Muharram 2026: Ashura पर याद की जाती है Karbala की जंग, जानिए Imam Hussain के बलिदान की पूरी History

Muharram 2026
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इस्लाम में मुहर्रम साल के सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है। मुहर्रम सिर्फ नए साल की शुरूआत नहीं बल्कि यह बलिदान, त्याग, सत्य और न्याय की याद दिलाने वाला महीना भी है।

इस्लाम में मुहर्रम साल के सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है। मुहर्रम सिर्फ नए साल की शुरूआत नहीं बल्कि यह बलिदान, त्याग, सत्य और न्याय की याद दिलाने वाला महीना भी है। दुनियाभर के मुसलमान इस पवित्र महीने को इबादत, श्रद्धा और आत्मचिंतन के साथ मनाते हैं। मुहर्रम के 10वें दिन को आशूरा कहा जाता है। इस दिन इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया जाता है।

मुहर्रम 2026

इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक मुहर्रम के 10वें दिन को आशूरा कहा जाता है। जोकि इस बार आज यानी की 26 जून 2026 को मनाया जा रहा है। इस बार 17 जून से इस्लामी नववर्ष शुरू हुआ था। इस दिन नए इस्लामी साल 1448 हिजरी की शुरूआत है।

क्यों मनाया जाता है मुहर्रम

कुछ लोग इसको गम का महीना मानते हैं। माह की 10वीं तारीख को यौम-ए-आशूरा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। इमाम हुसैन की याद में मुहर्रम के 10वें दिन इस दिन को लोग मातम के रूप में मनाते हैं।

कर्बला की घटना

वर्तमान इराक के कर्बला में 680 ईस्वी में इमाम हुसैन और उनके समर्थकों का सामना शासक यज़ीद की सेना से हुआ। संख्या कम होने के बाद भी इमाम हुसैन अन्याय के आगे नहीं झुके और उन्होंने शहादत स्वीकार की। हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ इसी महीने में 10वें दिन कर्बला के मैदान में शहीद हो गए थे। इमाम हुसैन की शहादत और कुर्बानी के रूप में इस दिन को याद किया जाता है।

कैसे मनाया जाता है मुहर्रम

मुस्लिम समुदायों में मुहर्रम मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

लोग इमाम हुसैन की शहादत और कर्बला की घटनाओं को याद करते हैं।

कई जगहों पर ताजिया निकाली जाती है और शोक जुलूस आयोजित होते हैं।

कई मुसलमान आशूरा के दिन रोजा रखते हैं।

कई लोग इस मौके पर भोजन वितरण और सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेते हैं।

महत्व

मुहर्रम इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से है। यह महीना इबादत, आत्मचिंतन, संयम और अच्छे कामों के लिए विशेष माना जाता है। कई मुसलमान इस दौरान अतिरिक्त दुआ, नमाज और रोजा का पालन करते हैं।

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