अहुर-असुर से आर्य-वेद तक, भारत-ईरान का वो रिश्ता जो अमेरिका-इजरायल चाहकर भी नहीं तोड़ सकते

India-Iran
AI Image
अभिनय आकाश । Mar 18 2026 1:03PM

ईरान का अर्थ ही है आर्यों का देश। आर्यों की ही एक शाखा ने इधर भारत में वेदों की रचना की थी। आज हम अहुरा-असुर से आर्य-वेद तक के सफर का एमआरआई स्कैन करेंगे। बताएंगे कि ईरान और भारत के ऐतिहासिक संबंध कैसे थे। और ये भी कि एरनम के फारस और फिर ईरान होने की कहानी क्या है?

ईरान-इजराइल युद्ध में भारत एक ऐसे तटस्थ देश की भूमिका निभा रहा है जो ना तो खुलकर तेल अवीव की मिसाइलों वाली बोली के समर्थन में है और न ही पूरी तरह तेहरान की तरफ झुका हुआ है। भारत और ईरान के रिश्ते हजारों साल पुराने हैं। वहीं इजरायल ने विभिन्न संकट की घड़ी में मददगार के रूप में भारत का साथ दिया है। अब आप सोचेंगे कि जब इजराइल से हमारी इतनी गहरी दोस्ती है तो हम ईरान को लेकर इतने फिक्रमंद क्यों हैं? क्या यह सिर्फ कच्चे तेल की सप्लाई या चाबहार बंदरगाह के व्यापार का मामला है? तो जवाब है बिल्कुल नहीं। भारत और ईरान का रिश्ता आज की कूटनीति कच्चे तेल या व्यापार की पैदाइश नहीं है। अगर आपको भारत का यह बैलेंसिंग एक्ट समझना है तो आज से हजारों साल पीछे जाना होगा। दरअसल हमारा और ईरान का रिश्ता किसी कागजी समझौते का नहीं बल्कि खून और सभ्यता का रिश्ता है। ईरान का अर्थ ही है आर्यों का देश। आर्यों की ही एक शाखा ने इधर भारत में वेदों की रचना की थी। आज हम अहुर-असुर से आर्य-वेद तक के सफर का एमआरआई स्कैन करेंगे। बताएंगे कि ईरान और भारत के ऐतिहासिक संबंध कैसे थे। और ये भी कि एरनम के फारस और फिर ईरान होने की कहानी क्या है?

इसे भी पढ़ें: US-Israel-Iran War Day 18 Updates: इधर नवरोज की शुभकामनाएं, उधर मिसाइलों का तोहफा, मिडिल ईस्ट में चल रहा वॉर अनोखा

दोनों की सीमाएं हजारों साल से साथ ही थी

सबसे पहले शुरूआत नक्शे से करते हैं। उस दौर में पाकिस्तान है बना ही नहीं था तो आप कल्पना कर सकते हैं कि भारत और ईरान दरअसल पड़ोसी देश थे। दोनों की सीमाएं हजारों साल से साथ ही थी। जाहिर है तब आज की तरह कोई एक सरकार नहीं होती थी। जनजातियां थी, अलग-अलग छोटे-छोटे कबीले थे, राज्य भी कह सकते हैं। लेकिन अगर आप सांस्कृतिक दृष्टि से इस जिसे हम आर्यावर्त कहते रहे हैं और ईरान तो इनकी सीमा तो ऐसी ही मिलती रही है और जाहिर है दोनों एक दूसरे को प्रभावित भी करते रहे क्योंकि तब कोई वीजा तो था नहीं। कोई आपका पासपोर्ट तो लगता नहीं था। तो यहां से आदमी कब इधर चला जाए अपनी भेड़े चराते या घोड़े दौड़ाते या इधर से इधर आ जाए यह कहा नहीं जा सकता और इसलिए दोनों के जो दोनों की संस्कृतियां हैं उस पर काफी एक दूसरे का प्रभाव दिखता है। 2000 से 3000 ईसा पूर्व के बीच भारत और ईरान के लोग एक ही परिवार का हिस्सा थे। अगर आप आधुनिक इराक, दक्षिणी ईरान और उत्तर पश्चिमी भारत के नक्शे को एक साथ रखकर देखें तो आपको पता चलेगा कि यह पूरा इलाका कभी एक ही विशाल सांस्कृतिक और जन सांख्यिकी यानी डेमोग्राफिक क्षेत्र हुआ करता था। सिर्फ यही नहीं हमारी सिंधु घाटी सभ्यता ईरान और मेसोपोटामिया की समकालीन सभ्यताओं के बीच जो गहरे व्यापारिक संबंध थे वो आज भी जमीन की खुदाई में मिलते हैं। हजारों साल पहले हमारे पूर्वज एक दूसरे के शहरों में आते जाते थे। व्यापार करते थे और एक दूसरे के रीति-रिवाजों को मानते थे। यह दोनों सभ्यताएं एक दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई थी। इसका एक सबसे बड़ा जिंदा सबूत आज भी मौजूद है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ब्राहूई नाम का एक कबीला रहता है। यह लोग शक्ल, सूरत और नस्ल से बिल्कुल ईरानी लगते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनकी बोली दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं जैसे तमिल या तेलुगु से काफी मिलती जुलती है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। बल्कि इस बात का पक्का सबूत है कि हमारी जड़े एक ही जमीन से जुड़ी हैं और आधुनिक सीमाएं बनने से  पहले हम एक ही थे। 

