Supreme Court का आदेश: केवल Salary देखकर उम्मीदवारों से नहीं छिन सकता OBC Reservation का लाभ

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ANI
अभिनय आकाश । Nov 6 2026 5:21PM

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ माता-पिता के वेतन से ओबीसी क्रीमी लेयर तय नहीं हो सकती। कोर्ट ने इसे केवल भविष्य में लागू करने की केंद्र की मांग खारिज कर पात्र उम्मीदवारों को आरक्षण का हकदार बताया। हालांकि, पहले पूरी हो चुकी नियुक्तियों और पदोन्नतियों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार के माता-पिता की सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) या निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) की नौकरी से मिलने वाली सैलरी के आधार पर अकेले यह तय नहीं किया जा सकता कि वह उम्मीदवार OBC 'क्रीमी लेयर' में आता है या नहीं, और उसे आरक्षण से बाहर रखा जाना चाहिए या नहीं। केंद्र सरकार की इस अपील को खारिज करते हुए कि 11 मार्च, 2026 के फैसले को केवल भविष्य के मामलों में लागू किया जाए, कोर्ट ने कहा कि उसके सामने मौजूद उम्मीदवार आरक्षण के लाभ, और उसके परिणामस्वरूप मिलने वाली नियुक्ति तथा पदों के आवंटन के हकदार हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो चयन, नियुक्तियां, वरिष्ठता (सीनियरिटी) और पदोन्नतियां (प्रमोशन) पहले ही पूरी हो चुकी हैं, उन्हें फिर से नहीं खोला जाएगा। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की पीठ ने सरकार को फैसले को लागू करने के लिए दो महीने का अतिरिक्त समय दिया है। इससे पहले मार्च में सरकार को छह महीने का समय दिया गया था।

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केवल वेतन से तय नहीं हो सकता 'क्रीमी लेयर' का दर्जा


'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन' मामले में अदालत ने फैसला सुनाया था कि किसी व्यक्ति के 'क्रीमी लेयर' में होने का निर्धारण केवल उसके माता-पिता के वेतन या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) अथवा निजी कंपनी से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। 1993 के कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) के तहत, निर्धारित आय या संपत्ति की जांच के साथ-साथ माता-पिता के पद के स्तर और श्रेणी पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस फैसले को दोहराते हुए, पीठ ने कहा कि इस मामले से जुड़े उम्मीदवार OBC 'नॉन-क्रीमी लेयर' के दायरे में आते हैं और वे उन चयन प्रक्रियाओं में आरक्षण का लाभ पाने के हकदार हैं, जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया था।

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भविष्य में लागू करने की केंद्र की अपील खारिज


केंद्र ने अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए इस फैसले को भविष्य से लागू करने का आग्रह किया था। केंद्र का तर्क था कि अगर इसे पिछली और चल रही भर्तियों पर लागू किया जाता है, तो इससे ऐसे लोग प्रभावित हो सकते हैं जो इस मामले का हिस्सा नहीं थे, और इससे "पूरी तरह से प्रशासनिक अव्यवस्था" पैदा हो सकती है।
 

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