Ghaziabad Court ने बैंक धोखाधड़ी में बरी 2 आरोपियों को PMLA में दोषी ठहराया

गाजियाबाद की विशेष अदालत ने धन शोधन रोकथाम अधिनियम के तहत सिंडिकेट बैंक के पूर्व शाखा प्रबंधक समेत पांच लोगों को तीन-तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इनमें दो ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं जिन्हें केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा जांचे गए मूल बैंक धोखाधड़ी मामले में पहले बरी कर दिया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि मूल अपराध में बरी होने पर धनशोधन के आरोपों से स्वत: मुक्ति वाली पुरानी सोच अब बदल चुकी है।
नयी दिल्ली, चार नवंबर उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद की एक विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) अदालत ने धनशोधन रोकथाम कानून के तहत दो लोगों को दोषी ठहराया, जबकि बैंक ऋण धोखाधड़ी के उस मूल मामले में उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका था, जिसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने की थी। अदालत ने तीन नवंबर को अपने आदेश में कहा, ‘‘शुरुआत में यह माना जाता था कि जब तक किसी व्यक्ति को मूल अपराध में दोषी नहीं ठहराया जाता, तब तक उसे धनशोधन के मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अब सोच बदल गई है।’’ कानून के मुताबिक, धनशोधन का मामला तभी दर्ज किया जा सकता है, जब पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या किसी निर्धारित जांच एजेंसी द्वारा कोई मूल अपराध (अनुसूचित अपराध) दर्ज किया गया हो।
अदालतों ने पहले यह व्यवस्था दी थी कि मूल अपराध में बरी होने के बाद व्यक्ति धनशोधन के आरोपों से भी स्वत: मुक्त हो जाता है। ‘पीटीआई-भाषा’ के पास मौजूद अदालती आदेश के अनुसार, इस मामले में अदालत ने धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत पांच लोगों को दोषी ठहराया है। इनमें उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला में तैनात सिंडिकेट बैंक का एक पूर्व शाखा प्रबंधक भी शामिल है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच किए गए इस मामले में विशेष न्यायाधीश भरत सिंह यादव ने सभी पांच दोषियों को तीन-तीन साल के सश्रम कारावास और 50-50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। दोषी ठहराए गए लोग सिंडिकेट बैंक के पूर्व प्रबंधक वी एन माथुर और निजी व्यक्ति राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी तथा प्रमोद कुमार हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कहा, ‘‘यह उल्लेखनीय है कि राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को अनुसूचित अपराध (जिसकी जांच सीबीआई ने की थी) में बरी कर दिया गया था, लेकिन अब ईडी द्वारा अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों और सामग्री के मूल्यांकन के आधार पर उन्हें धनशोधन के अपराध में दोषी ठहराया गया है।’’ अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘शुरुआत में यह माना जाता था कि जब तक किसी व्यक्ति को मूल अपराध में दोषी नहीं ठहराया जाता, तब तक उसे धनशोधन के मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन अब यह सोच बदल गयी है।’’ ईडी की जांच में पता चला कि माथुर ने 2006-07 के दौरान दिवंगत नरेंद्र सिंह, अरविंद चौधरी और अन्य लोगों के साथ आपराधिक साजिश रची थी। उसने अस्तित्वहीन संपत्तियों के जाली बिक्री विलेखों, फर्जी भारमुक्ति प्रमाणपत्रों और झूठी मूल्यांकन रिपोर्टों के आधार पर उन्हें, उनकी कंपनियों और सहयोगियों को ऋण तथा ‘ओवरड्राफ्ट’ की सीमाएं मंजूर की थीं।
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