इसे भी पढ़ें: सुनो UN ये तरीका बदल लो...ईरान पर भारत ने गजब ही रुख दिखाया, 193 देश हैरान

एक ही कबीले में रहते थे भारतीय-ईरानी

इंडो आर्यन और ईरानी लोगों के साझे अतीत को वैज्ञानिक भाषा में कुर्गन परिकल्पना या कुर्गन हाइपोथेसिस और बीएमएसी यानी बैक्टीरिया मार्गना आर्कियोलॉजिकल कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है। इस थ्योरी के मुताबिक हजारों साल पहले मध्य एशिया के यूरेशियन स्टेपीज इलाके में एक बहुत बड़ा घुमंतु समूह यानी नोमेडिक ग्रुप रहता था। यह लोग घोड़ों की सवारी करने और रथ चलाने में माहिर थे। यह वो लोग थे जो एक ही भाषा बोलते थे और एक ही जैसी संस्कृति को मानते थे। लेकिन वक्त के साथ चारगाहों और नई जमीन की तलाश में इन लोगों ने वहां से दक्षिण की तरफ अपना सफर शुरू किया। यही वो ऐतिहासिक सफर था जिसने दुनिया का भूगोल हमेशा के लिए बदल दिया। प्रवास के इस लंबे रास्ते में यह विशाल इंडो ईरानी भाषी समूह दो अलग-अलग शाखाओं में बट गए। इस समूह की पहली शाखा ने हिंदू कुश के ऊंचे पहाड़ों को पार किया और भारतीय उपमहाद्वीप के सिंधु और गंगा के उपजाऊ मैदानी इलाकों में आकर बस गए। इन्हें ही इतिहास में इंडो आर्यंस कहा जाता है। जबकि दूसरी शाखा पहाड़ों के पार नहीं गई। वो ईरानी पठार जो ईरानियन प्लेटो हैवहां रुक गई। उन्होंने वहीं अपनी सभ्यता का विस्तार किया और वो आगे चलकर प्राचीन फारसी या ईरानी कहलाए। यानी जो आज के भारतीय हैं और जो ईरानी हैं वह असल में हजारों साल पहले एक ही कबीले में रहते थे। 

इसे भी पढ़ें: कहर ढा रहा है ईरान...जंग के बीच UAE ने मिलाया भारत को फोन, होर्मुज पर हो गया बड़ा खेल!

अहुर और असुर, यस्न और यज्ञ

पारसी धर्म में सर्वोच्च भगवान अहुर मज़्दा हैं। वे निराकार, रंगहीन, लिंगहीन और परम बुद्धिमान सत्ता हैं। अहुर का अर्थ है स्वामी या दिव्य। अब, यदि आप अहुर के 'ह' को 'स' से बदल दें, तो आपको वैदिक संस्कृति का 'असुर' शब्द मिल जाएगा। ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग दिव्य प्राणियों के लिए किया जाता था, और इसका इस्तेमाल वरुण और इंद्र जैसे देवताओं के लिए होता था। पारसी-ज़ोरोस्ट्रियन संस्कृति और इतिहास के अनुसंधान और संरक्षण के लिए समर्पित संगठन की निदेशक शेर्नाज़ कहती हैं कि पारसी धर्म में अच्छाई का मतलब अहुर मज़्दा से है, जो रोशनी और बुद्धि की शक्ति हैं। वहीं, बुराई की ताकत अंग्र मैन्यू है, जो अंधेरे और नकारात्मकता का प्रतीक है। अहुर मज़्दा, मित्र और सात 'अमेशा स्पेंटा' की शक्तियां, असुर वरुण और आदित्यों के समान ही हैं। ऋग्वेद में आदित्यों को सूर्य-देवताओं का एक समूह माना गया है। जो देवता कभी दोनों संस्कृतियों में पूजे जाते थे, बाद में पारसियों ने उन्हें मानना छोड़ दिया, लेकिन वैदिक परंपरा में उन्हें माना जाता रहा। और इसी तरह, वैदिक परंपरा के कुछ देवता पारसी परंपरा में भी बदल गए। लंदन की एसओएएस यूनिवर्सिटी के मारियानो एरिचिएलो उस सिद्धांत के बारे में बताते हैं कि कैसे मध्य एशियाई मैदानों में रहने वाली 'हिंद-ईरानी' आबादी अलग हो गई। वह कहते हैं, इस सिद्धांत की शुरुआत 19वीं सदी में उन भाषाविदों ने की थी जिन्होंने संस्कृत, अवेस्तान और अन्य हिंद-यूरोपीय भाषाओं की तुलना की थी। बाद में कुछ विद्वानों ने यह राय दी कि किसी धार्मिक विवाद के कारण ये दोनों लोग अलग हुए होंगे। मारियानो बताते हैं कि कैसे दोनों परंपराओं में कुछ पवित्र शब्दों का अर्थ उल्टा हो गया। वह समझाते हैं, "मिसाल के तौर पर, पारसी धर्म में अहुर मज़्दा सबसे बड़े भगवान हैं, जबकि वैदिक परंपरा में 'असुर' शब्द का मतलब धीरे-धीरे खराब या नकारात्मक हो गया। यह बदलाव इशारा करता है कि शायद कोई धार्मिक बदलाव हुआ होगा, जिसमें पहले के कुछ देवताओं को छोड़ दिया गया था। न केवल रीति-रिवाज और देवता, बल्कि पारसियों और हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों अवेस्ता और ऋग्वेद में सुरक्षित भौगोलिक यादें भी एक साझा हिंद-ईरानी सांस्कृतिक दुनिया की ओर इशारा करती हैं। इन ग्रंथों में मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में नदी प्रणालियों और भूभागों के समान विवरण मिलते हैं।

