कतर तो बड़ा खिलाड़ी निकला, अमेरिका को धोखा देकर कैसे की ईरान की मदद?

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को जिन आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा उसी दौरान दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध तेज होने का दावा किया गया है। सबसे गंभीरता दावा यह किया गया है कि क़तर ने ईरान को ऐसी ड्यूल यूज़ यानी कि नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां उपलब्ध करवाई जिनका उपयोग रॉकेट ईंधन और ड्रोन निर्माण में किया जा सकता है।
अमेरिका का करीबी सहयोगी क़तर क्या चुपचाप ईरान की मदद करता रहा? एक विदेशी खुफिया रिपोर्ट ने ऐसे दावे किए हैं जिन्होंने मध्यपूर्व की राजनीति में नई बहस छीड़ दी है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि क़तर ने वर्षों तक ईरान को आर्थिक और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई। अगर यह आरोप सही साबित होते हैं तो अमेरिका के लिए बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका माना जाएगा क्योंकि क़तर लंबे समय से उसका प्रमुख रणनीतिक साझेदार रहा है। इजराइली मीडिया आउटलेट कान न्यूज़ के मुताबिक यह दावा एक विदेशी खुफिया रिपोर्ट के आधार पर किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉन्ड ट्रंप द्वारा ईरान परमाणु समझौते यानी जेसीपीओए से अमेरिका के बाहर निकलने और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बाद क़तर और ईरान के बीच सहयोग और ज्यादा बढ़ गया।
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अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को जिन आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा उसी दौरान दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध तेज होने का दावा किया गया है। सबसे गंभीरता दावा यह किया गया है कि क़तर ने ईरान को ऐसी ड्यूल यूज़ यानी कि नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां उपलब्ध करवाई जिनका उपयोग रॉकेट ईंधन और ड्रोन निर्माण में किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार हाइड्रोजन, एलुमिनियम और इंजन के पुरजे जैसी सामग्री ईरान तक पहुंचाई गई। आरोप है कि इन संसाधनों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में भूमिका निभाई। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर किए गए हमले के बाद भी यह सहयोग जारी रहा। इसके बाद ईरान समर्थित समूहों और स्वयं ईरान की ओर से इजराइल पर मिसाइलों और ड्रोन हमलों की घटनाएं भी सामने आई। इसी आधार पर रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि क़तर से कथित तौर पर मिली सामग्रियां ईरान के रक्षा कार्यक्रम के लिए उपयोगी साबित हो सकती थी। अगर इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह अमेरिका और कतर के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर सकती है।
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क़तर को अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता है। मध्यपूर्व में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा अल उदैद एयरबेस क़तर में ही स्थित है और दोनों देशों के बीच रक्षा सुरक्षा और खुफ़िया सहयोग लंबे समय से चला आ रहा है। ऐसे में अगर एक करीबी सहयोगी पर अमेरिकी प्रतिबंधों को कमजोर करने और ईरान की कथित मदद करने के आरोप सही साबित होते हैं तो इसे अमेरिका के लिए बड़े रणनीतिक झटके के रूप में देखा जाएगा। हालांकि इस पूरे मामले में अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी है। जैसे क़तर ने किस तरीके से ईरान की मदद की? क़तर ने किन-किन सामग्रियों के जरिए ईरान को मदद पहुंचाई और जो आर्थिक और सैन्य मदद है उसमें क्या-क्या शामिल था। फिलहाल माना जा रहा है कि यह मामला क़तर और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि अमेरिका की मध्यपूर्व नीति और उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों पर भी बड़ा असर डाल सकता है। अल्लाहू अकबर। अल्लाहू अकबर। अल्लाहू अकबर। ईरान, अमेरिका जंग के बाद गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल की हकीकत और ताकत तो उजागर हो ही गई थी। लेकिन तेल बेचने वाले सबसे बड़े ग्रुप ओपेक में एक और बड़ी टूट हो सकती है।
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पहले यूएई ओपेक से बाहर हुआ। अब खबर है कि इराक इससे हटने जा रहा है। इराक का कहना है कि अगर ओपेक में उसकी शर्तों को नहीं माना जाता तो वह इस ग्रुप से बाहर निकल जाएगा। ईरान अमेरिका जंग में जैसे ही सीज फायर हुआ था। यूएई ने खुद को ओपेक और ओपेक प्लस से अलग कर लिया था। अब संगठन के दूसरे सबसे बड़े तेल उत्पादक देश इराक ने खुलेआम बगावत का बिगुल फूंक दिया है। इराक ने ओपेक को छोड़ने की धमकी दे डाली है। मीडिया रिपोर्ट कहती है कि अगर इराक इस संगठन से बाहर निकलता है तो यह सऊदी अरब के राज और पूरे ओपेक के लिए बहुत बड़ा झजका होगा जिससे दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और पूरी ग्लोबल इकोनमी चरमरा जाएगी। अप्रैल में मिडिल ईस्ट के बदलते सुरते हाल और जंग के दौरान मिली रुवाई को देखते हुए यूएई ने वैश्विक तेल संगठन ओपेक से बाहर निकलने का ऐतिहासिक फैसला किया था। यूएई की राजधानी अबू धाबी के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक 8 अप्रैल तक यूएई के एयर डिफेंस सिस्टम ने ईरान की 537 बैलस्टिक मिसाइलों और 26 क्रूज मिसाइलों और साथ ही 2000 से ज्यादा ड्रोन इंटरसेप्ट किए थे और उसे जीसीसी देशों की मदद नहीं मिली थी। ऐसे में यूएई बहुत ज्यादा गुस्सा था अरब देशों से और खासकर गल्फ कोऑपरेशन से जिसके बाद उसने ओपेक से निकलने का अचानक फैसला ले लिया। दरअसल यूएई को यह बात उस वक्त चुभ गई थी कि जब वो पिट रहा था उसके दुबई जैसे शहरों पर ईरान की मिसाइलें गिर रही थी तब ख्ते का कोई भी मुल्क उसका पुरसाने हाल नहीं था।
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