नेहरू ने जिसे बोला था भाई वो निभाता रहा दुश्मनी, मगर अब 'दोस्त' बन कर दिल्ली आ रहा है!

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माना जा रहा है कि शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आ सकते हैं। यह यात्रा कई मायनों में असाधारण होगी। यदि यह योजना अंतिम रूप लेती है तो शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आएंगे।

नेहरू ने जिस चीन को कभी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ गले लगाया था, उसने भारत के साथ दोस्ती से ज्यादा दुश्मनी निभाई। 1962 की धोखाधड़ी से लेकर गलवान की खूनी झड़प तक, सीमा पर तनाव, घुसपैठ और सामरिक दबाव, बीजिंग का ट्रैक रिकॉर्ड भारत के सामने साफ है। लेकिन अब वही चीन दोस्ती, स्थिरता और सहयोग की भाषा बोलते हुए दिल्ली आने की तैयारी कर रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। यहां सवाल यह है कि क्या चीन वास्तव में रिश्ते सुधारना चाहता है, या बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत के साथ सामरिक समीकरण को अपने हित में ढालना चाहता है?

माना जा रहा है कि शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आ सकते हैं। यह यात्रा कई मायनों में असाधारण होगी। यदि यह योजना अंतिम रूप लेती है तो शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आएंगे। इस यात्रा की सबसे दिलचस्प बात उनके साथ आने वाला विशाल चीनी प्रतिनिधिमंडल है। बताया जा रहा है कि शी जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारी भारत आ सकते हैं। यह संख्या उनकी 2019 की भारत यात्रा के दौरान आए चीनी अधिकारियों की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा है। उस समय प्रतिनिधिमंडल में 200 से कम अधिकारी शामिल थे।

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भारतीय सूत्रों के अनुसार, चीनी अधिकारी होटल, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। हालांकि शी जिनपिंग की यात्रा योजना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संभावित द्विपक्षीय बैठक का एजेंडा अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने भी फिलहाल यात्रा की औपचारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन इतना जरूर कहा है कि चीन BRICS सहयोग को बहुत महत्व देता है और भारत की अध्यक्षता में होने वाले इस वर्ष के BRICS शिखर सम्मेलन की सफलता का समर्थन करता है। यानी संदेश साफ है कि बीजिंग अभी अंतिम घोषणा से बच रहा है, लेकिन दिल्ली की दिशा में उसकी कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं।

देखा जाये तो भारत और चीन के बीच संबंध किसी सामान्य कूटनीतिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं हैं। दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें गहरी हैं और इसका सबसे बड़ा कारण है चीन का सीमा पर लगातार आक्रामक रवैया। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को लगभग सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इस संघर्ष में 20 भारतीय जवान शहीद हुए, जबकि चीन को भी बड़ा सैन्य नुकसान हुआ। इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक भारी सैन्य तनाव बना रहा। हजारों सैनिक, भारी हथियार, तोपखाना और सैन्य ढांचा सीमा के संवेदनशील इलाकों में तैनात रहा। आखिरकार अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद तनाव कम करने की दिशा में प्रगति हुई। लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ है। सैन्य गतिरोध के कुछ मोर्चे शांत जरूर हुए हैं, मगर मूल विवाद अब भी जस का तस है। यही कारण है कि चीन की मौजूदा ‘दोस्ती’ को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से परखा जाएगा।

उधर, शी जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क तेज हो गए हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि अजित डोभाल बीजिंग में हैं। 25 अगस्त को डोभाल ने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक और बहुपक्षीय मंचों पर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की। डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता के 25वें दौर में भी हिस्सा लिया। इन वार्ताओं में केवल सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

यहां भारत की रणनीति को समझना बेहद जरूरी है। दिल्ली ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत-चीन संबंधों को केवल व्यापार, BRICS या बहुपक्षीय सहयोग के सहारे सामान्य नहीं बनाया जा सकता। सीमा पर शांति और स्थिरता ही व्यापक रिश्तों की बुनियाद होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत अब 1962 से पहले वाली उस कूटनीतिक भूल को दोहराने के मूड में नहीं दिखता, जिसमें राजनीतिक दोस्ती के नारों के बीच सामरिक खतरे को नजरअंदाज कर दिया गया था।

वहीं शी जिनपिंग के साथ संभावित रूप से 400 अधिकारियों का आना महज प्रोटोकॉल की बात नहीं है। इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल इस बात का संकेत है कि चीन इस यात्रा को केवल एक औपचारिक BRICS सम्मेलन के रूप में नहीं देख रहा। इसमें कई स्तरों पर बातचीत की संभावनाएं हो सकती हैं। मसलन अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, सीमा प्रबंधन, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। चीन संभवतः यह भी देखना चाहता है कि भारत के साथ संबंधों में कितनी तेजी से सामान्यीकरण संभव है और किन क्षेत्रों में दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग कर सकते हैं। लेकिन यही भारत के लिए सबसे बड़ी सावधानी का विषय भी है।

