अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध से तेल--गैस संकट गहराया, अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों पर सवालिया निशान लगा?

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कमलेश पांडे । Mar 19 2026 5:14PM

दिलचस्प बात तो यह है कि गैर नाटो देशों में ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत ने भी इस मामले में अमेरिका के आह्वान को नजरअंदाज कर दिया है। यूँ तो अमेरिका ने चीन से भी होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने में सहयोग मांगा, लेकिन सबने इंकार कर दिया, जिससे अमेरिका अलग थलग पड़ गया।

पश्चिमी एशिया के लिए अभिशाप साबित हो रहे ईरान-इजरायल युद्ध, कोई साधारण युद्ध नहीं बल्कि एक प्रकार का सभ्यता-संस्कृति संघर्ष है, जिसके बीज इतिहास में ही जमे हुए हैं। एक ओर जहां यह युद्ध इजरायल के लिए उसके अस्तित्व के रक्षा की लड़ाई है, वहीं दूसरी ओर यह युद्ध ईरान के लिए ईसाई मुल्कों के कथित लोकतांत्रिक-आर्थिक दांवपेंचों से ईरान को महफ़ूज रखकर अरब-खाड़ी देशों में एक मजबूत इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की मन:संकल्पित सोच-समझ और ईरान से वैश्विक इस्लामिक साम्राज्यवाद का दबदबा बढ़ाने के लक्ष्य को केंद्र में रखकर लड़ी जा रही है, जो आगे भी बदस्तूर जारी रह सकती, क्योंकि ईरानी धार्मिक शासन व संगठन का एकमात्र ध्येय यही है।

वहीं, पश्चिम एशिया और मध्य-पूर्व के अकूत तेल व गैस भंडार पर जिस तरह से अमेरिकी-यूरोपीय गठबंधन वर्चस्व कायम है, और अपने अपने हितों को लेकर उनके बीच भी अंतर्विरोध उपज चुका है, वह अप्रत्याशित है। जबकि मध्यपूर्व में अमेरिकी वर्चस्व तोड़ने के लिए रूसी-चीनी नेतृत्व भी आमादा प्रतीत हो रहे हैं, जिसके दृष्टिगत चल रहे दांवपेंचों से इस्लामिक मुल्क लगभग दो या चार फाड़ हो चुके हैं। सच कहूं तो शिया-सुन्नी इस्लामिक विभाजन इसकी जड़ में है, लेकिन सुन्नी बहुल सऊदी अरब, शिया बहुल ईरान, हिन्दू विरोधी पाकिस्तान और मुसलमानों का खलीफा बनने की चाहत रखने वाले तुर्किये के आपसी दांवपेंच किसी से छिपे हुए नहीं हैं। 

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इसके बावजूद, 56 इस्लामिक देशों को मिलाकर गठित ओआईसी और उसके इस्लामिक नाटो बनाने का वैश्विक लक्ष्य, यहूदियों के एकमात्र छोटे से मुल्क इजराइल को समाप्त करने पर तुले हुए ईरान की सनक से गहराते फिलिस्तीन-गाजा विवाद और भारतीय हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तान परस्त ओआईसी के अंतर्राष्ट्रीय दांवपेंचों ने जब हिंसक और आतंकवाद परस्त इस्लामिक दुनिया को मौजूदा क्रूर संघर्ष के मुकाम तक पहुंचा दिया तो जिधर देखें उधर तबाही और बर्बाद होने के अलावा अन्य कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आता।

वैचारिक सवाल है कि जब हर हिंसक सोच का त्रासदीपूर्ण अंत होना नैसर्गिक प्रक्रिया के मुताबिक तय है तो फिर ईरान और अमेरिका इसी रक्तिम राह पर अग्रसर क्यों हैं? और यदि वो ऐसे ही हैं तो इससे शेष दुनिया आश्चर्यचकित क्यों है? शायद इसलिए कि उनके तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो चुकी है, और अबतक सारा शांतिपूर्वक तमाशा देखने वाला खेल लगभग बिगड़ चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ के वैश्विक दायित्व पर सवालिया निशान तो बहुत पहले ही लग चुके हैं, लेकिन पीस बोर्ड ऑफ गाजा क्या कर रहा है? 

उधर, अमेरिकी-यूरोपीय देशों को बैलेंस रखने वाले रूस-चीन-उत्तरकोरिया गठजोड़ और अमेरिका को छोड़कर वीटो शक्ति प्राप्त अन्य चार देश क्या कर रहे हैं? दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम का पाठ पढ़ाने वाला भारत और उसका ग्लोबल साउथ चुप्पी क्यों साधे बैठें हैं? कथित ओआईसी ईरान को मरता-पिछड़ता देखकर बेचैन क्यों नहीं हो रहा है? अब्राहम परिवार के भागीदार देशों के मुंह पर पट्टी क्यों बंधी हुई है? यदि कुछ देशों को परमाणु बम रखने और लंबी दूरी वाली मिसाइल बनाने का हक है तो फिर वही हक ईरान को रहने देने में किसको परेशानी हुई है?

