वो 'गुप्त' शक्ति जिसके आगे नतमस्तक मोदी-शाह, जिसने बंगाल में तैयार की बीजेपी की जीत की ज़मीन?

पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों, और स्थानीय स्तर पर लोगों तक पहुँच बनाना ही इस प्रयास की रीढ़ है। आंतरिक तौर पर, यह विश्वास है कि भारतीय जनता पार्टी 2021 में जीती गई 77 सीटों की संख्या में सुधार करेगी; मौजूदा अभियान को राज्य में अब तक किया गया सबसे व्यापक संगठनात्मक प्रयास बताया जा रहा है।
साल 2010 की बात है बंगाल में सीपीएम के शासन का अंतिम दौर चल रहा था और बिमान बोस उस वक्त बहुत बड़े कम्युनिस्ट नेता थे। उनसे एक बार बंगाल में आरएसएस के बारे में पूछा गया। उन्होंने तब कहा कि कोलकाता की इस सड़क को देख लो। इस सड़क पे आरएसएस का एक झंडा नहीं लगेगा। तुम पूरे बंगाल की बात कर रहे हो। 2006 से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सिर्फ 500 शाखाएं चलती थी। 2011 में 830 हुई जब ममता बनर्जी आई लेकिन अचानक ममता बनर्जी के आते ही आरएसएसएस की शाखाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई 2024 तक 4540 यानी 500 शाखा से 4540 तक पहुंची है 2024 तक और 2026 के अंत आते-आते 8000 से अधिक शाखाएं। तो जरा सोचिए कि पिछले चंद सालों में बंगाल में किस गति से बढ़ी है आरएसएस और नंबर जो बढ़े हैं शाखाओं की संख्या जो बढ़ी है वो किस गति से बढ़ी है। यही वो साइलेंट फोर्स है जो लोगों को एक से दो से चार लोगों को जोड़ते जोड़ते बंगाल में बीजेपी के पूरे संगठन को खड़ा किया है। नरेंद्र मोदी का भाषण है जिसमें उन्होंने कहा था कि नेता वो असली नेता है ही नहीं जो सुबह की चाय अपने घर में पिए। नेता वो है जो सुबह की चाय किसी दूसरे के घर में पिए। यानी आप हर दिन कहीं ना कहीं किसी घर में बैठे रहते हो। उस घर के परिवार से आपका वास्ता होता है। पहली बार भगाएगा। दूसरी बार बात करेगा। तीसरी बार कुर्सी देगा और तब करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान रसियारी आवत जात के सिल पर पड़त निशान यह होता है संगठन का काम दुनिया में सबसे मुश्किल लोगों को संगठित करना है जिसने यह कर लिया वही अंत में किला फतह करेगा संघ शक्ति कलयुगे यही है।
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पश्चिम बंगाल से RSS का ऐतिहासिक जुड़ाव
पश्चिम बंगाल से संघ का पुराना नाता रहा है। यहां 1937 से ही संघ की गतिविधियों का संचालन हो रहा है। राज्य में संघ के पूर्व क्षेत्र के प्रचार प्रमुख जिश्नु बसु के अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय के लिए संघ की गतिविधियां रोकी गईं थीं और उसके बाद दोबारा शुरू कर दी गईं थीं। संघ के दिग्गज नेताओं गुरु गोलवलकर, मोरोपंत पिंगले, विट्ठल राव पतकी, दत्तोपंत ठेंगडे, एकनाथ रानाडे, बाला साहेब देवरस के साथ ही वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी पश्चिम बंगाल एक प्रमुख केंद्र रहा है। पश्चिम बंगाल में संघ वैसे तो लगातार अपनी गतिविधियां मजबूत करता आया है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी गतिविधियों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।
बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों
आकलन के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों, और स्थानीय स्तर पर लोगों तक पहुँच बनाना ही इस प्रयास की रीढ़ है। आंतरिक तौर पर, यह विश्वास है कि भारतीय जनता पार्टी 2021 में जीती गई 77 सीटों की संख्या में सुधार करेगी; मौजूदा अभियान को राज्य में अब तक किया गया सबसे व्यापक संगठनात्मक प्रयास बताया जा रहा है। संघ के भीतर भी ध्यान अगले बड़े चुनावी पड़ाव, यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर केंद्रित है। ये चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं, क्योंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त