मिड टर्म चुनाव में हारते ही महाभियोग में फंसे! ट्रंप कितने कमजोर हो जाएंगे? डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा या बड़ा नुकसान

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अभिनय आकाश । Nov 4 2026 2:07PM

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी के पिछड़ने से डोनाल्ड ट्रंप के सामने महाभियोग और विधायी रुकावटों जैसी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। हालांकि ट्रंप ने खुद उम्मीदवार न होने की दलील देकर पल्ला झाड़ा है। संसद में डेमोक्रेट्स के बढ़ते प्रभाव से अब ट्रंप के लिए कानून बनाना, बजट पास कराना और नियुक्तियां करना काफी मुश्किल होगा।

अमेरिका में ट्रंप की सबसे बड़ी हार। वो ट्रंप जो कि मोदी को हराने की उनके राजनीतिक करियर को खत्म करने की बात करते थे। कमला हैरिस ने तंज कसा। भारतीय मूल के नेताओं ने जमकर अमेरिकी चुनाव में धमाल मचाया है। सोचिए जिस नेता ने पूरी दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराने की बार-बार कोशिश की हो या धमकाया हो। जिस नेता ने चुनावी रैलियों में दावा किया कि अमेरिका की जनता उसके साथ खड़ी है। आज उसी नेता को अपनी ही पार्टी की चुनावी हार पर सफाई देनी पड़ रही है। अमेरिका से मिड टर्म चुनाव के जो शुरुआती नतीजे सामने आने लगे उन्होंने वाइट हाउस से लेकर अमेरिकी संसद तक हलचल मचा दी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पिछड़ती दिखाई दे रही है और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में बढ़त बनाती नजर आ रही या यह कह सकते हैं कि ट्रंप की हार हो चुकी है। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात ट्रंप का वो बयान है जिसमें उन्होंने खुद कहा कि अगर मैं खुद चुनाव लड़ रहा होता तो हम भारी बहुमत से जीतते। यानी वह कह रहे हैं कि मैं खुद चुनाव नहीं लड़ रहा था। अब सवाल है कि अगर ट्रंप इतने ही लोकप्रिय हैं तो उनकी पार्टी के उम्मीदवार पीछे क्यों रह गए? क्या अमेरिकी जनता ने ट्रंप की नीतियों को नकारना शुरू कर दिया है? क्या महंगाई और अर्थव्यवस्था के मुद्दे ने राष्ट्रपति की मुश्किलें बढ़ा दी हैं? और क्या अब डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर महाभियोग का खतरा मडराने वाला है? अमेरिका के चुनावी नतीजों के पीछे की पूरी राजनैतिक कहानी क्या है और आने वाले दिनों में ट्रंप के सामने कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। आज का एमआरआई इसी पर करेंगे।

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चुनावी हार पर ट्रंप की सफाई

ट्रंप की पार्टी को झटका लेकिन राष्ट्रपति की सफाई पहले से आ गई। अमेरिका में मंगलवार को मिड टर्म चुनाव संपन्न हुए। इन चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हुआ। इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव कराए गए।सीनेट में भी डेमोक्रेट्स की स्थिति बहुत मजबूत दिखाई दी। यानी जिस अमेरिकी संसद में ट्रंप अपनी पार्टी के समर्थन के सहारे बड़े फैसले लेने की उम्मीद कर रहे थे, वहां अब विपक्ष की ताकत बढ़ती हुई नजर आई। और इसी बीच ट्रंप ने ऐसा बयान दिया जिसने इस चुनाव को और ज्यादा दिलचस्प बना दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि वह खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे। अगर वह उम्मीदवार होते तो उनकी पार्टी बहुत बड़े अंतर से जीतती। अब जरा इस बयान के राजनीतिक मायने समझिए। चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे थे। वह लोगों से कह रहे थे कि उम्मीदवारों को वोट देते समय उन्हें यानी ट्रंप को ध्यान में रखें। लेकिन जैसे ही नतीजों में पार्टी पिछड़ती दिखाई दी ट्रंप ने सफाई देना शुरू कर दिया कि वह खुद बैलेट पर मौजूद नहीं थे। दूसरी तरफ न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वह चुनावी नतीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं और डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करने की उम्मीद रखते हैं। यानी एक तरफ चुनावी हार की जिम्मेदारी से दूरी बनाने वाला बयान और दूसरी तरफ विपक्ष के साथ काम करने की बात।

