Mock Parliament या Public Impeachment को लेकर क्या कहता है भारत का संविधान?

Indian Constitution
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हम आपको बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 85 स्पष्ट करता है कि संसद के सत्र बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। वहीं अनुच्छेद 174 के तहत राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है।

संसद में हंगामा और संसद के बाहर ड्रामा। यह लाइन आज के विपक्ष पर खूब फिट बैठती है। एक ओर संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जाता है दूसरी ओर किसी नेता के घर पर संसद की कार्यवाही का मंचन कर सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियान को 'जन महाभियोग' का नाम दे रहे विपक्षी दलों ने जिस मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया है उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि बात-बात पर संविधान की पुस्तक दिखाने वाले राहुल गांधी ने क्या संविधान को पढ़ा ही नहीं है? दरअसल भारतीय संविधान में किसी राजनीतिक दल, विपक्षी गठबंधन या संगठन को संसद अथवा विधानसभा का मॉक सत्र आयोजित कर उसे संवैधानिक कार्यवाही का स्वरूप देने या अपनी ओर से जन महाभियोग चलाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं के गठन, सत्र संचालन तथा महाभियोग जैसी प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट प्रावधान निर्धारित किए हैं। इसलिए इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के समानांतर राजनीतिक मंच खड़ा करना और उसे संसदीय या महाभियोग की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक मर्यादाओं और निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

संविधान में समानांतर संसद की कोई व्यवस्था नहीं

हम आपको बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 85 स्पष्ट करता है कि संसद के सत्र बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। वहीं अनुच्छेद 174 के तहत राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है। अनुच्छेद 118 संसद के दोनों सदनों को अपनी कार्यवाही संचालित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। इसका मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि संसद की बैठक, कार्यवाही, अध्यक्षता और विधायी निर्णय किसी राजनीतिक संगठन की मनमर्जी से नहीं चल सकते।

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साथ ही अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार भी इसी संवैधानिक संस्था और उसकी कार्यवाही से संबंधित हैं। किसी निजी आयोजन में शामिल होने वाले राजनीतिक नेताओं को इन विशेषाधिकारों का लाभ नहीं मिलता। इसलिए किसी आयोजन को संसद की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक अधिकारों और वास्तविक राजनीतिक गतिविधि के बीच की सीमा को धुंधला करता है।

2010 का मॉक पार्लियामेंट विवाद इसका प्रमाण है

उल्लेखनीय है कि 20 अगस्त 2010 को लोकसभा में हंगामे के बाद लगभग 70 सांसदों ने सदन के भीतर ही मॉक पार्लियामेंट आयोजित कर दी थी। इस घटना पर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने नाराजगी जताई थी। 25 अगस्त 2010 को हुई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस घटना पर खेद जताया था। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संसद जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यवाही का राजनीतिक प्रदर्शन स्वयं संसदीय व्यवस्था के भीतर भी गंभीर आपत्ति का विषय बना था।

साथ ही जन महाभियोग संविधान की निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग आयोजित करने का विचार इससे भी अधिक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए अनुच्छेद 124(4) में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है।

हम आपको बता दें कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर जांच समिति गठित होती है। आरोपों की जांच के बाद दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जनता की किसी प्रतीकात्मक संसद, राजनीतिक गठबंधन या पूर्व लोकसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता वाली निजी सभा के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं है।

इसलिए किसी राजनीतिक आयोजन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ आरोपों की सुनवाई करना, प्रतीकात्मक प्रस्ताव पारित करना या जन महाभियोग की घोषणा करना वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं हो सकता। ऐसे आयोजन से किसी संवैधानिक पदाधिकारी की स्थिति पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।

नाम बदलने से संवैधानिक प्रश्न समाप्त नहीं होता

साथ ही यदि मॉक पार्लियामेंट का नाम बदलकर जन संसद अथवा जन महाभियोग कर दिया जाए तो इससे उसकी संवैधानिक स्थिति नहीं बदल जाती। किसी आयोजन की वैधता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक गतिविधियों से निर्धारित होती है। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि संविधान शांतिपूर्ण विरोध और राजनीतिक अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों के आधार पर किसी को संसद की वैधानिक शक्तियां अथवा महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता।

इसलिए मॉक पार्लियामेंट को वास्तविक संसदीय सत्र और जन महाभियोग को वास्तविक संवैधानिक महाभियोग के रूप में पेश करना कानूनी रूप से निराधार है। ऐसी कार्यवाहियां किसी संवैधानिक निर्णय को जन्म नहीं दे सकतीं और न ही संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का स्थान ले सकती हैं।

बहरहाल, संविधान ने संसद बनाई है, राजनीतिक दलों को अपनी संसद बनाने का अधिकार नहीं दिया। संविधान ने महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की है, राजनीतिक मंचों को महाभियोग का फैसला सुनाने का अधिकार नहीं दिया। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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