फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा?

राजमहल–साहिबगंज क्षेत्र गंगा के उसी नदी-तंत्र में है। फरक्का के ऊपर नदी के प्रवाह, sediment deposition और channel migration में बदलाव का असर झारखंड के साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र की तटीय भूमि और कटाव पर पड़ सकता है। अध्ययन में राजमहल क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण deposition दर्ज किया गया है।
“फरक्का समझौता बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप है” यह कहना एक राजनीतिक व क्षेत्रीय तर्क के रूप में तो समझ में आता है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से एक जरूरी फर्क यह भी है कि वास्तविक समस्या केवल 1996 के भारत-बांग्लादेश जल-बंटवारा समझौते की नहीं, बल्कि फरक्का बैराज की जल-प्रवाह व्यवस्था, गाद (silt) जमाव और उससे पैदा हुए नदी-भूगोल की भी है, जिस पर गहन चिंतन मनन आवश्यक है ताकि बिहार को बाढ़ के मामले में 1972 के बाद से ही जिस अप्राकृतिक और अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उससे मुक्ति मिले।
यही नहीं, इस केंद्रीय नीति से बिहार को बाढ़ जनित होने वाली वार्षिक जन-धन की हानि व फसल क्षति और आधारभूत संरचना यानी सड़क/रेल आदि की व्यापक क्षति का वार्षिक मुआवजा मिले, जो कि फरक्का बराज से लाभान्वित होने वाले समूहों से वसूला जाए। चूंकि इस मानव कृत आपदा से यूपी के दो जिले गाजीपुर और बलिया जनपद तक प्रभावित होते हैं। इसलिए मुआवजा उन्हें भी मिलना चाहिए।
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यह बात मैं नहीं, बल्कि इस मामले से जुड़े लोगों ने अपने गहन अनुभवों के द्वारा समय समय पर अभिव्यक्त किया है, जो मेरी स्मृतियों में अब तक सुरक्षित है। वक्त वक्त पर इस पूरे क्षेत्र की बाढ़ आपदा मीडिया रिपोर्टिंग टीम का अंग होने नाते भी इस बारे में विविधता पूर्ण जानकारी मुझे हासिल है। पीड़ित बुजुर्ग खुद बताते आये हैं कि 1972 के बाद बाढ़ आपदा स्थायी हुई है, पहले तो पानी आता और चला जाता, इतना जमता नहीं! मुझे खुशी है कि अपनी प्रभुत्व वाली सत्ता जाने के बाद ही सही लेकिन जनता दल यूनाइटेड को सद्बुद्धि आ गई है और उसके राज्य सभा सदस्य संजय झा इस मामले में मुखर हैं। इसी में राज्य हित भी निहित है।
सीधा सवाल है कि आखिर जब केंद्र सरकार बिहार के दूरगामी हितों की रक्षा नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा? वो भी तब, जब बिहार-पश्चिम बंगाल में और केंद्र में भी भाजपा/एनडीए गठबंधन की ही सरकार हो? वहीं, इस समझौते से लाभान्वित होने वाला बंगलादेश अब भारत का हितैषी नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान की प्रतिशोधी भाषा बोलने को अभिशप्त हो! ऐसे में उसे कूटनीतिक पाठ पढ़ाने का भी यही असली मौका है।
# जानिए की बिहार के लिए संकट कहाँ है?
पहला, गंगा की प्राकृतिक धारा में हस्तक्षेप: फरक्का बैराज 1975 में चालू हुआ। इसका मूल उद्देश्य गंगा से पानी हुगली में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या कम करना था। समस्या यह है कि गंगा जैसी अत्यधिक गाद वाली नदी को बैराज से नियंत्रित करने पर ऊपर की ओर sediment deposition और नदी की morphology में बदलाव होता है। शोध में भागलपुर से फरक्का तक के क्षेत्र में 1973–2019 के दौरान नदी के स्वरूप, कटाव और द्वीप/बालू जमाव में बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं; अध्ययन ने फरक्का बैराज को upstream flooding और planform बदलाव की बढ़ी दर से जोड़ा है।
दूसरा, बिहार का “बाढ़–कटाव” संकट: गंगा की तलहटी में गाद बढ़ने से नदी की जलधारण क्षमता घट सकती है। एक शोध में कहा गया है कि निचली गंगा के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर siltation से channel capacity कम हुई है, जिसके कारण अपेक्षाकृत कम discharge पर भी गंभीर बाढ़ हो सकती है; शोध ने फरक्का को नदी की morphology प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया है। यही वजह है कि भागलपुर, मुंगेर, कटिहार और आसपास के गंगा-तटीय इलाकों में बाढ़ तथा कटाव को फरक्का के प्रश्न से अलग करके देखना अधूरा होगा—हालाँकि यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि इन जिलों की हर बाढ़ केवल फरक्का के कारण होती है। लेकिन यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल के ऊपरी जिलों में पानी पहुंचाने के लिए जब तक बराज का गेट बंद रखा जाता है तो रुका हुआ पानी पूर्वी उत्तरप्रदेश के दो जिलों तक के जल स्तर को ऊंचा उठा देता है, जो कृत्रिम बाढ़ समझा जाता है।
तीसरा, झारखंड पर भी अप्रत्यक्ष असर: राजमहल–साहिबगंज क्षेत्र गंगा के उसी नदी-तंत्र में है। फरक्का के ऊपर नदी के प्रवाह, sediment deposition और channel migration में बदलाव का असर झारखंड के साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र की तटीय भूमि और कटाव पर पड़ सकता है। अध्ययन में राजमहल क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण deposition दर्ज किया गया है।
