BRICS Summit 2026: हंसो, बना रखी है क्यूं ये सूरत रोनी? एक जगह अगर जमा होंगे तीनों- मोदी-जिनपिंग और पुतिन

गले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन समेत दुनिया के कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। भारत 5 साल बाद इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनूर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। भारत की तरफ से अमेरिका को पैगाम साफ साफ दिया जा रहा है। सवाल है कि अमेरिका बार बार अमेरिका के हुनर का इम्तिहान क्यों ले रहा है? इम्तिहान कुछ ऐसा कि जो जवाब मिलेगा वो पचा नहीं पाएंगे।डोनाल्ड ट्रंप अब भारत पर टैरिफ लगा रहे हैं। रूस से तेल क्यों लेते हो ये कहकर आंखें दिखा रहे हैं। नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। एक बार चाणक्य ने विदेशी संबंधों को लेकर कहा था कि किसी भी देश को ऐसी मित्रता या गठबंधन तुरंत समाप्त कर देना चाहिए। जिससे भविष्य में उसे नुकसान हो। अमेरिका से भारत की मित्रता या गठबंधन खत्म तो नहीं हो सकता। लेकिन अमेरिका को भारत ने कुछ चीजें स्पष्ट कर दी है। सबसे पहले तो हमारे लिए हमारा राष्ट्रहित सर्वोपरि है और भारत किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला देश नहीं है। अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन समेत दुनिया के कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। भारत 5 साल बाद इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) और यूरोप में युद्ध के कारण दुनिया भर में तनाव का माहौल है। ब्रिक्स संगठन अब एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका तक फैल चुका है, और इस सम्मेलन में समूह के कई देशों के शीर्ष नेताओं के जुटने की उम्मीद है।
सम्मेलन में शामिल होने वाले संभावित प्रमुख नेता:
राष्ट्रपति
दक्षिण अफ्रीका: सिरिल रामफोसा
मिस्र: अब्देल फतह अल-सीसी
बेलारूस: अलेक्सांद्र लुकाशेंको
कजाकिस्तान: कासिम-जोमार्ट तोकायेव
इंडोनेशिया: प्रबोवो सुबियांतो
क्यूबा: मिगुएल डियाज-कैनेल
नाइजीरिया: बोला टीनूबू
उज्बेकिस्तान: शौकत मिर्जियोयेव
प्रधानमंत्री
मलेशिया: अनवर इब्राहिम
थाईलैंड: अनुतिन चार्नविराकुल
इथियोपिया: अबी अहमद
अन्य देशों के प्रतिनिधि
ब्राजील: घरेलू व्यस्तताओं के कारण राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा के शामिल होने की उम्मीद नहीं है; उनकी जगह विदेश मंत्री मौरो विएरा देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
युगांडा: उपराष्ट्रपति जेसिका अलुपो शामिल हो सकती हैं।
वियतनाम: प्रधानमंत्री ले मिन्ह हुंग प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE): राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की जगह अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के आने की संभावना है।
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इस बार का एजेंडा क्या है?
कागज़ पर तो एजेंडा व्यापार, विकास के लिए फ़ंडिंग और ग्लोबल संस्थाओं में सुधार पर केंद्रित है, लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में मिडिल ईस्ट के टकराव और ईरान व UAE के बीच मतभेदों का मुद्दा हावी रहने की संभावना है। उम्मीद है कि ईरान समिट के घोषणा-पत्र में हालिया टकराव, हमलों और प्रतिबंधों पर अपना पक्ष रखने के लिए ज़ोर देगा, जिससे बातचीत काफ़ी मुश्किल हो सकती है। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करता है, जिसका मतलब है कि कोई एक प्रतिनिधिमंडल भी किसी विवादित पैराग्राफ़ पर सहमति को रोक सकता है। पश्चिम एशिया से जुड़े शब्दों को लेकर ही दबाव है। हर किसी की अपनी रेड लाइन हैं।
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शी-पुतिन की मुलाक़ात
व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिशों में एक नया पहलू जोड़ेगी। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि शी के साथ लगभग 400 अधिकारियों का एक बड़ा दल शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकता है। यह सात वर्षों में उनकी पहली यात्रा होगी और दोनों प्रतिद्वंद्वियों के बीच रिश्तों में सुधार का एक नया संकेत होगा। चीनी नेता की मौजूदगी पर BRICS के एजेंडे से ज़्यादा इस बात पर नज़र रहेगी कि यह 2020 में सीमा पर हुई घातक झड़पों के बाद बीजिंग और नई दिल्ली के रिश्तों को स्थिर करने की कोशिशों के बारे में क्या संकेत देता है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी एक क्षेत्रीय मंच पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करना चाहते हैं और साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं। क्रेमलिन में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हुई बैठक में, पुतिन ने पिछले साल आई गिरावट के बाद रूस और भारत के बीच व्यापार में हुई रिकवरी का ज़िक्र किया। इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्री से प्रधानमंत्री तक अपनी शुभकामनाएँ पहुँचाने को कहा। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद, भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में करीबी संबंध बनाए हुए है। वहीं, 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' पर सालों तक चले सैन्य तनाव के बाद चीन के साथ रिश्ते बेहतर हुए हैं, हालांकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता अभी भी बनी हुई है।
क्या रूस-चीन-भारत मिलकर बनाएंगे महागठबंधन
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के बयानों ने भारत को ठेस पहुंचाई है और इससे भारत को अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने पर मजबूर कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो इसका मतलब भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव होगा। पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने एक बार कहा था-अमेरिका से दुश्मनी भारी होती है और दोस्ती जानलेवा। भारत के लिए चीन से संबंधों में सुधार अच्छा कदम है। विश्व के मानचित्र पर एक नजर डालें तो पता चल जाएगा कि रूस, चीन और भारत कितने बड़े देश हैं। ये अगर एक साथ हों, तो एक नए विश्व की संरचना संभव है। ज्यादातर विदेश नीति जानकार मानते हैं कि भारत-अमेरिका के रिश्ते सिर्फ ट्रंप के कार्यकाल तक सीमित नहीं हैं। ये रिश्ते सालों में बने हैं और दोनों देशों के बीच गहरी रणनीतिक साझेदारी है। चीन के साथ अच्छे संबंध ठीक हैं, लेकिन चीन भारत का मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना रहेगा। हालांकि ट्रम्प की टैरिफ नीति और भारत, रूस, और चीन के संभावित गठजोड़ का वैश्विक शक्ति संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह गठजोड़ सफल होता है, तो यह वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में अमेरिका के एकध्रुवीय वर्चस्व को चुनौती दे सकता है। ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंच इस गठजोड़ को और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करे।
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