दुधवा बाघ अभयारण्य में चार वर्षों में 64 प्रतिशत बढ़ी बाघों की आबादी, संख्या हुई 135

Dudhwa Tiger
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उत्तर प्रदेश के दुधवा बाघ अभयारण्य में साल 2018 से 2022 के बीच बाघों की आबादी में 64 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अधिकारियों के मुताबिक बेहतर प्रबंधन और निगरानी के चलते बाघों की संख्या 82 से बढ़कर 135 हो गई है।

लखीमपुर खीरी (उप्र), 29 जुलाई अखिल भारतीय बाघ आकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के दुधवा बाघ अभयारण्य (डीटीआर) में 2018 और 2022 के बीच बाघों की संख्या में 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अधिकारियों के मुताबिक, बाघों की संख्या में यह वृद्धि बेहतर आवास प्रबंधन, प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संभव हुई है। डीटीआर के क्षेत्र निदेशक एवं मुख्य वन संरक्षक डॉ. एच. राजमोहन ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि 2018 में अभयारण्य में 82 बाघ थे और 2022 में यह संख्या बढ़कर 135 हो गई।

उन्होंने बताया कि अभयारण्य से सटे इलाकों को शामिल करने पर बाघों की संख्या 107 से बढ़कर 153 हो गई, जो करीब 43 प्रतिशत की वृद्धि है। राजमोहन ने कहा, ‘‘पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल, स्थानीय समुदायों के सहयोग और बेहतर आवास प्रबंधन ने बाघों की संख्या बढ़ाने में योगदान दिया है।’’ उन्होंने उम्मीद जताई कि अभयारण्य में बाघों की संख्या में वृद्धि का सिलसिला जारी रहेगा। राजमोहन उत्तर प्रदेश के चार बाघ अभयारण्यों में 2026 की बाघ गणना के नोडल अधिकारी भी हैं।

उन्होंने कहा कि बाघों की गणना के लिए कैमरा ट्रैप लगाने का काम नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच राज्य के सभी बाघ अभयारण्यों और उनसे सटे इलाकों में किया गया। उन्होंने कहा, ‘‘बाघों की तस्वीरें लेने के लिए करीब 1,800 कैमरे लगाए गए थे। पिछले महीने इन कैमरों से डेढ़ लाख से अधिक तस्वीरें प्राप्त हुईं।’’ राजमोहन ने बताया कि तस्वीरें देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजी गई हैं, जहां वैज्ञानिक अगले कुछ महीनों तक उनका विश्लेषण करेंगे, ताकि दुधवा समेत सभी अभयारण्यों में बाघों की संख्या का पता लगाया जा सके।

इस बीच, विश्व बाघ दिवस के अवसर पर दुधवा बाघ अभयारण्य में मंगलवार को 24 घंटे की लंबी दूरी की गश्त पूरी की गई। अभयारण्य के उप निदेशक जगदीश आर. ने बताया कि सोमवार को शुरू हुए इस अभियान में उप प्रभागीय अधिकारी और क्षेत्रीय अधिकारियों से लेकर वनरक्षकों तथा निगरानी कर्मियों तक ने हिस्सा लिया। अभयारण्य के सभी हिस्सों तक पहुंचने के लिए हाथियों, चार पहिया और दोपहिया वाहनों, ट्रैक्टरों तथा नावों का इस्तेमाल किया गया।

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