एक खास Community को Target कर रहा कानून, West Bengal में UCC पर बोले इमाम कासमी

Imam Maulana Mohammad Shafiq Qasmi
ANI
एकता । Jun 28 2026 5:36PM

पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर इमाम शफीक कासमी ने इसे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने वाला कानून बताया है। उन्होंने 'लव जिहाद' कानून पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि अंतर-धार्मिक विवाह के मामलों में दोनों पक्षों के लिए समान सजा हो तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में पेश होने वाले यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल को लेकर कोलकाता के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने अपनी बात रखी है। उन्होंने यूसीसी का विरोध करते हुए कहा, "यूनिफॉर्म सिविल कोड न तो इस देश के हित में है और न ही यहां के लोगों के हित में है।" उन्होंने आगे कहा कि अगर भारत में यूसीसी लागू होने से किसी भी एक कम्युनिटी को कोई फायदा हो रहा है, तो कृपया उसे सामने लाया जाए और बताया जाए।

इमाम ने कहा कि अगर इससे मुस्लिमों का नुकसान होता लेकिन हमारे हिंदू भाई-बहनों या दूसरी कम्युनिटीज का फायदा होता, तो भी इसे एक बार को स्वीकार किया जा सकता था। लेकिन किसी एक खास कम्युनिटी को टारगेट करके या उसे ध्यान में रखकर कोई कानून बनाना बिल्कुल भी सही नहीं है।

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'लव जिहाद' और 'लैंड जिहाद' कानून पर सरकार को संदेश

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 'लैंड जिहाद' और 'लव जिहाद' के खिलाफ कानून लाने के प्रस्ताव पर भी इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने खुलकर अपनी राय दी। उन्होंने सरकार को एक सीधा मैसेज देते हुए कहा, "मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि इस पूरे मामले पर बहुत ही शांत दिमाग से और बिना किसी धार्मिक या सांप्रदायिक पक्षपात के सोचने की जरूरत है, चाहे मामला 'लव जिहाद' का हो या किसी और तरह के 'जिहाद' का।" उन्होंने कहा कि सरकार के पास कानून बनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसमें भेदभाव नहीं होना चाहिए।

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सजा और कानून में बराबरी की मांग

इमाम कासमी ने कानून की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा तर्क दिया। उन्होंने पूछा, "अगर कोई हिंदू महिला किसी मुस्लिम पुरुष से शादी करती है, तो उसे तुरंत 'लव जिहाद' का नाम दे दिया जाता है, लेकिन तब क्या होता है जब कोई हिंदू पुरुष किसी मुस्लिम महिला से शादी करता है? क्या उस स्थिति के लिए भी ऐसा ही कानून बनाया जाएगा, और क्या उसमें भी बिल्कुल वही सजा दी जाएगी?" उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर दोनों ही मामलों में सजा और कानून पूरी तरह से एक समान रहते हैं, तो सरकार शौक से ऐसा कानून आगे बढ़ा सकती है, इस पर उन्हें या किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।

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