“मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर”

Makhana
ANI

आधुनिक दुनिया में जब स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता चरम पर है और लोग प्रसंस्कृत अथवा जंक फूड के विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तब मखाना एक बेहतरीन प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प बनकर उभरा है। मखाने में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, घुलनशील और अघुलनशील फाइबर तथा जटिल कार्बोहाइड्रेट्स पाए जाते हैं।

भारत में सदियों से व्रत-त्योहारों और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा मखाना अब महज एक साधारण खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर में स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनकर एक वैश्विक सुपरफूड के रूप में उभर रहा है। फॉक्स नट्स, कमल गट्टा या वैज्ञानिक नाम युरीअल फेरोक्स (Euryale ferox) के नाम से जाना जाने वाला यह प्राकृतिक उपहार अपनी अद्वितीय न्यूट्रिशनल प्रोफाइल, कम कैलोरी और समृद्ध स्वास्थ्य लाभों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहा है। भारतीय कृषि एवं बागवानी क्षेत्र में मखाने ने हाल के वर्षों में जो छलांग लगाई है, वह न केवल भारत की पारंपरिक कृषि शक्ति को दर्शाती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान कल्याण और निर्यात संवर्धन के क्षेत्र में भी एक नए स्वर्णिम युग का सूत्रपात कर रही है। भारत दुनिया भर में मखाना उत्पादन में एकछत्र वर्चस्व रखता है और वैश्विक आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा अकेले भारत से आता है। देश में मखाने के उत्पादन में लगातार ऐतिहासिक वृद्धि देखने को मिल रही है। उत्पादन में इस उल्लेखनीय उछाल के साथ-साथ उत्पादकता के मोर्चे पर भी देश ने अभूतपूर्व प्रगति की है। प्रति हेक्टेयर उपज में हुई यह वृद्धि वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्म के बीजों और किसानों की कड़ी मेहनत का प्रत्यक्ष परिणाम है।

भारत में मखाने के इस विशाल साम्राज्य का मुख्य केंद्र बिहार राज्य है, जो देश के कुल मखाना उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देता है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा जैसे मिथिलांचल के जिले मखाना खेती के गढ़ माने जाते हैं। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, उथले पानी के तालाब, दलदली भूमि और अनुकूल आर्द्र जलवायु मखाने के पौधे के विकास के लिए अत्यंत आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी मखाने की खेती का दायरा तेजी से फैल रहा है। मखाने का भौगोलिक महत्व इस बात से भी सिद्ध होता है कि बिहार के मखाने को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग प्राप्त हो चुका है, जिसने इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिकता और पहचान को एक नया आयाम दिया है।

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आधुनिक दुनिया में जब स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता चरम पर है और लोग प्रसंस्कृत अथवा जंक फूड के विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तब मखाना एक बेहतरीन प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प बनकर उभरा है। मखाने में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, घुलनशील और अघुलनशील फाइबर तथा जटिल कार्बोहाइड्रेट्स पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस, कैल्शियम और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सोडियम की मात्रा बेहद कम होती है, यह पूरी तरह से वसा-मुक्त और कोलेस्ट्रॉल-मुक्त होता है, तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी काफी कम होता है। इन विशेषताओं के कारण यह मधुमेह रोगियों, हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों और वजन कम करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक आदर्श आहार माना जाता है। इसमें मौजूद शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट्स असमय बुढ़ापे को रोकने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के लिए मखाना प्रोटीन का एक अत्यंत सुलभ और स्वस्थ स्रोत बनकर उभरा है।

मखाने की यात्रा खेत के दलदल से निकलकर डाइनिंग टेबल तक पहुँचने में कई जटिल और श्रमसाध्य चरणों से होकर गुजरती है, जो इसकी संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण करती है। इसकी प्रक्रिया प्राथमिक और द्वितीयक दो स्तरों पर होती है। प्राथमिक स्तर पर किसान और मजदूर बेहद विषम परिस्थितियों में पानी के भीतर उतरकर तालाब की तलहटी से मखाने के कटीले बीजों की कटाई और संग्रहण करते हैं। इसके बाद इन बीजों को साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। इसके पश्चात द्वितीयक प्रसंस्करण शुरू होता है, जिसमें सूखे बीजों को मिट्टी या लोहे की कड़ाही में उच्च तापमान पर भुना जाता है। भुनाई के तुरंत बाद लकड़ी के हथौड़ों से मारकर बीजों को फोड़ा जाता है, जिससे उनके भीतर का सफेद और हल्का गुदा बाहर आ जाता है और हमें हमारा परिचित पॉप्ड मखाना प्राप्त होता है। इसके बाद मखाने की ग्रेडिंग, साइजिंग, पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है। मखाने के आकार और सफेदी के आधार पर उसकी बाजार कीमत तय होती है, जहाँ बड़े आकार के मखाने को प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है।