हो रहा है। इस समय-सीमा को राज्य की चुनावी राजनीति से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र और संगठन के बीच के समीकरण की बात करें तो, संगठनात्मक सूत्रों ने दोनों के बीच उच्च स्तर के तालमेल का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार, दोनों के बीच ऐसा कोई टकराव नहीं है जिसका असर शासन-प्रशासन या राजनीतिक दिशा पर पड़ सकता हो। यह तालमेल इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि संघ के तंत्र के भीतर सरकार के कामकाज को किस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है। संघ के पदाधिकारियों ने मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी रक्षा तैयारियों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता, और साथ ही पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर पहले की गई सीमा-पार की जवाबी कार्रवाइयाँ। ये सभी पिछले एक दशक में हमारी सैन्य क्षमताओं को मज़बूत किए जाने के ही परिणाम हैं।
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हर तीसरे महीने में संघ प्रमुख का एक दौरा
2021 में विधानसभा चुनाव हुए। ममता बनर्जी को प्रचंड बहुमत मिली। भारतीय जनता पार्टी की सीटें चार से बढ़कर 77 हो गई। जब अचानक इतनी सीटें बढ़ी तो हर किसी का ध्यान ध्यान गया। देश की मीडिया कह रही थी कि बीजेपी बुरी तरह हारी थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ के लोग कह रहे थे कि हम 4 से 77 पहुंचे हैं। यह अचानक नहीं हुआ। उसके बाद 21 के विधानसभा चुनाव के बाद ठीक 1 साल बाद मोहन भागवत कोलकाता आते हैं और बंगाल का दौरा उनका शुरू होता है और इस चुनाव की घोषणा के एक डेढ़ महीने पहले तक उनके 13 दौरे हो चुके हैं। 13 दौरे हर तीसरे महीने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख लगभग कोलकाता में मौजूद होते थे। मतलब बंगाल के किसी भी हिस्से में मौजूद होते थे। कोलकाता नहीं। और फिर शुरू हुआ संगठन का काम। यह पिछले 4 साल की जो मेहनत है गांव-गांव में, गलियों में वह आज दिख रहा है। 2021 में करीब 1000 ऐसी बूथें थी, बूथ थे जहां पर बीजेपी को पोलिंग एजेंट नहीं मिला था। इस बार चुनाव की घोषणा के 3 महीने पहले तक हर बूथ पर कम से कम दो बैठकें हो चुकी थी।
संघ के नजरिए से बंगाल को एक मॉडल स्टेट बनाने की मुहिम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजनीति से नहीं अपने सामाजिक कार्यों से पहचान बनाई है। लोगों में गुडविल पैदा किया है। कुछ जो मुद्दे इन्होंने बताया है कि हर बूथ पे बूथ लेवल पर स्वयंसेवक का डिप्लॉयमेंट जरूर होना चाहिए। हिंदू के वोट हैं वह ऐसे कंसोलिडेट नहीं करेंगे नारे लगाने से नहीं करेंगे। एक भाव जगाना होगा तो उस दिशा में मेहनत किया गया। 4 साल तक 26 तक जब चुनाव की ये घोषणा हुई थी उससे पहले तक बंगाल को एक मॉडल स्टेट संघ के नजरिए से बनाने की कोशिश की गई जिसमें श्याम प्रसाद मुखर्जी का बार-बार जिक्र हो जिसमें विवेकानंद का जिक्र हो, रामकृष्ण परमहंस का जिक्र हो, वहां से चुने गए महापुरुष और उसके उसके बारे में नैरेटिव पूरे देश में बनाया गया कि यह हैं असली महापुरुष। हर समाज के प्रबुद्ध लोगों से संपर्क कर उन्हें जोड़ा गया सामाजिक कार्य में क्योंकि शायद उनमें से बहुत सारे सीधे राजनीति में आने से परहेज करते हैं। यह बारीक काम हुआ है। आज चर्चा भले ही भीड़ की हो रही हो, रैलियों की हो रही हो, लेकिन एक खामोश शक्ति है जो लगभग हर तीसरे घर में घुसकर हर तीसरा हिंदू के घर में घुसकर वो प्रेरित कर रही है कि बंगाल बदलाव मांगता है। बंगाल आमार सुनार बंगला बनना चाहिए। बंगाल की यश कृति जो पहले थी वह दोबारा वापस आनी चाहिए। पलायन रुकना चाहिए।
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