बढ़ तो रही है मगर बूढ़ी हो रही है भारत की आबादी! Supreme Court के फैसले से देश के सामने उभरी नई चिंता

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की अगुवाई में महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले के मामले की सुनवाई करते हुए 2003 के ऐतिहासिक जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था।
भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी एक बड़ा झटका है। जिस देश में बढ़ती आबादी को सबसे बड़ी चुनौती बताकर दो बच्चों की नीति लागू करने की मांग जोर-शोर से उठाई जा रही थी, उसी देश में अब प्रजनन दर (Total Fertility Rate यानी TFR) इतनी नीचे पहुंच चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट को दो बच्चों से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठाना पड़ा है। हम आपको बता दें कि 4 नवंबर को आए फैसले में अदालत ने साफ कहा है कि दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। यह टिप्पणी केवल किसी एक राज्य के पंचायत चुनाव या किसी एक महिला की चुनावी पात्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के बदलते जनसांख्यिकीय भविष्य की तरफ एक बड़ा संकेत है।
हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की अगुवाई में महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले के मामले की सुनवाई करते हुए 2003 के ऐतिहासिक जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। उस समय अदालत ने दो बच्चों से अधिक संतान होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले हरियाणा के कानून को वैध ठहराया था। लेकिन अब अदालत के सामने तस्वीर बदल चुकी है। वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर 3.02 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 रह गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है, यानी वह स्तर जिस पर एक पीढ़ी अपनी संख्या अगली पीढ़ी में बनाए रख सकती है। भारत इस सीमा से नीचे जा चुका है।
जनसंख्या का आंकड़ा बड़ा, लेकिन परिवार छोटे हो रहे हैं
देखा जाये तो इस पूरे मामले को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत की कुल आबादी अभी भी बढ़ रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय परिवारों में बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। देश की आबादी में वृद्धि का एक बड़ा कारण Demographic Momentum है। यानी पहले के दशकों में पैदा हुई बड़ी आबादी अब युवा और प्रजनन योग्य आयु में है। इसलिए प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या घटने के बावजूद कुल जन्म और आबादी में वृद्धि जारी रह सकती है। यही वह तथ्य है जिसे जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वाली बहस अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 1971 से 2024 के बीच प्रजनन दर में आई गिरावट का भी उल्लेख है। इस अवधि में TFR 5.2 से घटकर 1.9 हो गई। NFHS-5 के आंकड़ों में भी 2019-21 के दौरान यह दर 2.0 दर्ज की गई थी। अदालत ने 2024 के लिए NFHS-6 के आंकड़ों का हवाला देते हुए लगभग 2.0 का उल्लेख किया है। यानी भारत में छोटा परिवार अब केवल सरकारी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता बन चुका है।
हालांकि इस राष्ट्रीय औसत के पीछे क्षेत्रीय असमानताएं भी हैं। बिहार में TFR 3.0, उत्तर प्रदेश में 2.4 और मेघालय में 2.9 दर्ज की गई थी, जबकि दिल्ली में 1.6, पश्चिम बंगाल में 1.6 और महाराष्ट्र में 1.7 थी। ये NFHS-5 के राज्यवार आंकड़े हैं। इसका मतलब है कि पूरे देश पर एक समान दो बच्चों का कानूनी प्रतिबंध थोपने का आधार और भी कमजोर पड़ता है। देश के अलग-अलग राज्यों की जनसांख्यिकीय परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।
दो बच्चे की नीति से आगे बढ़ चुकी है भारत की तस्वीर
देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू उठाया है। दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का कानून केवल जनसंख्या नियंत्रण का मामला नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा है। महाराष्ट्र की मंगला भीमराव इंगले को तीसरी संतान होने के कारण सरपंच पद के लिए अयोग्य ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की योग्यता का उसके बच्चों की संख्या से सीधा संबंध नहीं है। ऐसे प्रतिबंध महिलाओं को प्रजनन संबंधी फैसले और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करते हैं।
भारत के सामने अब बढ़ती आबादी नहीं, बूढ़ी होती आबादी की चुनौती
साथ ही इस फैसले का सबसे गंभीर पहलू देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने जापान और चीन के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि कम प्रजनन दर के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। चीन ने पहले एक बच्चे की नीति अपनाई, लेकिन बाद में दो और फिर तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। इसके बावजूद वहां जन्म दर में अपेक्षित उछाल नहीं आया। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अदालत के मुताबिक देश में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 2014 के 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 9.7 प्रतिशत हो गई है और 2036 तक इसके करीब 15 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है। इससे कामकाजी आबादी का अनुपात घटने, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ने का खतरा है।
यही वह बिंदु है जहां जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग और वास्तविक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के बीच टकराव दिखाई देता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी रही है। यही आबादी उद्योग, सेना, कृषि, सेवा क्षेत्र और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था को गति देती है। लेकिन यदि आने वाले दशकों में युवाओं का अनुपात तेजी से घटता है तो भारत के सामने श्रमशक्ति की कमी और बुजुर्गों की बढ़ती निर्भरता जैसी चुनौतियां खड़ी होंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनसंख्या संबंधी नीति का आधार अब बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने यहां तक कहा कि पहले जिस अधिक आबादी को विकास में बाधा माना जाता था, आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और स्वस्थ जनसंख्या वृद्धि की जरूरत पर भी ध्यान देना होगा।
बहरहाल, अदालत का यह फैसला भारत की जनसंख्या बहस में एक निर्णायक मोड़ है। देश की आबादी का विशाल होना और देश की प्रजनन दर का कम होना दो अलग-अलग तथ्य हैं। इन्हें एक ही नजरिये से देखना भविष्य की बड़ी गलती साबित हो सकता है। दो बच्चों की अनिवार्यता और तीसरी संतान पर राजनीतिक अधिकार छीनने जैसी व्यवस्थाओं के औचित्य पर अब सुप्रीम कोर्ट ने ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कानून बनाने की मांग करने वालों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब देश प्रतिस्थापन प्रजनन दर से नीचे जा चुका है, तब और अधिक प्रतिबंधों की मांग आखिर किस जनसांख्यिकीय वास्तविकता पर आधारित है?
-नीरज कुमार दुबे
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