Vishwakhabram: Turkey में मुगलों के सम्मान पर भारत में मचा बवाल, NATO Summit में आखिर क्यों दिखाए गए 16 Turkic Empires?

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16 साम्राज्यों की सूची में हूण, गोकतुर्क, खजर, उइगर, गजनवी, महान सलजूक, ख्वारज्म, स्वर्ण गिरोह, तैमूरी, मुगल और उस्मानी साम्राज्य शामिल हैं। समारोह में बाबर द्वारा स्थापित मुगल साम्राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सैनिक को भी विशेष स्थान दिया गया।

अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की ने केवल वैश्विक कूटनीति का मंच ही नहीं सजाया, बल्कि इतिहास, संस्कृति और प्रतीकों के जरिये अपनी वैचारिक पहचान का भी जोरदार प्रदर्शन किया। राष्ट्रपति रेचेप तैयप एरदोगान ने दुनिया के शीर्ष नेताओं के स्वागत के लिए जिस भव्य राजकीय समारोह का आयोजन किया, उसका सबसे चर्चित और विवादास्पद पक्ष रहा तुर्की के कथित सोलह महान तुर्क साम्राज्यों का प्रदर्शन। इन्हीं सोलह साम्राज्यों में भारत के मुगल साम्राज्य को भी शामिल किया गया और बाबर की सेना का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सैनिक विशेष पोशाक में समारोह का हिस्सा बनाया गया। इस कदम ने केवल इतिहासकारों के बीच ही नहीं, बल्कि भारत में भी एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या तुर्की ने भारत के इतिहास पर अपना दावा जताने की कोशिश की है।

हम आपको बता दें कि तुर्की के राष्ट्रपति भवन में आयोजित स्वागत समारोह में आधुनिक सैन्य टुकड़ियों, उस्मानी काल के मेहतर सैन्य वाद्य दल और ऐतिहासिक वेशभूषा में सजे सोलह सैनिकों को एक साथ प्रस्तुत किया गया। यह परंपरा वर्ष 2015 में एरदोगान ने शुरू की थी और तब से हर बड़े राजकीय स्वागत का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। इन सोलह सैनिकों को तुर्की के राष्ट्रपति चिह्न पर बने सोलह सितारों का प्रतीक माना जाता है। तुर्की का दावा है कि ये सितारे उन सोलह ऐतिहासिक तुर्क साम्राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने तुर्क सभ्यता की निरंतरता को आगे बढ़ाया।

इन्हीं 16 साम्राज्यों की सूची में हूण, गोकतुर्क, खजर, उइगर, गजनवी, महान सलजूक, ख्वारज्म, स्वर्ण गिरोह, तैमूरी, मुगल और उस्मानी साम्राज्य शामिल हैं। समारोह में बाबर द्वारा स्थापित मुगल साम्राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सैनिक को भी विशेष स्थान दिया गया। हम आपको बता दें कि तुर्की के इतिहास लेखन में मुगल साम्राज्य को बाबर साम्राज्य कहा जाता है। वहां यह पढ़ाया जाता है कि बाबर तैमूर का प्रत्यक्ष वंशज था, उसकी मातृभाषा चगताई तुर्की थी और इसलिए मुगल साम्राज्य तुर्क इतिहास की निरंतर कड़ी है।

इतिहास का यह पक्ष अपनी जगह है कि बाबर मध्य एशिया से आया था और उसकी सांस्कृतिक जड़ें तुर्क परंपरा से जुड़ी थीं। यह भी निर्विवाद है कि मुगल शासन के विभिन्न दौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया और भारतीय धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं पर प्रहार हुए, जिनकी स्मृति आज भी इतिहास और जनचेतना का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में स्थापित होने के बाद मुगल साम्राज्य ने यहां की अनेक परंपराओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं, कला, स्थापत्य, भाषा और जीवन शैली को भी अलग अलग स्तरों पर आत्मसात किया। अकबर से लेकर शाहजहां तक मुगल शासन भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न हिस्सा बन गया था।

