उत्तराखंड में Land Monetisation पर विवाद, सरकार ने कहा चुनिंदा भूखंडों से बढ़ेगा राजस्व

देहरादून में उत्तराखंड सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल सीमित सरकारी जमीनों का उपयोग आर्थिक विकास के लिए किया जा रहा है। प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम के अनुसार, अगले दो से तीन महीनों में छह-सात भूखंडों की बोली प्रक्रिया शुरू होगी। इससे आतिथ्य क्षेत्र में हजारों रोजगार सृजित होने और हर महीने करीब 300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
देहरादून, चार नवंबर उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीनों को मनमाने ढंग से निजी हाथों में सौंपने के कांग्रेस के आरोपों पर राज्य सरकार ने बुधवार को स्पष्ट किया कि आर्थिक गतिविधियों के लिए सरकारी जमीन के कुछ ही भूखंड चिह्नित किए गए हैं और उनका उपयोग प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। राज्य सरकार पर बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने बुधवार को राज्यव्यापी अभियान भूमि बचाओ, धामी हटाओ शुरू किया, जिसके तहत वरिष्ठ पार्टी नेताओं के नेतृत्व में राज्य के अलग-अलग शहरों में विरोध मार्च निकाले गए। कांग्रेस ने मसूरी में जॉर्ज एवरेस्ट की जमीन से जुड़े फैसले सहित इस प्रकार के अन्य फैसलों पर राज्य सरकार से पुनर्विचार करने की भी मांग की।
कांग्रेस महासचिव और प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने नयी दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीन और ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक इमारतों की नीलामी के लिए अकेले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जिम्मेदार हैं। यह कांग्रेस का कोई मनगढ़ंत आरोप नहीं है, बल्कि ऐसा सच है जो सरकार की अपनी फाइलों में दर्ज है।’’ यहां जारी एक बयान में प्रदेश के प्रमुख सचिव (नियोजन) आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि प्रदेश में परिसंपत्ति मुद्रीकरण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बारे में पहले भी तथ्यों के साथ जानकारी दी जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद इस मुद्दे पर भ्रामक धारणाएं बनाई जा रही हैं। किसी भी आर्थिक गतिविधि को शुरू करने के लिए भूमि को एक महत्वपूर्ण संसाधन बताते हुए सुंदरम ने कहा कि इसी दृष्टिकोण से राज्य की अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने तथा प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों को दोगुना करने की संभावनाओं पर पहले विस्तृत अध्ययन किया गया था।
उन्होंने कहा, ‘‘इस प्रक्रिया में यह विचार प्रमुखता से आया कि राज्य की उपलब्ध सरकारी भूमि का योजनाबद्ध और उत्पादक तरीके से उपयोग किया जाए, ताकि नयी आर्थिक गतिविधियां विकसित हों, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा हों और सरकार को भी राजस्व की प्राप्ति हो।’’ उन्होंने स्पष्ट किया कि इस उद्देश्य से सरकारी जमीन के कुछ चुनिंदा भूखंड चिह्नित किए गए हैं, जिनकी संख्या बहुत सीमित है और बड़े पैमाने पर सरकारी जमीनों को इस प्रक्रिया में शामिल किए जाने की बात तथ्यों के अनुरूप नहीं है। प्रमुख सचिव ने बताया कि अगले दो से तीन महीनों के भीतर लगभग छह-सात चयनित भूखंडों के लिए बोली प्रक्रिया शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने इस प्रक्रिया को राज्य में निवेश आकर्षित करने और आर्थिक संभावनाओं को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
सुंदरम ने कहा कि राज्य में धार्मिक, प्राकृतिक, साहसिक, आरोग्य और अन्य पर्यटन गतिविधियों के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं और ऐसे में यदि आतिथ्य के क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से निवेश आकर्षित किया जाता है तो इसका सीधा लाभ प्रदेश के युवाओं, स्थानीय कारोबारियों, छोटे उद्यमियों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों को मिलेगा। प्रमुख सचिव के अनुसार, आतिथ्य क्षेत्र में प्रस्तावित निवेश से लगभग 7,000 से 8,000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है, जबकि इससे जुड़ी अन्य आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से 10,000 से 15,000 और लोगों के लिए अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इन गतिविधियों से माल एवं सेवा कर (जीएसटी) और अन्य माध्यमों से राज्य को हर महीने लगभग 300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
उन्होंने कहा, ‘‘इस प्रकार यह पहल केवल भूमि के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, निवेश, स्थानीय व्यापार और राज्य की राजस्व क्षमता को बढ़ाने की एक व्यापक आर्थिक रणनीति का हिस्सा है।’’ प्रमुख सचिव ने कहा कि कई ऐसी जमीनों का जिक्र कर भ्रम पैदा किया जा रहा है, जिन्हें पहले ही प्रस्ताव से हटा दिया गया है और वे अब योजना का हिस्सा नहीं हैं। इस संबंध में उन्होंने चौबटिया के भूखंड का उदाहरण दिया और कहा कि व्यावहारिक नहीं पाए जाने के कारण इसे प्रस्ताव से हटा दिया गया था, जबकि धनोल्टी की जमीन वन भूमि होने के कारण उसे भी छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि एचएमटी की भूमि सिडकुल के पास है और यूआईआईडीबी की वर्तमान प्रक्रिया से उसका कोई संबंध नहीं है।
इसी प्रकार, ऋषिकेश स्थित आईडीपीएल की भूमि वन भूमि है जो अभी तक राज्य सरकार के किसी विभाग को हस्तांतरित भी नहीं हुई है। प्रमुख सचिव ने लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृहों के बारे में भी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि इनमें से कई परिसंपत्तियों के संबंध में न तो मंत्रिमंडल ने कभी मंजूरी दी है और न ही बोर्ड ने कोई अनुमोदन किया है। इसके बावजूद इन्हें प्रस्तावित योजनाओं का हिस्सा बताया जा रहा है।
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