"ग्रामीण भारत के 30% स्कूलों में मैदान नहीं, कहीं झाड़ियाँ उगीं तो कहीं दबंगों का कब्ज़ा"

संसाधनों की यह कमी केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि उपकरणों के स्तर पर भी काफी चिंताजनक है। बजट का अभाव ग्रामीण विद्यालयों के लिए सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा का अधिकांश बजट शिक्षकों के वेतन और मिड-डे मील जैसी अनिवार्य योजनाओं में ही समाप्त हो जाता है, जिससे खेलों के लिए नगण्य राशि बचती है।
भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में बसती है, जहाँ की मिट्टी ने मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा और नीरज चोपड़ा जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में खेलों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। विभिन्न शिक्षा रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों (जैसे UDISE+) के अनुसार, आज भी लगभग 30 प्रतिशत से अधिक सरकारी स्कूलों के पास अपना स्वयं का खेल का मैदान नहीं है। जहाँ मैदान उपलब्ध भी हैं, वहाँ उनका रखरखाव इतना खराब है कि वे खेल गतिविधियों के लिए सुरक्षित नहीं माने जा सकते। बाउंड्री वॉल का न होना, मैदान में झाड़ियाँ उगना या स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण करना एक आम समस्या बन गई है, जिसके कारण बच्चों को सड़कों या संकरी गलियों में खेलने को मजबूर होना पड़ता है।
संसाधनों की यह कमी केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि उपकरणों के स्तर पर भी काफी चिंताजनक है। बजट का अभाव ग्रामीण विद्यालयों के लिए सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा का अधिकांश बजट शिक्षकों के वेतन और मिड-डे मील जैसी अनिवार्य योजनाओं में ही समाप्त हो जाता है, जिससे खेलों के लिए नगण्य राशि बचती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक बड़े प्रतिशत स्कूलों में खेल के नाम पर केवल एक फटी हुई फुटबॉल या कुछ पुराने क्रिकेट बैट ही होते हैं। बास्केटबॉल, वॉलीबॉल या एथलेटिक्स जैसे खेलों के लिए आवश्यक नेट, पोल और ट्रैक तो ग्रामीण भारत के अधिकांश विद्यालयों के लिए आज भी एक विलासिता जैसे हैं। इसके अतिरिक्त, शारीरिक शिक्षकों के रिक्त पद एक और गंभीर संकट हैं। देश के लगभग 50 प्रतिशत ग्रामीण माध्यमिक स्कूलों में प्रशिक्षित खेल प्रशिक्षक नहीं हैं, जिसके कारण बच्चों को खेलों की बारीकियों और नियमों की जानकारी नहीं मिल पाती। बिना सही मार्गदर्शन के, प्रतिभाशाली बच्चे भी जिला या राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।
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सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को वह सहयोग नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी 'पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब' वाली कहावत हावी है, जहाँ खेलों को पढ़ाई में बाधा माना जाता है। केंद्र सरकार की 'खेलो इंडिया' जैसी योजनाएं निस्संदेह सराहनीय हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ अभी भी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक ही सिमटा हुआ है। ग्रामीण ब्लॉकों में इन योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद सुस्त है। संसाधनों के इस अभाव का सीधा परिणाम ग्रामीण युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। खेलों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल गेमिंग और डिजिटल व्यसनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो हमें अपनी नीतियों के केंद्र में ग्रामीण विद्यालयों को रखना होगा। जब तक गाँव के हर स्कूल में एक समतल मैदान, आवश्यक खेल उपकरण और एक समर्पित कोच की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 'फिट इंडिया' और ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना अधूरा ही रहेगा। इसके लिए पंचायत स्तर पर बजटीय आवंटन बढ़ाना और निजी क्षेत्रों को खेल बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना अनिवार्य है।
- भारत भूषण अड़जरिया
(मीडिया प्रभारी, दिल्ली विश्वविद्यालय)
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