Gyan Ganga: देवताओं का वानर रूप में अवतार और अयोध्या में श्रीराम जन्म की तैयारी

Lord Rama
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सुखी भारती । Nov 5 2026 4:19PM

राजा दशरथ की अनेक रानियाँ थीं। उनमें माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा प्रमुख थीं। सभी रानियाँ सदाचारिणी थीं और भगवान के चरणों में श्रद्धा रखती थीं। राजमहल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी संतान के अभाव में राजा का मन कभी-कभी अत्यंत व्याकुल हो उठता था।

पिछले प्रसंग में हमने देखा कि रावण के अत्याचारों से व्याकुल होकर पृथ्वी ने गौ का रूप धारण किया और देवताओं तथा मुनियों के साथ ब्रह्माजी की शरण ली। ब्रह्माजी ने सबको धैर्य रखने का आश्वासन दिया और भगवान श्रीहरि का स्मरण करने के लिए कहा। तब आकाशवाणी के माध्यम से भगवान ने आश्वासन दिया कि वे सूर्यवंश में मनुष्य रूप धारण करके पृथ्वी का भार दूर करेंगे।

भगवान की इस घोषणा को सुनकर देवताओं के हृदय में आशा का संचार हुआ। अब उन्हें विश्वास हो गया कि रावण के अत्याचारों से संसार को मुक्ति मिलेगी और धर्म की पुनः स्थापना होगी। किंतु भगवान की लीला में देवताओं का भी अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। भगवान के पृथ्वी पर अवतार लेने के साथ-साथ उनके कार्य में सहायता करने के लिए देवताओं को भी विभिन्न रूपों में जन्म लेना था।

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गोस्वामी तुलसीदासजी के अनुसार, ब्रह्माजी ने देवताओं को निर्देश दिया कि वे वानरों के रूप में अवतार लें, जिससे भगवान श्रीराम की लीला में सहयोग कर सकें। इस प्रकार भगवान के अवतार की तैयारी केवल अयोध्या में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि में होने लगी।

यह प्रसंग हमें बताता है कि जब भगवान किसी महान कार्य का संकल्प लेते हैं, तब उनकी लीला में अनेक पात्र अपनी-अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार होते हैं। कोई स्वयं भगवान के रूप में अवतरित होता है, तो कोई उनका सेवक बनकर धर्म की स्थापना में सहयोग करता है।


अब कथा का क्रम अयोध्या की ओर बढ़ता है। सरयू नदी के पावन तट पर बसी अयोध्या नगरी में रघुकुल के शिरोमणि राजा दशरथ राज्य करते थे। वे पराक्रमी, धर्मपरायण, प्रजापालक और भगवान के भक्त थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी और प्रजा उनसे अत्यंत प्रेम करती थी। उनके जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं था, किंतु एक दुःख उनके हृदय में निरंतर बना रहता था—उनके कोई पुत्र नहीं था।

तुलसीदासजी अयोध्या के राजा का परिचय देते हुए लिखते हैं-

अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ।
बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी।
हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥

भावार्थ: अयोध्यापुरी में रघुकुल के मणि राजा दशरथ निवास करते थे। उनका नाम वेदों में प्रसिद्ध था। वे धर्म को धारण करने वाले, गुणों के भंडार और ज्ञानी थे। उनके हृदय तथा बुद्धि में भगवान श्रीहरि के प्रति भक्ति थी।

राजा दशरथ की अनेक रानियाँ थीं। उनमें माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा प्रमुख थीं। सभी रानियाँ सदाचारिणी थीं और भगवान के चरणों में श्रद्धा रखती थीं। राजमहल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी संतान के अभाव में राजा का मन कभी-कभी अत्यंत व्याकुल हो उठता था।

एक दिन राजा दशरथ के मन में यही चिंता विशेष रूप से जाग उठी। उन्होंने विचार किया कि इतना विशाल राज्य, इतना वैभव और इतना सुख होने पर भी यदि संतान नहीं है, तो उनके बाद रघुकुल की परंपरा को कौन आगे बढ़ाएगा? प्रजा का पालन करने वाले राजा के लिए यह चिंता स्वाभाविक थी।

उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के पास जाकर अपनी व्यथा प्रकट करने का निश्चय किया। राजा गुरु के आश्रम पहुँचे और उनके चरणों में प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक बैठ गए।

मानस में यह प्रसंग इस प्रकार आता है—

एक बार भूपति मन माहीं।
भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला।
चरन लागि करि बिनय बिसाला॥

भावार्थ: एक बार राजा दशरथ के मन में यह चिंता उत्पन्न हुई कि उनके कोई पुत्र नहीं है। वे तुरंत अपने गुरु के घर गए और उनके चरणों में प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक अपनी बात कही।

राजा दशरथ ने अपने मन की पीड़ा गुरु वशिष्ठ के सामने रख दी। गुरु अपने शिष्य की चिंता समझते थे। उन्होंने राजा को धैर्य रखने का उपदेश दिया और आश्वासन दिया कि उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ।
कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी।
त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥

भावार्थ: राजा ने अपना सारा सुख-दुःख गुरु को सुनाया। वशिष्ठजी ने उन्हें अनेक प्रकार से समझाया और धैर्य रखने को कहा। उन्होंने बताया कि राजा के चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे और भक्तों के भय को दूर करने वाले होंगे।

गुरु वशिष्ठ के वचनों से राजा दशरथ के हृदय में नई आशा जाग उठी। अब उन्हें विश्वास हो गया कि गुरु के मार्गदर्शन से उनकी चिंता दूर होगी। वशिष्ठजी ने पुत्र-प्राप्ति के लिए ऋषि श्रृंगी को बुलाकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने का निश्चय किया।

यहाँ कथा एक अत्यंत सुंदर संदेश देती है। राजा दशरथ जैसे सामर्थ्यवान व्यक्ति ने भी अपनी समस्या का समाधान अहंकार अथवा बल के आधार पर नहीं खोजा। उन्होंने गुरु की शरण ली, विनम्रता से अपनी बात कही और उचित मार्गदर्शन स्वीकार किया।

उधर देवताओं के अवतार की तैयारी हो रही थी और इधर अयोध्या में राजा दशरथ के घर भगवान के प्राकट्य की भूमिका बन रही थी। पृथ्वी की करुण पुकार का उत्तर अब साकार होने जा रहा था। भगवान का आगमन निकट था, किंतु उस दिव्य घटना से पहले पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न होना था।

राजा दशरथ की प्रतीक्षा, गुरु वशिष्ठ का आशीर्वाद और ऋषि श्रृंगी के यज्ञ का संकल्प—ये सभी घटनाएँ उस महान क्षण की ओर संकेत कर रही थीं, जब स्वयं परब्रह्म भक्तों के कल्याण के लिए बालक रूप में अयोध्या में प्रकट होने वाले थे।

अब अगली श्रृंखला में हम देखेंगे कि ऋषि श्रृंगी के पुत्रकामेष्टि यज्ञ में अग्निदेव किस प्रकार प्रकट होते हैं, राजा दशरथ को क्या प्राप्त होता है और अंततः वह पावन घड़ी कैसे आती है, जिसकी प्रतीक्षा देवता, मुनि और समस्त पृथ्वी कर रही थी।

जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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