समंदर बन गई हैं महानगरों की सड़कें, डूबती गाड़ियों को कोई किनारा नहीं मिलता

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क्या हम 2047 के विकसित भारत की इमारत उस बुनियाद पर खड़ी कर रहे हैं जो हर मानसून में हिल जाती है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि विकास के दावों से पहले शहरों की जल निकासी व्यवस्था, निर्माण की गुणवत्ता, नगर नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए?

हम 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात कर रहे हैं। हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहे हैं। हम आधुनिक बुनियादी ढांचे, स्मार्ट शहरों और वैश्विक स्तर की सुविधाओं का दावा कर रहे हैं। लेकिन क्या हर मॉनसून हमारे इन सभी दावों की वास्तविकता सामने नहीं रख देता? क्या यह सवाल पूछने का समय नहीं आ गया है कि यदि हमारे महानगर और राज्य की राजधानियां कुछ घंटों की बारिश भी नहीं झेल पा रही हैं, तो विकसित भारत की बुनियाद आखिर कितनी मजबूत है?

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और गुरुग्राम जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र हर वर्ष मानसून आते ही जलभराव, जाम और अव्यवस्था की पहचान बन जाते हैं? क्या यह केवल मौसम की मार है, या फिर हमारी नगर योजना, निर्माण व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारी की सबसे बड़ी असफलता है? यदि हर वर्ष यही स्थिति बननी है, तो फिर हर वर्ष होने वाली तैयारियों और बैठकों का परिणाम आखिर कहां दिखाई देता है?

क्या स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें, चमकदार भवन और आकर्षक परियोजनाएं हैं? क्या स्मार्ट शहर वह नहीं होना चाहिए जो सामान्य से अधिक बारिश को भी सहजता से संभाल सके? यदि अरबों रुपये जल निकासी, सड़क निर्माण और शहरी विकास पर खर्च हो रहे हैं, तो पहली तेज बारिश में ही सड़कें नदी और चौराहे तालाब क्यों बन जाते हैं?

क्या हर मानसून के बाद वही तस्वीरें, वही बयान और वही आश्वासन सुनना हमारी नियति बन चुकी है? क्या कभी किसी अधिकारी, किसी एजेंसी या किसी निर्माण करने वाली संस्था की जवाबदेही तय हुई? क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि हर वर्ष खर्च होने वाला धन आखिर किस काम में लगाया जाता है?

क्या समस्या केवल अधिक बारिश की है, या फिर प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण, बिना योजना के विस्तार, कमजोर निर्माण और रखरखाव की अनदेखी इसकी असली वजह है? क्या नदियों, तालाबों और पुराने जल निकासी मार्गों को पाटकर खड़ी की गई इमारतों की कीमत अब पूरा समाज नहीं चुका रहा है? यदि शहरों की सांस लेने वाली प्राकृतिक व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया जाएगा, तो पानी आखिर जाएगा कहां?

क्या यह सामान्य बात मानी जा सकती है कि बारिश होते ही एंबुलेंस फंस जाए, बच्चे स्कूल न पहुंच सकें, कर्मचारी दफ्तर न जा सकें, बाजार ठप हो जाएं, रेल और हवाई यात्रा थम जाएं और सामान्य जीवन रुक जाए? क्या हर वर्ष होने वाले आर्थिक नुकसान, समय की बर्बादी और जनजीवन की परेशानी का कोई हिसाब भी रखा जाता है? यदि रखा जाता है, तो फिर समाधान आज तक क्यों नहीं मिला?

क्या विकसित भारत केवल बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेस वे और गगनचुंबी इमारतों से बनेगा? या फिर उसकी पहचान ऐसी मजबूत बुनियादी व्यवस्था से होगी जो हर मौसम में नागरिकों को सुरक्षित और सुगम जीवन दे सके? क्या विश्व स्तर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना उन शहरों के सहारे पूरा होगा जो हर मानसून में ठहर जाते हैं?

क्या केवल सरकार और प्रशासन पर सवाल उठाना पर्याप्त है? क्या नागरिकों की भी जिम्मेदारी नहीं कि वे नालों में कचरा न डालें, जलमार्गों पर अतिक्रमण का विरोध करें और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं? लेकिन क्या यह भी उतना ही सच नहीं कि व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसी पर होती है जिसके हाथ में योजना, संसाधन और निर्णय की शक्ति होती है?

देखा जाये तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम 2047 के विकसित भारत की इमारत उस बुनियाद पर खड़ी कर रहे हैं जो हर मानसून में हिल जाती है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि विकास के दावों से पहले शहरों की जल निकासी व्यवस्था, निर्माण की गुणवत्ता, नगर नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए? क्या जनता को हर वर्ष एक ही परेशानी झेलने के लिए मजबूर रखना किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान हो सकती है? और यदि इन सवालों का उत्तर आज भी हमारे पास नहीं है, तो फिर क्या हमें पहले विकसित भारत का सपना देखना चाहिए, या पहले उसकी मजबूत बुनियाद तैयार करनी चाहिए?

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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