बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?

हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है।
मानवीय हिमाकतों के चलते दिल्ली में और एक बड़ी दर्दनाक घटना घट गई। सत्य निकेतन के मोतीनगर स्थिति एक सालों पुरानी जर्जर हालत की बिल्डिंग मौत बनकर रिमझिम बारिश में भरभराकर गिर पड़ी। घटना की सूचना पाकर पहुंचे बच्चों के परिजनों की चीखें कलेजा फाड़ रही हैं। परिजन बिलख रहे हैं,मांए बदहवास और बेसुध हैं। स्थानीय पुलिस और हुकुमती अधिकारियों का घटनास्थल पर जमघट लगा है। राहत-बचाव कार्य जारी है। घायल बच्चे एम्स के ट्रामा सेंटर भिजवाए जा रहे हैं। लेकिन वहां से कुछ बच्चों के ना रहने की सूचनाएं हर किसी को झकझोर रही हैं। बिल्डिंग में रहने वाले बच्चे तकरीबन बाहरी प्रदेशों के थे। वह अपना उज्जवल भविष्य बनाने की चाह लेकर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे थे। पर, उन्हें क्या पता हादसों का रूप ले चुकी दिल्ली उनकी जान लील लेगी। पढ़ने वाले बच्चों के साथ दिल्ली में आए दिन कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। राजेंद्र नगर स्थिति कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में पानी भरने से हुई बच्चों की मौत को शायद ही कोई भूल पाया हो। मुखर्जी नगर की कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना को याद करके भी रोंगटे खड़े होते हैं।
इस तरह की प्रत्येक घटनाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का हमेशा से एक ही बयान होता है। दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त कार्रवाई होगी? इसके अलावा मृतकों के परिजनों को मुआवजा और घायलों की इलाज कराकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है और जब तक मीडिया में घटना की चर्चाएं होंगी, कार्रवाई के नाम पर सरकारी डंडा पीटा जाता रहेगा। शोर जैसे ही शांत होगा। जांच-पड़ताल ठंडे बस्ते में चली जाएंगी। जमीदोज हुई बिल्डिंग में ज्यादातर विश्वविधायल में पढ़ने वाले और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले मात्र 20-22 आयु के बच्चे रहते थे। मालिक ने बिल्डिंग को करीब 30 सालों से पीजी के लिए किसी अन्य को किराए पर दिया हुआ था। बिल्डिंग मानकों के एकदम विरुद्ध निर्मित हुई थी। क्षेत्रफल मात्र 55 गज का था जिसमें 30 कमरे बना रखे थे। बिल्डिंग 40 से 45 साल पुरानी बताई जाती है। जबकि, देखने में इससे भी कहीं पुरानी लगती थी। मालिक पर मुकदमा हुआ है। एकाध महीने बाद उसे जमानत मिल जाएगी। उसी जगह पर फिर से दूसरी बिल्डिंग तान दी जाएगी।
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दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बने पीजी को लेकर ‘इंडियन जियोटेक्निकल काॅन्फ्रेस’ ने कुछ वर्ष पहले एक रिसर्च किया था जिसमें पाया था कि 85 फीसदी पीजी बच्चों के रहने के लायक नहीं हैं। इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट को भी हुकूमतों ने दरकिनार किया। हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग के निर्माण में घोर मानवीय हिमाकत का तांडव किया गया था। दिल्ली नगर निगम से लेकर, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सरकार के अधिकारियों ने घूस खाया। घटनास्थल साउथ दिल्ली का सत्य निकेतन क्षेत्र है जिसे डूब या निचला-धरातल क्षेत्र भी कहते हैं। वहां बिल्डिंग बनाने की मात्र ढाई मंजिला इजाजत होती है। पर, अधिकारियों ने घूस खाकर पांच मंजिला तक बनवा दिया। दिल दहला देने वाले हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिल्डिंग में अवैध निर्माण होता रहा और जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर तमाशबीन बने रहे। इतना ही नहीं, करीब 40 साल पुरानी इस बिल्डिंग में बारिश के दौरान हर साल बेसमेंट जलमग्न हो जाता था, जिससे इसकी नींव कमजोर होती गई और इस साल बजन नहीं सहन कर पाई जिससे भराभरकर ढह गई।
हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है। कहने को तो अवैध हैं लेकिन अधिकारी घूस लेकर उसे चंद मिनटों में वैध कर देते हैं। दिल्ली में इस समय करीब 1731 अवैध काॅलोनियां और 650 से लेकर 675 झुग्गी झोपड़ियां हैं जिनमें ज्यादातर किराएदार ही रहते हैं। दिल्ली ऐसा शहर है जहां देश के सभी प्रांतों के लोग रोजी रोटी कमाने आते हैं। शिक्षा का हब भी दिल्ली है। जहां सिविल सेवा की तैयारियां करने बच्चे दूर-दराज से पहुंचते हैं। 5 लाख बच्चे सालाना सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने दिल्ली के मुखर्जी नगर आते हैं, रहने के लिए उन्हें पीजी चाहिए होता है। ऐसे में बच्चे सस्ता पीजी खोजते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता सस्ता घर उनकी जान ले लेगा? वहीं, करीब 15 लाख बच्चे अन्य प्रदेशों के दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। जहां हादसा हुआ, उस इलाके में तकरीबन घर पीजी में तब्दील हैं। पीजी के नाम पर बड़ा नेक्सस उस इलाके में चलता है जिसका मकान होता है वह खुद पीजी संचालित नहीं करता, बल्कि वह किसी अन्य को ठेके पर दे देता है। ठेकेदार बच्चों को कमरों में भूसे की तरह ठूस देते हैं। जहां ना कोई सुविधा, न मानकों का इस्तेमाल, सिर्फ उन्हें कमाने से मतलब होता है।
हादसे वाली बिल्डिंग गिरने का संकेत कुछ वर्षों से दे रही थी? लेकिन ना मालिक ने गौर किया और ना ही अधिकारियों ने? पिछले साल तीसरे माले की सीढ़ियों की छत का उपरी हिस्सा गिरा था जिसे रिपेयर करवाकर संभावित हादसे पर पर्दा डाल दिया गया। बिल्डिंग में 50 के आसपास बच्चे रहते थे। सभी यूपी-बिहार राज्यों से वास्ता रखते हैं। हादसा रविवार को होता है जिस दिन ज्यादातर बच्चे अपने कमरों में थे क्योंकि उस दिन क्लासें और ट्यूशन की छुट्टी थी। शनिवार रात को बच्चे बेखौफ होकर सोए थे, उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन उनके साथ क्या होने वाला है। कुछ बच्चों की जाने चली गई है? कई गंभीर रूप से घायल हैं। घटना निसंदेह दुखदायक है। हादसे की जिम्मेदारी अधिकारियों को लेना चाहिए और सीख लेकर भविष्य में इस तरह की बिल्डिंग को पहले ही जमींदोज करने का संकल्प भी लेना चाहिए।
डॉ. रमेश ठाकुर
सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
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