कन्हैयालाल हत्याकांड: Rajasthan High Court ने 8 आरोपियों पर तय NIA कोर्ट के आरोप बरकरार रखे

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राजस्थान उच्च न्यायालय ने उदयपुर के चर्चित कन्हैयालाल हत्याकांड के आठों आरोपियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। मुख्य न्यायाधीश संजय के अग्रवाल और न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने विशेष एनआईए अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों में हस्तक्षेप से इनकार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक साजिश को साबित करने के लिए प्रत्यक्ष गवाह न होना आरोपियों को राहत देने का आधार नहीं है।

जयपुर, छह नवंबर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कन्हैया लाल हत्याकांड के आठ आरोपियों की ओर से दायर अपीलें खारिज कर दीं और विशेष एनआईए अदालत की ओर से उन पर लगाए गए आरोपों को बरकरार रखा। मुख्य न्यायाधीश संजय के अग्रवाल और न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ ने 12 जनवरी और 13 फरवरी, 2024 को विशेष अदालत की ओर से दिए गए आदेशों को सही ठहराया। पीठ ने कहा कि आरोप तय करने के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

आरोपियों मोहम्मद रियाज अत्तारी, मोहम्मद गौस, मोहसिन खान, आसिफ हुसैन, मोहम्मद मोहसिन, वसीम अली, मोहम्मद जावेद खान और मुस्लिम खान पर गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 16, 18 और 20 के अलावा भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। उल्लेखनीय है कि 28 जून, 2022 को उदयपुर में दर्जी कन्हैया लाल की उनकी दुकान पर धारदार हथियार से हमला कर हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने हत्या का वीडियो भी बनाया था, जिसके बाद देशभर में आक्रोश फैल गया था।

उच्च न्यायालय ने कहा कि साजिश के संबंध में प्रत्यक्ष सबूत या चश्मदीद गवाह का न होना किसी आरोपी को आरोपों से मुक्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर भी साबित किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि आरोप तय करने का फैसला करते समय अदालत रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सबूतों के संयुक्त प्रभाव पर विचार कर सकती है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत के लिए किसी आरोपी को दोषी या निर्दोष घोषित करना जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि मुकदमे के दौरान गवाहों के बयानों और उनकी विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से जांच की जाएगी। आरोपियों ने कई आधारों पर आरोपों को चुनौती दी थी, जिनमें कथित वीडियो और उनके नाम से दी गई ऑनलाइन धमकियां भी शामिल थीं।

उन्होंने यूएपीए के प्रावधानों को लागू किए जाने पर भी सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि किसी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से उनका संबंध साबित करने वाला कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

इस फैसले के बाद आठों आरोपियों के खिलाफ विशेष एनआईए अदालत में मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ सकेगी।

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