# असली राजनीतिक सवाल यह कि पानी किसका?
1996 की गंगा जल बंटवारा संधि में भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का पर जनवरी से मई तक lean season में पानी बांटने का फार्मूला तय किया गया था। यह संधि 30 वर्ष के लिए थी और 2026 में इसकी अवधि समाप्त हो रही है। यहीं बिहार का तर्क ज्यादा गंभीर हो जाता है: सवाल है कि जब गंगा का पानी बिहार से होकर गुजरता है और बाढ़, कटाव तथा गाद का बोझ बिहार झेलता है, तो भविष्य की जल-संधि बनाते समय बिहार की जल-आवश्यकताओं और नदी-प्रबंधन को निर्णायक महत्व क्यों न मिले?
मसलन, संधि में फरक्का पर उपलब्ध जल के आधार पर भारत-बांग्लादेश के बीच हिस्सेदारी का फार्मूला है—70,000 क्यूसेक या उससे कम पर 50:50 आदि। लेकिन बिहार की बाढ़, गाद, भूजल, सिंचाई, पेयजल और भविष्य की जल-जरूरत को उसी स्तर पर द्विपक्षीय जल-बंटवारे के केंद्र में नहीं रखा गया। यही वह जगह है जहाँ बिहार को लगता है कि वह नदी का ऊपरी प्रवाह क्षेत्र का हितधारक होते हुए भी निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त आवाज नहीं रखता।
लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरतनी है। इसे केवल “फरक्का समझौते ने बिहार को बर्बाद कर दिया” कहना अतिशयोक्ति होगी। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार गंगा की अस्थिरता के पीछे प्राकृतिक sediment load, सहायक नदियाँ, नदी की बहुत कम ढाल, जलवायु/वर्षा, upstream water abstraction और मानवीय हस्तक्षेप—कई कारण हैं। फरक्का उनमें एक महत्वपूर्ण कारक है, अकेला कारण नहीं। इसलिए 2026 में बिहार की मांग क्या होनी चाहिए? यक्ष प्रश्न है।
मेरे हिसाब से मुद्दा “बांग्लादेश को पानी देना बंद करो” नहीं होना चाहिए, बल्कि “भारत-बांग्लादेश समझौता + बिहार-झारखंड की जल-सुरक्षा + राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति + गंगा की ecological flow को दृष्टिगत रखते हुए एक समग्र समझौता” होना चाहिए। और इसमें पाँच बातें अनिवार्य होनी चाहिए— एक, बिहार की न्यूनतम जल-आवश्यकता पहले निर्धारित हो। दो, गंगा की गाद के वैज्ञानिक प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बने। तीन, भागलपुर–मुंगेर–साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र के कटाव को अंतरराज्यीय/राष्ट्रीय परियोजना माना जला। चार, फरक्का के gate operation का real-time scientific review हो। पांच, भविष्य की भारत-बांग्लादेश संधि में बिहार और झारखंड की संस्थागत भागीदारी हो।
यानी असली सवाल “फरक्का रहे या हटे?” से आगे है—“फरक्का के कारण पैदा हुए जल, गाद और बाढ़ के लाभ-हानि का न्यायपूर्ण बंटवारा कौन सुनिश्चित करेगा?” और यही बिहार की सबसे मजबूत दलील बन सकती है। इसलिए फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए। अगर उपर्युक्त बातों पर गौर करेंगे तो यह असंभव नहीं होगा।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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