आख़िर क्या हो 'प्रदर्शन प्रोटोकॉल' ताकि न होने पाए उपद्रव?

protest protocol
ANI
कमलेश पांडे । Jul 28 2026 6:07PM

आयोजकों को समय, मार्ग, अनुमानित भीड़ और जिम्मेदार पदाधिकारियों की जानकारी पहले से देनी चाहिए। आयोजक यह लिखित आश्वासन दें कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा। हिंसा होने पर दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई में सहयोग करेंगे। प्रदर्शन के लिए तय मार्ग और स्थान हों, ताकि अस्पताल, स्कूल, एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाएं बाधित न हों।

किसी भी लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार और जन-जीवन की सुरक्षा—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ऐसा प्रोटोकॉल होना चाहिए जो शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, लेकिन हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ को रोके। गत दिनों कॉकरोच जनता पार्टी/सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली या अन्य राज्यों में जो कुछ हुआ, उससे यह प्रश्न एक बार पुनः प्रासंगिक हो चुका है। 

चूंकि इससे पहले भी अनेक प्रदर्शन उग्र हुए, जिससे सरकारी व निजी संपत्ति की क्षति हुई, पर कार्रवाई वही लीपापोती वाली या फिर दलगत प्रतिशोध जैसी, जबकि दोनों अनुचित हो। ऐसी कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए। जानकारों की राय में एक संतुलित "प्रदर्शन प्रोटोकॉल" इस प्रकार हो सकता है:- 

इसे भी पढ़ें: संदर्भ धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र- छात्रों से संवाद की ओर बढ़ते कदम

पहला, पूर्व अनुमति और उत्तरदायित्व: आयोजकों को समय, मार्ग, अनुमानित भीड़ और जिम्मेदार पदाधिकारियों की जानकारी पहले से देनी चाहिए।

दूसरा, शांति की लिखित प्रतिज्ञा: आयोजक यह लिखित आश्वासन दें कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा। हिंसा होने पर दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई में सहयोग करेंगे।

तीसरा, निर्धारित स्थान और मार्ग: प्रदर्शन के लिए तय मार्ग और स्थान हों, ताकि अस्पताल, स्कूल, एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाएं बाधित न हों।

चौथा, वीडियो रिकॉर्डिंग और बॉडी कैमरा: पुलिस और आयोजकों—दोनों की ओर से रिकॉर्डिंग हो, ताकि बाद में यह स्पष्ट हो सके कि हिंसा किसने शुरू की।

पांचवां, हथियार और खतरनाक सामग्री पर प्रतिबंध: लाठी, पेट्रोल, पत्थर, ज्वलनशील पदार्थ या अन्य खतरनाक सामान लाने पर रोक हो।

छठा, चरणबद्ध पुलिस कार्रवाई: पुलिस पहले संवाद करे, फिर चेतावनी दे, उसके बाद ही आवश्यकता पड़ने पर न्यूनतम बल का प्रयोग करे।

सातवां, तोड़फोड़ की भरपाई: यदि जांच में साबित हो कि किसी व्यक्ति या समूह ने सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, तो उससे क्षतिपूर्ति वसूली जाए। केवल भीड़ में मौजूद होने के आधार पर किसी पर दायित्व न डाला जाए।

आठवां, उकसाने वालों की पहचान: सीसीटीवी, ड्रोन और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक उपद्रवियों की पहचान कर कार्रवाई हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक तत्वों में स्पष्ट अंतर किया जाए।

नौवां,  स्वतंत्र निगरानी: बड़े प्रदर्शनों में न्यायिक या स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की व्यवस्था हो, जिससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों—दोनों की जवाबदेही बनी रहे।

दसवां, समान कानून, समान अनुपालन: नियम किसी भी संगठन, दल, जाति या विचारधारा के लिए अलग-अलग नहीं होने चाहिए। कानून का निष्पक्ष और समान रूप से पालन ही जनता का विश्वास बढ़ाता है।

ऐसा प्रोटोकॉल लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करेगा। इससे नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा और समाज को हिंसा, आगजनी तथा सार्वजनिक संपत्ति की क्षति से भी बचाया जा सकेगा।

# ज्वलंत प्रश्न: प्रोटोकॉल टूटने पर राजनीतिक दलों और संगठनों के नेतृत्व व संलिप्त तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होना चाहिए या नहीं?

चूंकि यह एक नीतिगत और कानूनी प्रश्न है। लिहाजा इसका संतुलित उत्तर यह है कि सिर्फ नेतृत्व के पद पर होने के कारण कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि कानून के अनुसार उनकी जिम्मेदारी या संलिप्तता सिद्ध होती है, तो अवश्य होनी चाहिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में निम्न सिद्धांत उचित माने जा सकते हैं: 

एक, यदि नेतृत्व ने हिंसा के लिए उकसाया, उसका निर्देश दिया, या हिंसक गतिविधियों की योजना में शामिल था, तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।

दो, यदि न्यायिक प्रक्रिया या जांच से यह सिद्ध हो कि नेतृत्व ने जानबूझकर हिंसा रोकने के अपने दायित्व की अनदेखी की, तो प्रासंगिक कानूनों के तहत जवाबदेही तय की जा सकती है।

तीन, यदि प्रदर्शन की शर्तों का गंभीर उल्लंघन हुआ और आयोजक ने सहयोग नहीं किया, तो भविष्य में अनुमति पर प्रतिबंध, आर्थिक दंड या अन्य वैधानिक कार्रवाई जैसे उपाय किए जा सकते हैं।

लेकिन केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी दल या संगठन का प्रमुख है, उसके विरुद्ध बिना साक्ष्य के कार्रवाई करना कानून के शासन और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

सबसे उपयुक्त व्यवस्था यह होगी कि व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी साक्ष्य के आधार पर तय हो। संगठनात्मक जिम्मेदारी अलग से तय हो, जैसे क्षतिपूर्ति या प्रशासनिक दंड। सभी दलों और संगठनों पर एक ही नियम समान रूप से लागू हों। अंतिम निर्णय स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर हो, न कि राजनीतिक दबाव में। इस प्रकार, कठोर जवाबदेही होनी चाहिए, लेकिन वह साक्ष्य, निष्पक्ष जांच और विधि के शासन पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल पद या राजनीतिक पहचान पर।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
All the updates here:

अन्य न्यूज़