Pakistan के खिलाफ Rajnath Singh के तेवर देख बगलें झांकने लगा America, India की Defence Diplomacy ने पूरी दुनिया में छोड़ा प्रभाव

Rajnath Singh
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आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के खिलाफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सख्त संदेश इस बात का संकेत है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा।

राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति ने अमेरिका के सामने भारत की सुरक्षा चिंताओं को जिस दृढ़ता और दोटूक अंदाज में रखा है, उसने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के मुद्दे पर वाशिंगटन को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया। एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी सहायता पैकेज पर भारत की कड़ी आपत्ति और पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील तकनीक के तीसरे देश तक पहुंचने की आशंका उठाकर राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपनी सुरक्षा के सवाल पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के खिलाफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सख्त संदेश इस बात का संकेत है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। देखा जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की रक्षा कूटनीति केवल बैठकों और औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की स्पष्ट पैरवी करने, मित्र देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की शर्तों को प्रभावी ढंग से सामने रखने का माध्यम भी है।

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हम आपको बता दें कि फिलीपींस के सेबू में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने अमेरिका के सामने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए सहायता पैकेज देने का मुद्दा उठाया। इसके साथ ही जापान और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रियों के साथ उनकी मुलाकातों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। राजनाथ सिंह ने भारत का पक्ष इतनी स्पष्टता से रखा कि वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता के दुष्परिणामों पर जवाब देना और इस्लामाबाद का बचाव करना मुश्किल हो गया। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के एफ-16 कार्यक्रम से जुड़े सहायता पैकेज पर भारत की गंभीर चिंता व्यक्त की। हम आपको बता दें कि अमेरिका का 64.9 करोड़ डॉलर का यह पैकेज पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों की परिचालन क्षमता और रखरखाव को मजबूत करने से जुड़ा है। इसमें एवियोनिक्स सुधार, तकनीकी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, सिमुलेटर और लॉजिस्टिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

भारत की आपत्ति का मूल प्रश्न यही है कि पाकिस्तान को मिलने वाली ऐसी सैन्य सहायता का वास्तविक इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा और इसका दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने वाले किसी भी कदम को नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखती है।

राजनाथ सिंह ने अमेरिकी पक्ष को इस बात के लिए भी आगाह किया कि पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील सैन्य तकनीक किसी तीसरे देश तक पहुंच सकती है। देखा जाये तो यह चिंता केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, हथियारों के प्रसार और व्यापक क्षेत्रीय सामरिक संतुलन से भी जुड़ी है।

राजनाथ सिंह की कूटनीतिक पहल का महत्व इस बात में है कि भारत ने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सीधे अमेरिकी नेतृत्व के सामने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रखा है। भारत ने यह संदेश दिया है कि रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वह चुप्पी नहीं साधेगा।

आतंकवाद पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा

राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ बातचीत के दौरान आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की नीति पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि आतंकवादी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण या वित्तीय सहायता देने वाले देशों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया सुसंगत और कठोर होना चाहिए। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भी सीमा पार आतंकवाद से मुकाबले में भारत के प्रति समर्थन दोहराया। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक आधार है, क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग तभी प्रभावी हो सकता है जब सुरक्षा संबंधी चिंताओं को केवल बयानों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीतियों में भी जगह मिले।

इसके अलावा, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के दस वर्षीय ढांचे की समीक्षा, सैन्य आदान-प्रदान, समुद्री सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं पर चर्चा से यह भी स्पष्ट होता है कि दोनों देश अपने सहयोग को व्यापक रणनीतिक दिशा देना चाहते हैं। भारत का प्रयास है कि अमेरिका के साथ साझेदारी मजबूत बनी रहे, लेकिन उसके साथ ही पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने जैसे मुद्दों पर भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज न किया जाए।

जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’: हिंद-प्रशांत में रणनीतिक संदेश

साथ ही राजनाथ सिंह की कूटनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उनकी बातचीत है। जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी के साथ चर्चा में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक जहाज निर्माण, डिजाइन और माइन काउंटरमेजर्स क्षमताओं में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को जोड़ने की संभावनाएं रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं।

जापान के साथ वायुसेना सहयोग बढ़ाने और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के बीच संपर्क मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। यह सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है; इसका उद्देश्य दीर्घकाल में रक्षा क्षमताओं, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना भी है।

ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के साथ बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आपसी समन्वय बढ़ाने पर चर्चा की। राजनाथ सिंह ने उन्हें फरवरी 2027 में बेंगलुरु में प्रस्तावित एयरो इंडिया में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया।

इसी बीच राजनाथ सिंह की जापानी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्षों के साथ तस्वीर तथा उनका संदेश, ‘JAI: Japan, Australia, India’, विशेष राजनीतिक और रणनीतिक महत्व रखता है। यह तीनों देशों के बीच सहयोग, विश्वास और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा हितों का प्रतीक है। एक स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित हिंद-प्रशांत भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी का प्रमुख आधार बना हुआ है।

राजनाथ सिंह के नेतृत्व में रक्षा कूटनीति का व्यापक दृष्टिकोण

इन बैठकों को एक साथ देखने पर राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति के दो महत्वपूर्ण आयाम सामने आते हैं। एक तो अमेरिका जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदार के सामने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के दुष्परिणामों पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराना। दूसरा, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ रक्षा, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना।

यही सक्रिय रक्षा कूटनीति की विशेषता है। भारत किसी एक देश के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर साझेदारियां मजबूत कर रहा है। वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय सहयोग का दायरा भी बढ़ाना चाहता है।

बहरहाल, पाकिस्तान को एफ-16 सहायता पर अमेरिकी मंत्री के सामने दोटूक आपत्ति और जापान-ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’ का संदेश, ये दोनों घटनाक्रम मिलकर भारत की उस रक्षा नीति को रेखांकित करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा पर दृढ़ता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का विस्तार साथ-साथ चलते हैं। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारत की रक्षा कूटनीति का यही व्यापक दृष्टिकोण उसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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