बड़ी बढ़त...अब्दुल ने अमेरिका में कर दिया खेल! ट्रंप की कुर्सी पर संकट? क्या है इसका भारतीय कनेक्शन

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले आए एक सर्वे के अनुसार, छह रिपब्लिकन गढ़ों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। महंगाई और रोजमर्रा की बढ़ती कीमतें ट्रंप की पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं। इसके अलावा, भारतीय कंसल्टेंसी फर्मों द्वारा फर्जी सोशल मीडिया खातों के जरिए चुनावी प्रचार को प्रभावित करने के आरोपों से विवाद छिड़ गया है।
अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों से ठीक पहले एक तरफ ईरान में सिलसिलेवार धमाकों की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। चुनाव से पहले सामने आए एक सर्वे ने अमेरिकी राजनीति में हलचल मचा दी है। जिन सात राज्यों में लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा रहा है, उनमें से छह राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रंप की पार्टी को अपने ही गढ़ में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है।
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मिशिगन: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सईद को 53% समर्थन मिला, जबकि रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को 42% वोट मिलते दिख रहे हैं।
मेन: ट्रॉय जैक्सन 51% के साथ आगे हैं, जबकि रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कोलिन्स को 45% समर्थन मिला है।
टेक्सास: डेमोक्रेटिक प्रत्याशी जेम्स तलारिको को 50% और रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को 43% समर्थन हासिल है।
कैनसस: एडम हैमिल्टन 49% के साथ बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि रोजर मार्शल को 44% समर्थन मिला है।
ओहायो: शेरोड ब्राउन 49% पर हैं और जॉन हस्टेड को 44% समर्थन मिला है।
अलास्का: मैरी पेल्टोला 48% के साथ आगे हैं, जबकि डैन सुलिवन को 46% समर्थन प्राप्त है।
आयोवा: यहां मुकाबला बेहद कड़ा है, जहां डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जोश ट्यूरेक को 48% और रिपब्लिकन उम्मीदवार एशले हिंसन को 47% समर्थन मिलता दिख रहा है।
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इस सर्वे में महंगाई और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतों को लेकर जनता में गहरी नाराज़गी भी खुलकर सामने आई है। इस मुद्दे पर डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन्स के मुकाबले 9% की बढ़त हासिल हुई है। इसके अलावा, निर्दलीय (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं के बीच भी सभी सातों राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को ही आगे बताया गया है। युद्ध से निपटने और आम अमेरिकियों के लिए बेहतर काम करने के सवाल पर भी डेमोक्रेट्स बढ़त बनाते दिखे हैं। हालांकि, इस अमेरिकी चुनाव में एक और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि भारतीय कंसल्टेंसी कंपनियां और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स अमेरिकी उम्मीदवारों के पक्ष में ऑनलाइन प्रचार कर रहे हैं। 'अल जज़ीरा' की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कंसल्टेंट्स पैसे लेकर फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स बनाते हैं और उनके जरिए उम्मीदवारों के समर्थन में पोस्ट व वीडियो फैलाते हैं। यह भी आरोप है कि विपक्षी नेताओं के भाषणों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है और मतदाताओं की राय बदलने के लिए उनके खिलाफ भ्रामक दावे फैलाए जाते हैं। यह गतिविधि सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं बताई जा रही है; रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंसल्टेंट्स अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और पड़ोसी देशों के चुनावों में भी ऐसी ही सेवाएं दे रहे हैं।
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अब सवाल उठता है कि यह ऑनलाइन प्रचार अभियान कैसे चलाया जाता है? रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ भारतीय कंसल्टेंसी फर्में पुराने सोशल मीडिया पेज खरीदती हैं। वे नए अकाउंट्स तैयार करती हैं या पुराने पेजों का नाम बदल देती हैं। इसके बाद इन पेजों से ऐसे वीडियो और पोस्ट शेयर किए जाते हैं, जिन्हें किसी उम्मीदवार की आधिकारिक टीम अपने निजी अकाउंट्स से पोस्ट नहीं करना चाहती। सोशल मीडिया अकाउंट्स के अलावा इस कैंपेनिंग के बदले होने वाले वित्तीय लेन-देन पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। कुछ कंसल्टेंट्स ने खुलासा किया कि कागजों पर किसी व्यक्ति को अन्य काम के लिए रखे जाने का दिखावा करने के लिए विदेशी कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि हकीकत में उन्हें चुनावी प्रचार के लिए पैसे दिए जाते हैं। कुछ कंपनियों पर हवाला के जरिए रकम ट्रांसफर करने के भी आरोप हैं—जहां बैंकिंग व्यवस्था की जगह अलग-अलग ठिकानों पर बैठे एजेंटों के नेटवर्क के जरिए पैसा भेजा जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका के इस मध्यावधि चुनाव का मुकाबला अब सिर्फ डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ जहां ट्रंप की लोकप्रियता, महंगाई और चुनावी सर्वे उनकी पार्टी के लिए कड़ी चुनौती बने हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेशी सोशल मीडिया अभियानों और कथित फर्जी अकाउंट्स के मामले ने चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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