इसके अलावा, एरदोगान का पूरा आयोजन केवल सैन्य प्रतीकों तक सीमित नहीं था। उन्होंने इस अवसर को तुर्की की सांस्कृतिक शक्ति के प्रदर्शन में भी बदल दिया। दुनिया भर से आए राष्ट्राध्यक्षों, उनकी पत्नियों और लगभग ढाई हजार अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के लिए तुर्की के विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक व्यंजनों की विशेष व्यवस्था की गई थी। राष्ट्रपति भवन में परोसे गए भोजन में देश के अलग अलग प्रांतों के प्रसिद्ध पकवान शामिल थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया केंद्र में भी तुर्की के व्यंजनों का विशाल संग्रह प्रस्तुत किया गया। तुर्की के संचार निदेशक ने इसे जन कूटनीति का प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि कई बार एक साथ किया गया भोजन उन बातों को कह देता है जिन्हें दस्तावेजों के अनेक पन्ने भी व्यक्त नहीं कर पाते।

तुर्की ने केवल भोजन ही नहीं, बल्कि अपनी कला, शिल्प, तकनीकी उपलब्धियों, मानवीय सहायता अभियानों और सांस्कृतिक विरासत की प्रदर्शनियां भी लगाईं। राष्ट्राध्यक्षों की पत्नियों के लिए अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। उस्मानी सैन्य संगीत, 21 तोपों की सलामी, तुर्की के वायु प्रदर्शन दल की उड़ान और ऐतिहासिक प्रतीकों के जरिये एरदोगान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि आधुनिक तुर्की स्वयं को हजारों वर्षों की एक अखंड सभ्यता का उत्तराधिकारी मानता है।

लेकिन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मुगल साम्राज्य को तुर्की की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा बताना भारत के इतिहास में हस्तक्षेप है? वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखें तो तुर्की ने भारत के भूभाग या संप्रभुता पर कोई औपचारिक दावा नहीं किया है। उसने केवल अपने इतिहास लेखन और राष्ट्रीय प्रतीकों के अनुरूप मुगल साम्राज्य को तुर्क परंपरा की एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया है। इसलिए इसे प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप कहना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब किसी दूसरे देश के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय किसी अन्य राष्ट्र की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बनाकर विश्व मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, तब वह स्वाभाविक रूप से संवेदनशील प्रश्न खड़े करता है।

भारत और तुर्की के संबंध पहले ही कई मुद्दों पर तनावपूर्ण हैं। कश्मीर पर तुर्की का रुख, पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती सामरिक निकटता, रक्षा सहयोग और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी बयान दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी को और गहरा कर चुके हैं। ऐसे माहौल में यदि तुर्की मुगल साम्राज्य को गर्व के साथ अपनी ऐतिहासिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करते हुए यह संदेश देना चाहता है कि भारत पर शासन और अत्याचार करने वाले उसके पूर्वज थे, तो उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि यह प्रतीकात्मक राजनीति उसके लिए उलटी पड़ सकती है। भारत का इतिहास किसी विदेशी आक्रांता के गौरवगान का विषय नहीं है, बल्कि उन आक्रमणों का डटकर सामना करने वाले असंख्य भारतीय वीरों के संघर्ष और बलिदान की गाथा भी है। इसलिए इस तरह के ऐतिहासिक प्रतीकों का प्रदर्शन भारत में सकारात्मक संदेश देने की बजाय दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद वैचारिक और कूटनीतिक दूरियों को और बढ़ा सकता है। भले ही केवल इस एक घटनाक्रम से कोई तत्काल कूटनीतिक संकट उत्पन्न होने की संभावना न हो, लेकिन यह निश्चित रूप से दोनों देशों के संबंधों में एक और असहज अध्याय जोड़ता है।

वैसे इस पूरे घटनाक्रम के सामरिक और रणनीतिक निहितार्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एरदोगान लंबे समय से तुर्की को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि व्यापक तुर्क सभ्यता के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। मध्य एशिया, काकेशस और इस्लामी दुनिया में प्रभाव बढ़ाने की उनकी नीति में इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों का लगातार उपयोग किया जा रहा है। मुगल साम्राज्य को इस प्रतीकात्मक श्रृंखला में जोड़ना उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है, जिसके जरिये तुर्की अपनी ऐतिहासिक पहुंच को वर्तमान कूटनीति की शक्ति में बदलना चाहता है।

बहरहाल, नाटो शिखर सम्मेलन के मंच से एरदोगान ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक कूटनीति अब केवल समझौतों और बैठकों तक सीमित नहीं रही। इतिहास, संस्कृति, भोजन, सैन्य परंपरा और राष्ट्रीय प्रतीक भी वैश्विक शक्ति प्रदर्शन के प्रभावी हथियार बन चुके हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि 21वीं सदी की भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में इतिहास की व्याख्या भी एक रणनीतिक औजार बन चुकी है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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