सुलगता सवाल है कि क्या कर ईरान को परमाणु बम बनाने का हक नहीं है, जबकि सिर्फ पाकिस्तान को यही हक अमेरिकी अगुवाई में प्राप्त है? क्या ईरान को लंबी दूरी की मिसाइल बनाने का हक नहीं है, और सिर्फ पाकिस्तान को अमेरिकी-चीनी सरपरस्ती में प्राप्त है? आखिर ऐसी ओछी दलीलों के पीछे अमेरिकी खलनीति तो साफ नजर आती है, क्योंकि इन्हीं सतही वजहों के सहारे ईरान पर हमले किए गए। न केवल ईरानी सुप्रीम लीडर और उनके चहेतों को मार गिराया गया, बल्कि उच्च पदस्थ लोगों के खात्मे का सिलसिलेवार अभियान इजरायल द्वारा जारी है! 

फिर भी ईरान ने जो अपनी रणनीतिक ताकत दिखाई, संगठनात्मक क्षमता प्रदर्शित किया, उससे ईरान विरोधी देश दंग हैं और यूरोपीय नाटो देश भयभीत! शायद इसलिए भी अब वो अमेरिका के साथ पूरी तरह से खड़े दिखाई देना नहीं चाहते हैं। ईरान अपने ही सहोदर अरब-खाड़ी व मध्यपूर्व के देशों की जो कुटाई कर रहा है, उसकी कल्पना भी कभी ओआईसी ने नहीं की होगी! इन तमाम रक्तिम रंजिशों के पीछे समझदारी की भावना है या ईर्ष्या का भाव, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन उससे पहले ईरान क्या करेगा? अमेरिका इजरायल परस्त अपने पड़ोसियों को कितना बर्बाद कर पाएगा, यह वक्त बताएगा।

सवाल यह भी है कि जब इस्लामिक नाटो बनाने के सपने संजोए जा रहे हैं, पाकिस्तान और तुर्की जैसे मुल्क भारत विरोध के नाम पर इजरायल विरोध तक पर तुले हुए हैं, उसके दृष्टिगत इजरायल का आक्रामक होना लाजिमी है। इस लंबे खिंचते जा रहे युद्ध से बचने के लिए दुनिया के थानेदार अमेरिका ने पूरी कोशिश की, लेकिन जिस तरह से पश्चिमी एशिया में ईरान अपनी मनमानी पर तुला हुआ है, उसे रूस-चीन-उत्तरकोरिया और कुछ हदतक भारत का समर्थन हासिल है, उसके दृष्टिगत इजरायल की रक्षा करने का कर्तव्य अमेरिका का तो बनता ही है, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ यहूदी कौम ही है। वो भी तब जबकि पश्चिमी एशिया के सुन्नी मुस्लिम देश भी शिया मुस्लिम मुल्क ईरान को कमजोर रखने को लालायित हों।

यही वजह है कि अमेरिकी आक्रामकता, इजरायली वीरता, भारतीय तटस्थता और रूस-चीन की किंकर्तव्यविमूढ़ता जहां ईरान की फजीहत करवा रही हैं, वहीं शेष दुनिया में तेल-गैस के लाले पड़े हुए हैं। इससे इनके दाम आसमान छू रहे हैं। इसी बीच होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर अमेरिकी प्रस्ताव से इतर नाटो में उभरे मतभेद अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच रणनीतिक दृष्टिकोण के गहरे अंतर को दर्शाने को काफी हैं। इससे तेल-गैस के संकट गहराने और महंगाई बढ़ने के आसार प्रबल हैं। 

इस स्थिति से बचने हेतु अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो सदस्यों से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए युद्धपोत भेजने की मांग की है, लेकिन यूके और जर्मनी जैसे देशों ने इसे नाटो का मामला मानने से इनकार कर दिया। इस मतभेद के कई कारण हैं। उल्लेखनीय है कि ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% हिस्सा ले जाता है। इससे विफरते हुए ट्रंफ ने चेतावनी दी कि सहयोगी मदद न करने पर नाटो का भविष्य 'बहुत बुरा' होगा, लेकिन जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने कहा कि नाटो ने कोई फैसला नहीं लिया और यह उसकी जिम्मेदारी नहीं। जबकि यूके के पीएम कीयर स्टार्मर ने यूरोप, खाड़ी देशों और अमेरिका के साथ अलग गठबंधन बनाने की बात कही, नाटो को शामिल किए बिना।

दिलचस्प बात तो यह है कि गैर नाटो देशों में ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत ने भी इस मामले में अमेरिका के आह्वान को नजरअंदाज कर दिया है। यूँ तो अमेरिका ने  चीन से भी होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने में सहयोग मांगा, लेकिन सबने इंकार  कर दिया, जिससे अमेरिका अलग थलग पड़ गया। सवाल है कि जिस नाटो को अमेरिका ने खड़ा किया, आज वही अमेरिकी इशारे को मानने को तैयार क्यों नहीं हुआ? आखिर इसके क्या कूटनीतिक मायने हैं?

