Khurram Parvez की जमानत के खिलाफ Supreme Court पहुंची थी NIA, अर्जी खारिज

Khurram Parvez की जमानत के खिलाफ Supreme Court पहुंची थी NIA, अर्जी खारिज
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शीर्ष अदालत ने आतंकवाद रोधी कानून के मामले में कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को मिली राहत बरकरार रखी है। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने परवेज की लंबी कैद और शारीरिक निशक्तता को देखते हुए उन्हें जमानत दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने आतंकवाद रोधी कानून के तहत दर्ज एक मामले में जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को मिली जमानत को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। ‘जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी’ के कार्यक्रम समन्वयक और ‘एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉलंटरी डिसअपियरेंस’ के अध्यक्ष परवेज को एनआईए ने 22 नवंबर, 2021 को गिरफ्तार किया था। एनआईए ने आरोप लगाया था कि परवेज ने मानवाधिकार कार्यकर्ता की आड़ में लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के साथ साजिश रचकर पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने और भारत में आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए नेटवर्क संचालित किया।

परवेज ने आरोपों से इनकार किया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में 10 जून को उन्हें जमानत दी थी। उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली एनआईए की याचिका पर शुक्रवार को न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई।

पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने इस मामले में परवेज के चार साल से ज्यादा समय से जेल में रहने और मुकदमे के जल्द पूरा होने की कम संभावना को ध्यान में रखते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकार, गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी रोक से ज्यादा अहम हैं। उच्च न्यायालय यह भी कहा था कि 2004 में बारूदी सुरंग विस्फोट में एक पैर गंवा चुका आरोपी शारीरिक रूप से निशक्त है, इसलिए उसके मामले में विशेष रियायत पर विचार किया जाना चाहिए।

अदालत ने परवेज की जमानत अर्जी खारिज करने वाली निचली अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया था और आरोपी को कुछ शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। एनआईए ने यह भी आरोप लगाया कि परवेज नियंत्रण रेखा (एलओसी) के निकट सेना के वाहनों की आवाजाही, सड़कों की स्थिति, सेना के शिविरों तथा सेना, अर्द्धसैन्य बल और पुलिस के ढांचे से जुड़ी जानकारी जुटाने में सक्रिय रूप से शामिल था। परवेज के वकील ने उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी थी कि उनके खिलाफ केवल बयान होने और कोई ठोस सबूत नहीं होने से गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है।

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