसके साथ ही देश में इस पुस्तक के प्रकाशन को लेकर बना असमंजस भी खत्म हो जाएगा। इससे पहले लेखिका के प्रतिनिधियों और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (पीआरएचआई) के बीच गतिरोध के कारण पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी।

शुरुआत में इस संस्मरण को प्रकाशित करने की इच्छुक पीआरएचआई ने बाद में स्पष्ट कर दिया था कि वह भारत में इसकी प्रकाशक नहीं होगी। यह विवाद पांडुलिपि में संपादकीय बदलावों को लेकर प्रकाशक और लेखिका के प्रतिनिधियों के बीच मतभेद की खबरों के बाद शुरू हुआ था। कांग्रेस के कई नेताओं ने इस मामले में सरकारी दबाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया था।

कुछ नेताओं ने आरोप लगाया था कि पेंगुइन इंडिया पर दबाव डाला गया कि वह पुस्तक से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, आरएसएस और मोदी सरकार के कार्यकाल में चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र पर किए गए ‘‘कब्जे’’ से जुड़े अंश हटा दे। पीआरएचआई ने सफाई दी थी कि वह इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए वास्तव में बेहद उत्सुक थी और उसने इसे हासिल करने के लिए काफी प्रयास किए थे, लेकिन अंततः एक खास मुद्दे पर गतिरोध के कारण पीछे हटने का फैसला किया। प्रकाशक ने यह भी कहा था कि उस पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव नहीं था।

हालांकि, उसने गोपनीयता संबंधी शर्तों और लेखिका के साथ हुए समझौते का हवाला देते हुए गतिरोध की वास्तविक वजह बताने से इनकार कर दिया था। सोनिया गांधी के संस्मरण बिलॉन्गिंग की शुरुआत इटली के वेनेटो क्षेत्र में युद्ध के बाद के दौर में उनके बचपन से होती है। इसमें कैम्ब्रिज तक के उनके सफर का भी जिक्र है, जहां 1965 में उनकी मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी।

इस संस्मरण में राजीव गांधी से उनकी शादी और उनकी सास तथा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात का विवरण भी है। इसमें भारत में खुद को ढालने के उनके प्रयासों का जिक्र किया गया है, जिसमें हिंदी सीखना, साड़ी पहनना और भारतीय खानपान तथा संस्कृति को अपनाना शामिल है। पुस्तक में गांधी परिवार को झकझोर देने वाली प्रमुख त्रासदियों का भी उल्लेख है।

इनमें संजय गांधी की विमान हादसे में मौत, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और 1991 में राजीव गांधी की हत्या शामिल हैं। इस संस्मरण में 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत से जुड़ी राजनीतिक घटनाओं का भी विस्तार से जिक्र किया गया है। उस चुनाव में जीत के बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय पार्टी तथा गठबंधन का नेतृत्व किया था।

उनके नेतृत्व वाला गठबंधन अगले 10 वर्षों तक देश की सत्ता में रहा।

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