Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet?

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हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

एक तरफ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गले मिल रहे थे, भारत के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति का ऐलान हो रहा था और दूसरी तरफ उसी उज्बेकिस्तान की धरती पर चीन के J-10CE लड़ाकू विमान उतर रहे थे। यही है नई दुनिया की राजनीति, जहां मुस्कुराहटों के पीछे हित हैं, समझौतों के पीछे शक्ति है और दोस्ती की असली कीमत रणनीतिक क्षमता से तय होती है।

भारत को इस तस्वीर को सिर्फ एक रक्षा सौदे के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। मध्य एशिया में चीन अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए सिर्फ सड़कें और निवेश नहीं, अब लड़ाकू विमान भी भेज रहा है। हम आपको बता दें कि उज्बेक वायुसेना ने चीन के चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की पहली खेप हासिल कर ली है। पाकिस्तान के बाद उज्बेकिस्तान इस चीनी लड़ाकू विमान को संचालित करने वाला दूसरा विदेशी देश बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार उज्बेकिस्तान ने 24 J-10CE विमानों का ऑर्डर दिया है और इसमें कम से कम छह विमान देश को मिल चुके हैं। ये विमान उज्बेकिस्तान के 35वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पहुंचे। सवाल उठता है कि चीन आखिर मध्य एशिया के आसमान में अपनी सैन्य मौजूदगी क्यों बढ़ाना चाहता है?

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उल्लेखनीय है कि J-10CE कोई साधारण विमान नहीं है। चीन इसे अपनी एयरोस्पेस ताकत के प्रतीक के रूप में पेश करता है। ‘विगोरस ड्रैगन’ नाम वाला यह लड़ाकू विमान आधुनिक AESA रडार, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम और उन्नत एवियोनिक्स से लैस है। इसके पास लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी विमानों द्वारा इस्तेमाल की गई ऐसी मिसाइलों से जुड़े अवशेष पंजाब के खेतों में मिलने की खबरों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का ध्यान इस चीनी हथियार प्रणाली की ओर खींचा था। साथ ही चीनी संस्करणों में PL-17 जैसी अत्यंत लंबी दूरी की मिसाइल भी शामिल है, जिसकी घोषित रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है। ऐसी मिसाइलों का उद्देश्य लड़ाकू विमानों के पीछे छिपे बड़े रणनीतिक प्लेटफॉर्म जैसे AEW&CS और हवाई ईंधन भरने वाले विमान, आदि को निशाना बनाना होता है। यानी चीन केवल फाइटर जेट नहीं बेच रहा। वह हथियार, सेंसर, प्रशिक्षण, रखरखाव और भविष्य की सैन्य निर्भरता का पूरा पैकेज बेच रहा है। यही चीन की असली रणनीति है।

वैसे J-10CE चीन का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं है। वह भूमिका J-20 जैसे स्टील्थ विमानों की है। लेकिन निर्यात बाजार में J-10CE कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। एक इंजन वाला यह विमान अपेक्षाकृत कम लागत में आधुनिक रडार, मिसाइल और एवियोनिक्स उपलब्ध कराता है। हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। ट्विन-इंजन विमानों की तुलना में कम रेंज, सिंगल-इंजन सर्वाइवलिटी का जोखिम, रूसी इंजनों पर पुरानी निर्भरता और रडार पर अधिक दृश्यता इसे अत्याधुनिक विमानों की अपेक्षा कमजोर बनाती हैं। लेकिन सस्ता और आधुनिक विकल्प तलाश रहे देशों के लिए ये कमियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं।

हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अगर बांग्लादेश भी J-10CE खरीदता है, तो भारत के आसपास और व्यापक क्षेत्र में चीनी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी बढ़ सकती है। इसलिए यह भारत के लिए चिंता की बात भी है।

हालांकि रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि चीन के रक्षा निर्यात में वैश्विक स्तर पर गिरावट आई है। SIPRI के अनुसार वैश्विक हथियार खरीद बढ़ने के बावजूद चीन की बाजार हिस्सेदारी घटी है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में हथियारों की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ी, लेकिन चीन इस बाजार का बड़ा लाभ नहीं उठा पाया। चीन के रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पर केंद्रित रहा है। ऐसे में उज्बेकिस्तान का सौदा चीन के लिए व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में सैन्य दरवाजा खोलने का मौका है।

उधर, भारत-उज्बेकिस्तान के संबंधों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति मिर्जियोयेव ने दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की है। देखा जाये तो भारत के लिए यह मामूली समझौता नहीं है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय यूरेनियम आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यह व्यवस्था सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ती है। प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान उन्हें देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ओली दर्जाली दोस्तलिक’ से भी सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं का गर्मजोशी से मिलना और गले लगना भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की बढ़ती निकटता का स्पष्ट संदेश था। लेकिन राष्ट्रहित की राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उज्बेकिस्तान भारत का साझेदार हो सकता है, लेकिन वह चीन से हथियार भी खरीदेगा। क्योंकि ताशकंद अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से चलाएगा। भारत भी यही कर रहा है मगर अब और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से इसे करना होगा।

देखा जाये तो भारत दशकों तक मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करता रहा है। लेकिन अब मुकाबला इतिहास का नहीं, हार्ड पावर का है। चीन निवेश लेकर आता है, इंफ्रास्ट्रक्चर लेकर आता है और अब आधुनिक हथियार लेकर भी पहुंच रहा है। नई दिल्ली को समझना होगा कि केवल दोस्ती, सम्मेलन और सांस्कृतिक रिश्ते पर्याप्त नहीं हैं। जहां चीन फाइटर जेट बेच रहा है, वहां भारत को भी अपनी रक्षा क्षमता लेकर पहुंचना होगा। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हैं, तेजस जैसे लड़ाकू विमान हैं, आकाश जैसी वायु रक्षा प्रणाली है और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। भारत को मध्य एशिया में रक्षा निर्यात, संयुक्त उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय हथियार बनाना होगा।

भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मध्य एशिया पूरी तरह चीनी सैन्य उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता पर निर्भर न हो जाए। क्योंकि एक बार कोई देश किसी रक्षा प्लेटफॉर्म के इकोसिस्टम में फंसता है तो उसके साथ दशकों की निर्भरता जुड़ जाती है। यही चीन की सबसे खतरनाक रणनीतिक ताकत है। आज विमान बिकता है, कल मिसाइल बिकती है। फिर प्रशिक्षण आता है, रखरखाव आता है, स्पेयर पार्ट्स आते हैं और अंततः सैन्य रिश्तों की ऐसी जंजीर बन जाती है जिसे तोड़ना आसान नहीं होता। देखा जाये तो उज्बेकिस्तान का J-10CE सौदा भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य मोर्चा नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। चीन मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और भारत को इसका जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति से देना होगा।

ताशकंद का यह पूरा घटनाक्रम भारत के सामने नई सच्चाई रखता है। एक तरफ मोदी के साथ यूरेनियम की साझेदारी है। दूसरी तरफ चीन के साथ फाइटर जेट की डील है। यानी मैदान खुला है और मुकाबला जारी है। भारत के लिए संदेश साफ है कि मध्य एशिया में जगह किसी की विरासत से तय नहीं होगी, बल्कि उसकी ताकत से तय होगी। चीन वहां पहुंच चुका है। अब भारत को सिर्फ पहुंचना नहीं है, भारत को अपनी मौजूदगी इतनी मजबूत करनी होगी कि मध्य एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई दिल्ली को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव न रहे।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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