चीन के साथ संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि बीजिंग अक्सर आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है, जबकि सीमा विवाद को अलग खांचे में रखने की बात करता है। भारत अब इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखता। गलवान के बाद नई दिल्ली की सोच साफ है कि जब सीमा पर बंदूकें तनी हों, तब बाकी रिश्तों में सामान्यता का दिखावा लंबे समय तक नहीं चल सकता।

साथ ही शी जिनपिंग की संभावित दिल्ली यात्रा को केवल भारत-चीन द्विपक्षीय रिश्तों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक शक्ति संतुलन की बड़ी राजनीति भी है। देखा जाये तो BRICS आज केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया है। यह उस उभरती विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन रहा है जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली शक्तियां अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। चीन के लिए भारत की अहमियत कई कारणों से बढ़ी है। भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज है, दुनिया की सबसे तेजी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और हिंद-प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया, रूस और अमेरिका तक जटिल कूटनीतिक संतुलन बनाए हुए है।

यही चीन की रणनीतिक दुविधा भी है। एक तरफ वह भारत को एशिया में अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वह भारत को पूरी तरह अपने खिलाफ धकेलने का जोखिम भी नहीं लेना चाहता। यानी बीजिंग की गणना शायद यह है कि भारत से टकराव की लागत कम की जाए, लेकिन एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त भी छोड़ी न जाए।

वहीं भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ चीन के साथ स्थायी तनाव बनाए रखना आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। दूसरी तरफ बिना ठोस सुरक्षा गारंटी के संबंधों को तेजी से सामान्य करना रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए भारत को चीन के साथ संबंधों में तीन स्तरों पर आगे बढ़ना होगा। एक तो सीमा पर वास्तविक और सत्यापित स्थिरता बने। केवल बैठकों और बयानों से काम नहीं चलेगा। LAC पर सैन्य गतिविधियों, सैनिकों की तैनाती और बुनियादी ढांचे के सवाल पर ठोस प्रगति जरूरी होगी। दूसरा, आर्थिक संबंधों में रणनीतिक सावधानी बरतनी होगी। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों की अपनी अहमियत है, लेकिन महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और संवेदनशील आपूर्ति श्रृंखलाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। इसके अलावा, बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाना होगा लेकिन सामरिक स्वायत्तता के साथ। BRICS हो, SCO हो या अन्य वैश्विक मंच, भारत चीन के साथ वहां काम कर सकता है जहां उसके हित मिलते हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति या हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक स्थिति से समझौता करेगा।

उधर, नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होती है तो यह संबंधों को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। अक्टूबर 2024 के डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्कों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली संभावित बैठक यह तय कर सकती है कि दोनों देश सिर्फ तनाव प्रबंधन तक सीमित रहेंगे या संबंधों को चरणबद्ध तरीके से सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन भारत के लिए यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कोई भी कूटनीतिक गर्मजोशी गलवान की स्मृति और सीमा विवाद की वास्तविकता पर पर्दा न डाल दे। क्योंकि भारत और चीन के रिश्तों में असली परीक्षा फोटो-ऑप, हाथ मिलाने और साझा बयान नहीं हैं। असली परीक्षा हिमालय की उन चोटियों पर होगी जहां दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं।

बहरहाल, शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा निश्चित रूप से एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम है। सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति का भारत आना, 400 अधिकारियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल की तैयारी और अजित डोभाल की बीजिंग में सक्रिय कूटनीति, ये सभी संकेत देते हैं कि दोनों देश संबंधों के नए समीकरण तलाश रहे हैं। लेकिन भारत के लिए यह केवल रिश्ते सुधारने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की परीक्षा भी है।

नेहरू के दौर में चीन को ‘भाई’ मानने की राजनीति का अंत 1962 की कड़वी हकीकत के साथ हुआ था। गलवान ने यह याद दिलाया कि इतिहास के सबक भुलाए नहीं जा सकते। अब अगर वही चीन दोस्ती का हाथ लेकर दिल्ली आता है तो भारत को हाथ मिलाने से परहेज नहीं करना चाहिए, लेकिन हाथ मिलाते समय अपनी सीमा, अपनी सुरक्षा और अपनी सामरिक शक्ति पर पकड़ ढीली नहीं पड़नी चाहिए। दिल्ली की नई चीन नीति शायद इसी एक वाक्य में समेटी जा सकती है कि बातचीत होगी, व्यापार भी होगा, सहयोग भी होगा; लेकिन भरोसा अब शब्दों पर नहीं, जमीन पर चीन के व्यवहार से तय होगा। 

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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