इसे भी पढ़ें: Russia ने पाकिस्तान को दिया सस्ते तेल का ऑफर, लेकिन करना होगा ये काम!

अवेस्ता को ऋग्वेद के चश्मे से समझें

विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय और फारसी सभ्यताएँ कज़िन कल्चर यानी एक ही जड़ से जुड़ी हुई हैं। ऋग्वेद के मंत्र और जरथुस्त्र की गाथाएँ छंद और विचारों में काफी मिलती-जुलती हैं। क्योंकि वैदिक संस्कृत पहले से सुरक्षित और अच्छी तरह समझी गई थी, इसलिए उसी के सहारे अवेस्ता की भाषा, कथाएँ और रीति-रिवाज़ समझना आसान हुआ। दोनों परंपराओं में कुछ प्राचीन देवता भी समान हैं जैसे मित्र (वचन और समझौते के देव), अपाम नपत (जल के स्रोत), वायु (हवा) और सोम/होमा (पवित्र पौधा)। यज्ञ और यास्ना जैसे अग्नि-पूजन भी दोनों धर्मों में मिलते हैं, जो दिखाते हैं कि 3000 साल से भी ज्यादा समय से ये परंपराएँ लगातार चली आ रही हैं। सभ्यताओं का सफर अक्सर रॉबरक्ट फ्रोस्टकी “दो अलग रास्तों” जैसा होता है। जहाँ पारसी परंपरा में अग्नि को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक मानकर सिर्फ पूजा तक सीमित रखा गया, वहीं हिंदू परंपरा में बाद में मृतकों का अंतिम संस्कार अग्नि में किया जाने लगा। फिर भी अग्नि दोनों में पवित्रता का प्रतीक रही। जैसे सीता की अग्निपरीक्षा इसका उदाहरण है। समय के साथ इंडो-आर्यों ने स्थानीय देवताओं को भी अपनाया और अपने देवताओं की संख्या बढ़ाई। जैसे पारसियों में अहुरा माज्दा सर्वोच्च देव बने, वैसे ही भारत में विष्णु (और उनके अवतार राम व कृष्ण) और शिव प्रमुख देवता बन गए। हजारों साल का यह साझा रिश्ता समय के साथ कमजोर पड़ता गया, खासकर जब ज़रथुष्ट्र धर्म वाला फारस आगे चलकर इस्लामिक देश बन गया।

बहरहाल, अगर हम पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो समझ आता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आता है कि भारत और ईरान का रिश्ता सिर्फ आज के तेल या किसी एक नेता के रहने या ना या ना रहने का मोहताज नहीं है।  यह वो रिश्ता है जिसकी जड़े इंडो ईरानी भाषाओं, वेद अवस्था के मंत्रों और मुगलाई खानपान में बहुत गहराई तक घंसी हुई हैं। पारसियों का भारत का भारत के दूध में शक्कर की तरह घुल जाना कोई मामूली बात नहीं है। सुप्रीम लीडर मामूली बात नहीं है। सुप्रीम लीडर खामेनई खामेनई की मौत और इजराइल, ईरान युद्ध ने कूटनीति कूटनीति के सारे समीकरण पलट दिए हैं। लेकिन भारत और ईरान का यह सांस्कृतिक और आर्थिक ताना-बाना 21वीं सदी के सबसे खौफनाक तूफान को भी झेल जाने के लिए तैयार है। 

All the updates here:

अन्य न्यूज़