वैश्विक दबंगई देखने को लाचार संयुक्त राष्ट्र

United Nations Headquarters
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कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका ऐसे समन्वय केंद्र के रूप में कार्य करने की सोची गई, जिसके मंच पर विश्व के सभी राष्ट्र उसके साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम कर सकें। लेकिन सवाल यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसा कर सका है? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है।

ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायली कार्रवाई के बाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका और औचित्य दोनों पर सवाल उठा है। दिलचस्प यह है कि अमेरिका ने अतीत में जब भी ऐसी कार्रवाई की, उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों को लागू करने का बहाना बनाया। चूंकि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्र डोनाल्ड ट्रंप अलबेले राजनेता हैं, उनके लिए नियम-कायदों और जगतगति से ज्यादा उनकी अपनी जुबान और सोच मायने रखत हैं। इसलिए ईरान के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की ओट लेने की औपचारिकता भी नहीं निभाई।

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का सबसे बड़ा कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित लीग ऑफ नेशन्स की असफलता रही। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन की पहल पर प्रथम विश्व युद्ध के बाद 10 जनवरी 1920 को स्थापित लीग ऑफ नेशन्स पहला ऐसा अंतर्राष्ट्रीय संगठन था, जिसका मुख्य उद्देश्य कूटनीति और सामूहिक सुरक्षा के जरिए विश्व शांति बनाए रखना था। लीग ऑफ नेशन्स का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रों के बीच के विवादों को सुलझाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और वैश्विक स्तर पर निरस्त्रीकरण को अमली-जामा पहनाना रहा। लेकिन जिनेवा में स्थित वह संस्था ऐसा करने में पूरी तरह नाकाम रही। उसकी नाकामी के चलते जर्मनी और जापान ने विस्तारवादी नीतियां ना सिर्फ अपनाईं, बल्कि रोजाना नए-नए राष्ट्रों पर कब्जा और हमला करने लगे। इसके बाद जो हुआ, वह विश्व इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है। बेशक लीग ऑफ नेशन्स को 20 अप्रैल 1946 को आधिकारिक रूप से भंग किया गया, लेकिन इसके पहले ही 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कर दी गई। इसकी स्थापना के लिए बड़ा आधार जापान पर हुए अमेरिकी अणुबम हमले के बाद उपजी मानवीय त्रासदी रही। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई।

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संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना और विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखना था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह अपने इस प्राथमिक उद्देश्य में सफल है?  इस पर चर्चा से पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर ध्यान देना जरूरी है, जिसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य, दुनिया भर में शांति बनाए रखना और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान करना है। इसके साथ ही उसका एक और मकसद, राष्ट्रों के बीच समानता और आत्म-निर्णय के सिद्धांतों के आधार पर दोस्ताना संबंधों का विकास करना भी रहा है। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में साफ लिखा है कि यह अंतरराष्ट्रीय संगठन बिना किसी जाति, लिंग, भाषा या धर्म के भेदभाव के पूरी दुनिया के मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देगा। उसका मकसद, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग स्थापित करने के साथ ही, गरीबी दूर करने, भूख, बीमारी और निरक्षरता से लड़ने और प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता प्रदान करने के लिए कार्य करना भी है। इसके साथ ही उसकी भूमिका अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए प्रयास करने की भी है।

कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका ऐसे समन्वय केंद्र के रूप में कार्य करने की सोची गई, जिसके मंच पर विश्व के सभी राष्ट्र उसके साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम कर सकें। लेकिन सवाल यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसा कर सका है? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र की हालत सड़क के किनारे बैठे उस असहाय व्यक्ति जैसी हो गई है, जो सड़क पर जारी मारपीट को असहाय भाव से टुकुर-टुकुर देखते को मजबूर रहता है। 

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का सबसे प्रमुख उद्देशय युद्धों को रोकना है। लेकिन ना तो यह शीत युद्ध को रोक सका, ना ही मौजूदा दौर के संघर्षों को रोक पा रहा है। 1991 के खाड़ी युद्ध के लिए तो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को ही बहाना बनाया था। 2001 में भी जार्ज बुश के बेटे जूनियर जार्ज बुश और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी इराक और अफगानिस्तान पर हमले के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों और उसकी सेना की ओट ली थी। 1994 का रवांडा का नरसंहार हो या फिर 2011 में दक्षिण सूडान में हुआ गृहयुद्ध, 1995 में सर्ब सेना द्वारा बोस्निया में किया गया नरसंहार हो या फिर 2010 के दौरान हुई कथित अरब क्रांति की आड़ में हुई मध्य एशिया की हिंसा, किसी को भी रोकने में संयुक्त राष्ट्र अभियान सफल नहीं रहे। 

संयुक्त राष्ट्र का मंच राष्ट्रों के बीच संवाद बढ़ाने और विवादों को सुलझाने के बजाय,उनके बीच गाली-गलौज और आपसी आलोचना का केंद्रभर बनकर रह गया है। अभी संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख और ताकतवर अंगर सुरक्षा परिषद है। इसका गठन ही गैरबराबरी को बढ़ावा देने का बड़ा आधार बन गया है। इसमें तीन राष्ट्र ऐसे हैं, जो अक्सर अपने वीटो पॉवर का इस्तेमाल नकारात्मक तरीके से करते हैं। अमेरिका, चीन और रूस की ज्यादातर भूमिका नकारात्मक रहती है। रही बात ब्रिटेन और फ्रांस की तो उनकी भूमिका मध्यमार्गी है। हालांकि वे भी महत्वपूर्ण मसलों में सीधे हस्तक्षेप करने की भूमिका को प्रभावी ढंग से निभा नहीं सकते। इसका ही असर है कि ईरान पर इजरायल और अमेरिका ने हमला कर रखा है और रूस एवं यूक्रेन के बीच चार साल से युद्ध जारी है। मानवाधिकार के मुद्दों पर भी संयुक्त राष्ट्र प्रभानवी नजर नहीं आता। कोविड महामारी के दौरान जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तीसरी दुनिया के कमजोर देशों के साथ पक्षपात पूर्ण भूमिका निभाई, वह भी संयुक्त राष्ट्र की नाकामी प्रतीक है। 

जब से ट्रंप ने अमेरिका की दोबारा कमान संभाली है, तब से उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को और ज्यादा पंगु करने की कोशिश की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत संयुक्त राष्ट्र के कई अंगों में अपनी आर्थिक भागीदारी और सहयोग उन्होंने घटाना शुरू कर दिया है। उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के मंचों के जरिए अमेरिकी करदाताओं की बड़ी रकम बेकार के कामों में खर्च हो रही है, जिसका अमेरिका को सीधे फायदा नहीं मिलना है। ऐसे में आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की स्थिति और भी ज्यादा निरीह होने वाली है। ऐसे में अगर दुनिया के देश संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर ही सवाल उठाने लगें तो दुनिया को हैरत नहीं होनी चाहिए।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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