पांच बड़े राजनैतिक संकट
महाभियोग की तलवार


ट्रंप के सामने पहला और सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा महाभियोग यानी इंपीचमेंट हो सकता है। अमेरिका के या अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की शक्ति प्रतिनिधि सभा के पास होती है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेती है तो उसके पास ट्रंप प्रशासन के फैसलों को और उसकी नीतियों की जांच करने को महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को एक अवसर मिल सकता है। और यहां एक दिलचस्प बात है डॉनल्ड ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में भी दो बार महाभियोग का सामना कर चुके हैं। ऐसे में अगर दूसरे कार्यकाल में भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होती है तो यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है। हालांकि महाभियोग प्रस्ताव पास होने का मतलब राष्ट्रपति को तुरंत पद से हटाना नहीं होता। राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सेनेट में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होना भी किसी राष्ट्रपति के लिए छोटी बात नहीं है। इसका मतलब होगा कि ट्रंप को अपने प्रशासन का बचाव करना पड़ेगा। विपक्ष के सवालों का जवाब देना पड़ेगा और राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी लड़ाई में खर्च करना पड़ सकता है। यानी जिस राष्ट्रपति का एजेंडा देश की नीतियों को बदलने का हो उसे अपने कार्यकाल की राजनीतिक बचाव में बिताना पड़ सकता है।  

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ट्रंप के कानून और वादे अटक सकते हैं


अब बात करते हैं उस दूसरे खतरे की। मान लीजिए कि ट्रंप कोई बड़ा कानून बनाना चाहते हैं। टैक्स में कटौती करना है, आवरजन नियमों को सख्त करना है या अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव लाना है। लेकिन अगर संसद के एक या दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण हो गया तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को लागू करना काफी मुश्किल होगा। अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था चेक एंड बैलेंस के सिद्धांत पर काम करती है। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति के पास असीमित अधिकार नहीं होते। संसद की मंजूरी भी कई बड़े फैसलों के लिए जरूरी होती है। अगर विपक्षी पार्टी संसद में मजबूत हो जाती है तो वह ट्रंप के प्रस्तावित कानूनों को रोक सकती है। उनमें बदलाव की मांग कर सकती है या उन्हें मंजूरी देने में देरी कर सकती है। इसी स्थिति को राजनीतिक भाषा में ग्रिड ललॉक कहा जाता है। यानी सरकार और संसद के बीच ऐसा गतिरोध जिसमें बड़े फैसले आगे नहीं बढ़ पाते और इसका सीधा असर ट्रंप के राजनैतिक एजेंडे पर पड़ सकता है।

नियुक्तियों में आ सकती हैं रुकावटें


सीनेट वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, राजदूतों और संघीय न्यायाधीशों (जिनमें सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोग भी शामिल हैं) की नियुक्ति की पुष्टि करती है। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली सीनेट ट्रम्प द्वारा नामित लोगों की पुष्टि में देरी कर सकती है या उन्हें खारिज कर सकती है। इससे ट्रम्प के लिए अहम पदों को भरना और न्यायपालिका को अपनी पसंद के अनुसार ढालना मुश्किल हो जाएगा। ट्रम्प द्वारा पहले सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोगों को रिपब्लिकन पार्टी (GOP) के नियंत्रण वाली सीनेट ने मंजूरी दी थी। असल में हाल के सभी सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की पुष्टि उस सीनेट ने की है, जिस पर उसी पार्टी का नियंत्रण था जिससे राष्ट्रपति जुड़े थे। पिछली बार जब विपक्षी दल के नियंत्रण वाली सीनेट ने किसी उम्मीदवार को मंजूरी दी थी, तो वह 1991 की बात है।

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बजट की लड़ाई


अमेरिका में सरकारी खर्च पर कांग्रेस का नियंत्रण होता है। डेमोक्रेट्स, ट्रंप की प्राथमिकताओं के लिए फंडिंग को मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं। इससे बजट को लेकर लंबी बातचीत शुरू हो सकती है और नौबत सरकारी कामकाज ठप होने (गवर्नमेंट शटडाउन) तक भी आ सकती है। ऐसी स्थिति में जिस पार्टी के पास व्हाइट हाउस का नियंत्रण नहीं होता, वह अक्सर अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करती है, जिसमें 'डेट-सीलिंग' (कर्ज की सीमा) बढ़ाने जैसी बातें शामिल हैं ताकि वह बहुमत वाली पार्टी से अपनी शर्तें मनवा सके।

ट्रंप के पास अब भी कौन सी शक्तियां बची रहेंगी?

संसद (कांग्रेस) के समर्थन के बिना भी अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्तियां मौजूद रहेंगी। वे कांग्रेस की विधायी मंजूरी के बिना भी कई बड़े नीतिगत फैसले कार्यकारी आदेशों (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स) के जरिए ले सकते हैं। ट्रंप ने इन शक्तियों का इस्तेमाल ईरान पर सैन्य हमलों के आदेश देने, टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने, बड़ी संख्या में संघीय कर्मचारियों को बर्खास्त करने और अमेरिका को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) व 2015 के पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकालने के लिए किया है। लिहाजा, कांग्रेस पर नियंत्रण खोने से ट्रंप की ये कार्यकारी शक्तियां खत्म नहीं होंगी। हालांकि, कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से ट्रंप के लिए अपनी शर्तों पर सरकार चलाना निश्चित रूप से पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। ट्रंप के कार्यकाल के आधे पड़ाव पर अमेरिकी जनता ने अपना जनादेश दे दिया है। क्या ट्रंप इस संदेश को सुनेंगे?

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