भारत ने खोल दिए चीन के लिए दरवाजे, दे दी बड़ी छूट

साल 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद से ही भारत सरकार ने चीनी मूल की कंपनियों को भारत के सरकारी परियोजनाओं में टेंडर डालने के लिए एक विशेष तरीके के पैनल में रजिस्ट्रेशन कराने की प्रक्रिया लाई थी। जिसके बाद उन्हें राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया था। लेकिन अब चीन की इन चार कंपनियों को इससे छूट दे दी गई है।
भारत और चीन के रिश्तों से जुड़ी एक बेहद अहम खबर इस वक्त सामने आ रही है जो इसी ओर इशारा करती है कि भारत और चीन के संबंध अब बेहतर होते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने चार चीनी मूल की कंपनियों को भारत की सरकारी बिजली परियोजनाओं में बोली लगाने की अनुमति दे दी है। हालांकि यह मंजूरी कुछ खास शर्तों के साथ और सीमित समय के लिए दी गई है। लेकिन इसे बेहद बड़ा कदम माना जा रहा है। क्योंकि साल 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद से ही भारत सरकार ने चीनी मूल की कंपनियों को भारत के सरकारी परियोजनाओं में टेंडर डालने के लिए एक विशेष तरीके के पैनल में रजिस्ट्रेशन कराने की प्रक्रिया लाई थी। जिसके बाद उन्हें राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया था। लेकिन अब चीन की इन चार कंपनियों को इससे छूट दे दी गई है।
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वित्त मंत्रालय के 24 जून के आदेश के मुताबिक TV एनर्जी नजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नर्थ ईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया, यह वो चार चीनी कंपनियां हैं जो अब सरकारी टेंडर में हिस्सा ले पाएंगी। सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह भारत की तेजी से बढ़ती हुई बिजली की जरूरत को देखा जा रहा है। जहां देश में लगातार नए ट्रांसमिशन नेटवर्क बनाए जा रहे हैं। ताकि बढ़ती बिजली मांग को पूरा किया जा सके और सोलर एंड विंड एनर्जी जैसी रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं को भी राष्ट्रीय ग्रिड के साथ जोड़ा जा सके। ऐसे में सरकार को बड़े पैमाने पर पावर इक्विपमेंट की जरूरत है और इसलिए चीनी कंपनियां भी भारतीय बाजार में अब आ रही हैं।
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जानकारी के मुताबिक इसकी आवश्यकता को देखते हुए साल 2026 की जनवरी में बिजली मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से उन विदेशी कंपनियों को राहत देने का अनुरोध किया था जिनकी फैक्ट्रियां भारत में हैं और जो पहले से बिजली क्षेत्र में काम कर रही हैं। लेकिन यह छूट केवल उन्हीं कंपनियों को मिली है जिनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भारत में मौजूद है। यानी कि उनके इक्विपमेंट का निर्माण भारत में ही होता है।
हालांकि इस फैसले का यह मतलब नहीं है कि भारत ने चीन पर लगाई गई सभी पाबंदियों को हटा दिया है। आपको बता दें कि साल 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद से ही भारत ने फैसला लिया था कि चीनी कंपनियों पर सख्त प्रतिबंध लगाए जाएंगे और इसके बाद चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों में हिस्सा लेने के लिए सरकार ने विशेष पैनल में पंजीकरण कराना, राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया था। यानी कि सुरक्षा से जुड़े नियमों को पूरी तरह खत्म अभी नहीं किया गया है। सरकार ने साफ किया कि यह छूट केवल इन चार कंपनियों के लिए है और यह आदेश सिर्फ 2 साल के लिए लागू रहेगा। इसके अलावा सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि इससे भविष्य में दूसरी कंपनियों के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा।
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भारत फिलहाल अपने एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से मजबूत करने पर काम कर रहा है। आने वाले सालों में देश को हजारों किलोमीटर नई बिजली ट्रांसमिशन लाइनें और आधुनिक सबस्टेशन तैयार करने हैं। ऐसे में जहां तकनीकी क्षमता और उत्पादन पहले से ही भारत में मौजूद है, वहां पर सरकार सीमित और नियंत्रित तरीके से इन कंपनियों को अवसर देने का फैसला किया है। यानी कि एक तरफ भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रख रहा है। तो वहीं दूसरी तरफ बिजली क्षेत्र की जरूरतों और विकास परियोजनाओं को भी प्राथमिकता दे रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले 2 सालों में यह चार कंपनियां भारत की एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में कितना योगदान देती है और क्या भविष्य में सरकार इस नीति का दायरा बढ़ा सकती है या फिर इसे केवल इसी सीमित दायरे तक रखा जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि सरकार का यह फैसला भारत की ऊर्जा जरूरतों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
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