वैश्विक बाजार में भारत का मखाना अपनी गुणवत्ता और विशिष्टता के बल पर तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। भारत हर वर्ष अपने कुल मखाना उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा दुनिया के विभिन्न देशों में निर्यात करता है। भारत के मखाना निर्यात का एक बड़ा हिस्सा विकसित देशों में जाता है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख हैं। ये देश भारत से बड़े पैमाने पर मखाना आयात करते हैं। इसके अतिरिक्त यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के देशों में भी 'क्लीन-लेबल' और 'प्लांट-बेस्ड सुपरफूड' के रूप में भारतीय मखाने की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फ्लेवर्ड मखाना, जैसे चीज़ी, रोस्टेड, पेरी-पेरी और मखाना पाउडर के रूप में मूल्य संवर्धित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं को अत्यधिक आकर्षित कर रहे हैं।

मखाना क्षेत्र के इस विशाल सामर्थ्य और रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए भारत सरकार ने इसके सर्वांगीण विकास के लिए कई दूरगामी और संरचनात्मक पहल की हैं। मखाने के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक लाने और किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के उद्देश्य से सरकार ने विशेष योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। यह महत्वाकांक्षी प्रयास वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की सुलभता, किसानों के कौशल विकास, कटाई के बाद के नुकसान को रोकने, स्वचालित पॉपिंग और ग्रेडिंग मशीनों की स्थापना, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात संवर्धन पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। इन योजनाओं के माध्यम से देश भर के हजारों किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा ने इस क्षेत्र को संस्थागत मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है।

जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर मखाने की मांग बढ़ रही है, घरेलू बाजार में भी इसके मूल्य और व्यावसायिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। घरेलू स्तर पर मखाना बाजार अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत का मखाना उद्योग एक विशाल वित्तीय आकार ले लेगा। इस बढ़ती मांग के चलते मखाने की कीमतों में भी भारी उछाल आया है, जिससे किसानों और व्यापारियों के लिए यह फसल अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो रही है। पारंपरिक रूप से उपेक्षित रहने वाला यह क्षेत्र अब एफएमसीजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और कृषि-उद्यमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। आधुनिक पैकेजिंग, संगठित खुदरा श्रृंखलाओं और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने मखाने को दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचा दिया है।

हालाँकि इस अपार सफलता के बावजूद मखाना क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। पारंपरिक तालाब आधारित खेती में शारीरिक श्रम की अत्यधिक आवश्यकता होती है और पानी के अंदर से बीज निकालना बेहद कठिन काम है, जिससे श्रम की कमी एक बड़ी बाधा बनती जा रही है। इसके अलावा प्राथमिक प्रसंस्करण का पारंपरिक और अमशीनीकृत होना, भंडारण की अपर्याप्त सुविधा और मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों का प्रभाव किसानों के मुनाफे को प्रभावित करता है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा मखाने की खेत आधारित वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक गहराई वाले तालाबों के बजाय समतल खेतों में निश्चित मात्रा में पानी भरकर मखाने की खेती करने की तकनीक विकसित की गई है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि की जा सकती है।

संक्षेप में, मखाना भारत की कृषि-संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं का एक अनूठा और सफल संगम बन चुका है। तालाबों के कीचड़ से निकलकर दुनिया भर के सुपरमार्केट्स और अंतरराष्ट्रीय डाइनिंग टेबल्स तक पहुँचने की मखाने की यह यात्रा भारत की कृषि-समृद्धि की एक नई गाथा लिख रही है। रिकॉर्ड उत्पादन और बढ़ती उत्पादकता यह सिद्ध करती है कि भारत न केवल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है, बल्कि दुनिया की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। सरकारी योजनाओं के समर्थन, वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश, बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण और निर्यात के नए अवसरों के साथ मखाना क्षेत्र भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और भारतीय उत्पादों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

- डॉ. दीपक कोहली, 

पर्यावरणविद ,वरिष्ठ विज्ञान लेखक, विशेष सचिव, 

उत्तर प्रदेश सचिवालय 5/104, 

विपुल खंड, गोमती नगर, 

लखनऊ- 226010 

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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