चूंकि ये मतभेद नाटो की एकजुटता पर सवाल उठाते हैं, खासकर मध्य पूर्व जैसे क्षेत्र में जहां अनुच्छेद 5 (सामूहिक रक्षा) लागू नहीं होता। दरअसल, यूरोपीय देश पश्चिम एशिया को नाटो के दायरे से बाहर रखना चाहते हैं, जो ट्रंप की 'ट्रांजेक्शनल' नीति से टकरा रहा है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो रहा है और ईरान को संकेत मिल रहा है कि नाटो विभाजित है। स्पष्टत: इसका प्रभाव भारत पर भी पड़ेगा। भारत के लिए, जो तेल आयात पर निर्भर है, यह ऊर्जा संकट बढ़ा सकता है। वहीं नाटो के विभाजन से मध्य पूर्व में अमेरिकी वर्चस्व कमजोर पड़ सकता है, जो भारत की क्षेत्रीय कूटनीति को प्रभावित करेगा।

ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए नाटो से सहयोग मांगा क्योंकि ईरान ने इसे अमेरिका-इज़राइल संघर्ष के बीच बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% हिस्सा प्रभावित हो गया। इसका मुख्य कारण यह है कि अमेरिका को इस रास्ते से केवल 1% तेल मिलता है, जबकि चीन (90%), भारत (85%) यूरोप और अन्य देश इसी रास्ते पर भारी रूप से निर्भर हैं, इसलिए ट्रंप ने तर्क दिया कि प्रभावित देशों को युद्धपोत, माइनस्वीपर्स और नौसैनिक सहायता देनी चाहिए। उन्होंने सात देशों से बात की, लेकिन सहयोग न मिलने पर नाटो को चेतावनी दी कि मदद न करने पर गठबंधन का भविष्य "बहुत बुरा" होगा।

समझा जाता है कि यह डॉनल्ड ट्रंफ की "ट्रांजेक्शनल" नीति का हिस्सा है, जहां वे उम्मीद करते हैं कि यूक्रेन-रूस युद्ध में अमेरिका की तरह सहयोगी भी आगे आएं। इस रणनीतिक उद्देश्य साफ है। ट्रंप का लक्ष्य बोझ साझा करना और अमेरिकी संसाधनों को बचाना था, साथ ही नाटो की एकजुटता पर दबाव बनाकर यूरोपीय सहयोगियों को मजबूर करना है। इससे ईरान को संदेश भी जाता कि पश्चिमी गठबंधन मजबूत है, भले ही मध्य पूर्व अनुच्छेद 5 के दायरे से बाहर हो।

यही वजह है कि ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान द्वारा बंद किए जाने के कारण नाटो से सहयोग मांगा, क्योंकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% हिस्सा प्रभावित कर रहा है। इसका कारण यह है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष में होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल संकट पैदा हो गया, जिससे कीमतें बढ़ीं। ट्रंप ने 15 मार्च 2026 को फाइनेंशियल टाइम्स को कहा कि अमेरिका ने यूक्रेन में नाटो की मदद की, इसलिए अब नाटो को होर्मुज खोलने में सहायता करनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि मदद न मिली तो नाटो का भविष्य "बहुत बुरा" होगा।

अमेरिकी मांग का स्वरूप यह है कि ट्रंप ने नाटो सहयोगियों से माइंस स्वीपर्स जहाज, युद्धपोत तैनाती और ईरानी खतरों से निपटने के लिए सहयोग की अपील की। उन्होंने चीन, जापान,  दक्षिण कोरिया जैसे देशों से भी निगरानी में मदद मांगी, क्योंकि वे इससे ज्यादा प्रभावित हैं। लेकिन अभी तक नाटो या अन्य देशों (जैसे ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया) ने स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दी। लिहाजा ट्रंप का रुख सख्त है कि प्रभावित देश खुद अपनी जिम्मेदारी निभाएं। 

इन बातों से साफ है कि अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों पर जो सवालिया निशान लगाया है, उसका जवाब मिलना अभी बाकी है!

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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