ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा?

विपक्ष ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक मोर्चे पर उठा लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के नाम पर इसरो की भूमिका सीमित की जा रही है और उसकी दशकों पुरानी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंपी जा सकती हैं।
क्या भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को धीरे-धीरे निजी हाथों के हवाले किया जा रहा है, या फिर देश एक ऐसी नई अंतरिक्ष रणनीति की ओर बढ़ रहा है जिसमें इसरो शोध और सामरिक अभियानों का कमांड सेंटर बनेगा और उद्योग उत्पादन की ताकत? यही सवाल पिछले कुछ दिनों से भारतीय अंतरिक्ष जगत के भीतर और बाहर तेज बहस का विषय बना हुआ है। अब इसरो ने स्वयं सामने आकर स्पष्ट किया है कि न तो इसरो का निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका या महत्व कम किया जाएगा।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे सुधारों, उत्पादन गतिविधियों के निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों को हस्तांतरण तथा कर्मचारियों के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनकी चिंता का केंद्र 21 अगस्त को IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका की वह टिप्पणी थी, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में इसरो प्रक्षेपण यानों का निर्माण बंद कर सकता है और उनका उत्पादन उद्योग या पीएसयू संभाल सकते हैं।
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इसरो का जवाब स्पष्ट है कि भूमिका बदल रही है, महत्व नहीं। एजेंसी अब उस दिशा में अपने वैज्ञानिक संसाधन केंद्रित करना चाहती है जहां उसकी विशेषज्ञता सबसे निर्णायक है। यानि फ्रंटियर रिसर्च, उन्नत प्रौद्योगिकी, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान, गहरे अंतरिक्ष और ग्रहों के मिशन तथा राष्ट्रीय और सामरिक क्षमताएं। हम आपको बता दें कि संचार, नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन के उन्नत पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणालियां और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें इसरो के मूल फोकस में बनी रहेंगी।
दूसरी ओर, जिन तकनीकों ने परिपक्वता हासिल कर ली है और जिनका बड़े पैमाने पर नियमित उत्पादन संभव है, उन्हें उद्योग और पीएसयू प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं के माध्यम से बढ़ा सकते हैं। इसमें परिपक्व लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियां शामिल हो सकती हैं। इसरो का तर्क है कि इससे उसके वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का समय उत्पादन में नहीं, बल्कि भविष्य की जटिल तकनीकों और महत्वाकांक्षी अभियानों में लगेगा।
यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। अंतरिक्ष शक्ति बनने के लिए इसरो को “फैक्ट्री” से आगे बढ़कर “टेक्नोलॉजी फ्रंटियर” पर खड़ा होना होगा। भारत ने 2030 तक सालाना 50 प्रक्षेपणों का लक्ष्य रखा है। पवन गोयनका का कहना है कि इतने बड़े पैमाने का लक्ष्य कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए निजी पूंजी, औद्योगिक उत्पादन क्षमता, उद्यमिता और वैश्विक बाजार तक पहुंच जरूरी है।
यह पूरी व्यवस्था भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और एफडीआई नीति के क्रमिक उदारीकरण से जुड़ी है। इसरो इसे निजीकरण नहीं, बल्कि “इकोसिस्टम विस्तार और क्षमता गुणन” बता रहा है। उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों को अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला में शामिल कर इसरो की क्षमताओं को प्रतिस्थापित नहीं, बल्कि कई गुना करने की योजना है।
नई संरचना में विभागीय भूमिकाएं भी स्पष्ट की गई हैं। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस नीति दिशा देगा, इसरो उन्नत अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और राष्ट्रीय मिशनों का मुख्य केंद्र रहेगा, IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी को सक्षम और अधिकृत करेगा, जबकि NSIL परिपक्व क्षमताओं के व्यावसायीकरण और उद्योग-आधारित उपयोग को आगे बढ़ाएगा।
लेकिन इस परिवर्तन पर सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि नीति का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या है, इसका क्रियान्वयन कब होगा और मौजूदा कर्मचारियों तथा भविष्य की भर्ती पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क है कि दशकों में विकसित इसरो की तकनीक राष्ट्रीय संपत्ति है, इसलिए उसका हस्तांतरण पारदर्शी, जवाबदेह और सामरिक तथा सुरक्षा हितों के अनुरूप होना चाहिए।
विपक्ष ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक मोर्चे पर उठा लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के नाम पर इसरो की भूमिका सीमित की जा रही है और उसकी दशकों पुरानी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंपी जा सकती हैं। पार्टी नेता जयराम रमेश ने इसे इसरो के “साराभाई-धवन ढांचे” को कमजोर करने की प्रक्रिया बताया।
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं अब असाधारण स्तर पर पहुंच चुकी हैं। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, 2040 तक भारतीय मानवयुक्त चंद्र मिशन, पुन: प्रयोज्य और अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम तथा सतत चंद्र और ग्रह अन्वेषण, ये लक्ष्य साधारण व्यावसायिक विस्तार से हासिल नहीं होंगे। इसरो का कहना है कि ऐसी क्षमताओं को केवल बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
हम आपको बता दें कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था फिलहाल लगभग 8.4 अरब डॉलर आंकी गई है और लक्ष्य 2033 तक इसे 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। इसलिए असली चुनौती निजी क्षेत्र बनाम इसरो नहीं, बल्कि इसरो-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता है। रणनीतिक दृष्टि से यह भारत के लिए निर्णायक मोड़ है। अब सवाल यह है कि क्या भारत उत्पादन का विस्तार करते हुए अपनी संवेदनशील तकनीक, सामरिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक नेतृत्व को सुरक्षित रख पाएगा। यदि संतुलन सही बैठा, तो निजी उद्योग इसरो की ताकत बढ़ाएगा; यदि पारदर्शिता और संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़े, तो राष्ट्रीय क्षमताओं के हस्तांतरण पर उठ रहे सवाल और गंभीर होंगे। इसरो ने फिलहाल अपना संदेश साफ कर दिया है कि वह पीछे नहीं हट रहा, बल्कि उत्पादन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अंतरिक्ष की अगली सीमा पर छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है।
-नीरज कुमार दुबे
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