Mayawati ने आकाश को क्यों दिखाई 'जमीन' ? BSP के इस फैसले का UP Elections पर क्या होगा असर?

Mayawati Aakash Anand
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बसपा सुप्रीमो ने आकाश की ‘दोहरी मानसिकता’ पर सवाल खड़ा कर दिया। उनका तर्क था कि अगर आकाश के लिए पार्टी और बहुजन आंदोलन से ज्यादा अहम पारिवारिक रिश्ते हैं तो फिर वह पार्टी के लिए प्रभावी ढंग से काम कैसे कर सकते हैं?

बहुजन समाज पार्टी की सियासत में एक बार फिर ऐसा उलटफेर हुआ है, जिसने पार्टी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है। जिस कवायद को आकाश आनंद के सियासी भविष्य की राह साफ करने की कोशिश माना जा रहा था, वही कुछ घंटों में उनके बहुजन समाज पार्टी से पूरी तरह बाहर होने की पटकथा बन गई। हम आपको बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से ‘पूरी तरह आजाद’ कर दिया है।

खास बात यह है कि मायावती ने यह फैसला आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास की घोषणा के तत्काल बाद लिया। यानी जिस शर्त को आकाश की वापसी और राजनीतिक सक्रियता के रास्ते की आखिरी बाधा माना जा रहा था, वह शर्त पूरी हुई, लेकिन नतीजा उम्मीद के ठीक उलट निकला। अशोक सिद्धार्थ ने गुरुवार सुबह भावुक संदेश के जरिए राजनीति से संन्यास का ऐलान किया। उन्होंने साफ कहा कि मायावती का आदेश उनके लिए पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों से ऊपर है। उन्होंने यह भी कहा कि आकाश ने करीब दो दशक मायावती की देखरेख और मार्गदर्शन में बिताए हैं और उनके भीतर मायावती का ‘खून’ बहता है। सिद्धार्थ ने खुद पर आकाश को प्रभावित या गुमराह करने के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि उनके जैसे सामान्य कार्यकर्ता की इतनी हैसियत ही कहां कि वह आकाश को गुमराह कर सके।

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लेकिन बसपा सुप्रीमो के तेवर इससे नरम नहीं हुए। मायावती ने अपने दस सूत्रीय संदेश में साफ कर दिया कि मामला केवल संगठनात्मक जिम्मेदारी का नहीं है, बल्कि निष्ठा, परिवार और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है। उन्होंने आरोप लगाया कि आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित से ज्यादा पारिवारिक रिश्तों और निजी हितों को महत्व दे रहे हैं। मायावती का सबसे तीखा सवाल आकाश की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर था। उनका कहना था कि आकाश पहले उनके पोस्ट को लगातार रीपोस्ट करके अपनी राजनीतिक निष्ठा जताते रहे हैं, लेकिन सिद्धार्थ से जुड़े हालिया पोस्ट को उन्होंने रीपोस्ट नहीं किया, जबकि मायावती के मुताबिक वह पोस्ट खुद आकाश के राजनीतिक हित में था।

यहीं से बसपा सुप्रीमो ने आकाश की ‘दोहरी मानसिकता’ पर सवाल खड़ा कर दिया। उनका तर्क था कि अगर आकाश के लिए पार्टी और बहुजन आंदोलन से ज्यादा अहम पारिवारिक रिश्ते हैं तो फिर वह पार्टी के लिए प्रभावी ढंग से काम कैसे कर सकते हैं? मायावती ने अशोक सिद्धार्थ के राजनीति छोड़ने के फैसले को सही कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि फैसला देर से लिया गया। उनका आरोप था कि अगर सिद्धार्थ को अपने दामाद के उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य की सचमुच चिंता होती तो वह उसी वक्त राजनीति छोड़ने की घोषणा कर देते। देरी को मायावती ने सिद्धार्थ की महत्वाकांक्षा और नीयत पर सवाल उठाने का आधार बनाया।

दरअसल, आकाश आनंद पिछले कुछ वर्षों में बसपा की अगली पीढ़ी के चेहरे के तौर पर तेजी से उभरे थे। मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी थी। लेकिन आकाश की राजनीतिक भूमिका बार-बार बदलती रही। तीन सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाया गया और अब पार्टी से ही ‘आजाद’ कर दिया गया है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों की आहट तेज हो चुकी है। बसपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा और संगठन को नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाएगा। आकाश आनंद को इसी संक्रमण का संभावित चेहरा माना जा रहा था। अब उनके बाहर होने से बसपा की उत्तराधिकार की पूरी रणनीति फिर सवालों के घेरे में है।

इस बीच मायावती के छोटे भाई के बेटे ईशान आनंद की हाल के महीनों में उनके साथ बढ़ती मौजूदगी भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे बसपा में अगली पीढ़ी की कमान को लेकर अटकलें और तेज हो सकती हैं।

देखा जाये तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का यह फैसला महज एक पारिवारिक विवाद नहीं माना जाएगा। 2027 में मुकाबला बहुकोणीय होने की स्थिति में बसपा का हर फैसला उसके वोट बैंक, संगठन और सोशल इंजीनियरिंग पर असर डालेगा। आकाश जैसे युवा चेहरे की विदाई से पार्टी को जहां नई पीढ़ी से जुड़ने में चुनौती मिल सकती है, वहीं मायावती के सामने अब यह साबित करने की चुनौती होगी कि बसपा किसी एक उत्तराधिकारी के भरोसे नहीं, बल्कि उनके अपने राजनीतिक नियंत्रण और संगठनात्मक ढांचे पर खड़ी है।

फिलहाल संदेश साफ है कि ससुर ने राजनीति छोड़ी, लेकिन दामाद की कुर्सी नहीं बची। और मायावती की बसपा में रिश्ते नहीं, राजनीतिक निष्ठा अंतिम कसौटी है। 2027 के रण में इस फैसले की असली कीमत और असर तब सामने आएगा, जब हाथी मैदान में उतरेगा।

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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