NCLT पर Rahul Gandhi का बड़ा हमला: देश में अमीरों और गरीबों के लिए अलग-अलग System क्यों?

राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवाल देश में ऋण वसूली के दोहरे मानकों और बैंकिंग प्रणाली की विसंगतियों का विश्लेषण करते हैं। सुभाष चंद्रा के खिलाफ चल रही दिवालिया कार्यवाही के बीच यह राजनीतिक हस्तक्षेप बड़े कॉर्पोरेट ऋणों के समाधान और आम आदमी की आर्थिक सुरक्षा के बीच के अंतराल को रेखांकित करता है। कीवर्ड्स: राहुल गांधी, NCLT, दिवालिया कानून, ऋण वसूली, सुभाष चंद्रा, कॉर्पोरेट ऋण, बैंकिंग सुधार।
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण को लेकर गुरुवार को कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश में कर्ज चुकाने के मामले में आम लोगों और बड़े कारोबारी समूहों के लिए अलग-अलग व्यवस्था दिखाई देती है। उन्होंने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण को तंज कसते हुए “लीडर-कंपनी लूट न्यायाधिकरण” तक कह दिया है।
राहुल गांधी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में किसानों, नौकरीपेशा लोगों और छात्रों की आर्थिक परेशानियों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कोई किसान 50 हजार रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है तो उसकी जमीन नीलाम हो सकती है। वहीं, नौकरीपेशा व्यक्ति की एक किस्त भी छूट जाए तो बैंक के लोग उसके घर पहुंच जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब छात्रों के लिए शिक्षा ऋण हासिल करना तक मुश्किल है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारियों के लिए बैंक का पैसा निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया जाता है। उनके मुताबिक, ऐसे लोगों को जितना पैसा निकालना हो निकालने और अपनी सुविधा के अनुसार वापस करने की छूट मिल जाती है। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में दो अलग-अलग व्यवस्थाएं बना दी हैं, जिनमें एक मुट्ठीभर अरबपतियों के लिए और दूसरी बाकी लोगों के लिए है।
राहुल गांधी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब एस्सेल समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्र से जुड़ी व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही को लेकर भी चर्चा तेज है। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के समक्ष चल रही कार्यवाही को लेकर सुभाष चंद्र के कार्यालय ने गुरुवार को अपना पक्ष सामने रखा और कहा कि उनके खिलाफ दावों को लेकर प्रकाशित कुछ खबरों में स्थिति की सही तस्वीर पेश नहीं की गई है।
सुभाष चंद्र ने स्पष्ट किया कि वह संबंधित मामलों में व्यक्तिगत गारंटर हैं और उन्होंने खुद किसी ऋणदाता से व्यक्तिगत तौर पर पैसा उधार नहीं लिया था। उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया कि दिवालिया कार्यवाही में ऋणदाताओं द्वारा दाखिल कुल दावों को वर्तमान में बकाया रकम के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
मौजूद जानकारी के अनुसार, ऋणदाताओं ने सुभाष चंद्र के खिलाफ करीब 22,006 करोड़ रुपये के दावे दाखिल किए थे। इनमें से लगभग 21,696 करोड़ रुपये के दावों को स्वीकार किया गया है। हालांकि, सुभाष चंद्र के मुताबिक उनके पुनर्भुगतान प्रस्ताव पर आपत्ति जताने वाले ऋणदाताओं से जुड़े दावों की वास्तविक राशि करीब 3,992 करोड़ रुपये थी।
उन्होंने बताया कि इस राशि में से 620 करोड़ रुपये का निपटारा पहले ही किया जा चुका है। इसके बाद करीब 3,372 करोड़ रुपये की राशि शेष बचती है। सुभाष चंद्र का कहना है कि इन आंकड़ों को कुल दाखिल दावों के साथ जोड़कर देखने से मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती है।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण कंपनियों से जुड़े दिवालिया मामलों और उनके समाधान की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब किसी कंपनी या संबंधित गारंटर से ऋण की वसूली का मामला दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचता है, तब ऋणदाताओं के दावे, पुनर्भुगतान प्रस्ताव और कानूनी आपत्तियों की जांच इसी व्यवस्था के तहत होती है।
ऐसे में राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप और सुभाष चंद्र की ओर से सामने रखा गया पक्ष एक ही समय पर चर्चा में आने से इस पूरे मामले में कर्ज वसूली, बड़े कारोबारियों की जवाबदेही और दिवालिया प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहस और तेज हो गई है। फिलहाल राहुल गांधी के आरोपों पर केंद्र सरकार की ओर से इस टिप्पणी को लेकर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की कार्यवाही अपने कानूनी क्रम में आगे बढ़ रही है।
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