Delhi High Court के जस्टिस अनीश दयाल बोले, जज भी होते हैं बेहतरीन लेखक

नैनीताल में आयोजित हिमालयन इकोज फेस्टिवल के 11वें संस्करण को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनीश दयाल ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश रोजाना 60 से 100 मुकदमों की सुनवाई करते हैं, जिनमें वास्तविक जीवन के पात्र, समस्याएं और समाधान शामिल होते हैं।
(माणिक गुप्ता) नैनीताल (उत्तराखंड), 31 अक्टूबर साहित्य महोत्सव में शामिल हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनीश दयाल का कहना है कि न्यायाधीश भी बेहतरीन लेखक होते हैं। इसके पीछे उन्होंने रोजाना 60 से 100 मामलों की सुनवाई का हवाला दिया, जिनमें से हर मामले में अपने चरित्र, संघर्ष और समाधान होते हैं। अदालत और अपने व्यस्त कार्यक्षेत्र को छोड़कर एबॉट्सफोर्ड एस्टेट में देवपट्टा पर्वतमाला की सुहानी बयार के बीच पहुंचे न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने शुक्रवार को ‘हिमालयन इकोज फेस्टिवल’ के 11वें संस्करण में मुख्य संबोधन दिया।
उन्होंने कानून, साहित्य और पहाड़ों के बीच समानताएं बताते हुए समझाया कि वह लेखकों और कहानीकारों के बीच क्यों मौजूद हैं। न्यायमूर्ति दयाल ने अपने संबोधन में कहा, ‘‘न्यायाधीश बेहतरीन लेखक होते हैं। हमारी केस फाइलों में वास्तविक कहानियां और पात्र होते हैं, कथानक होते हैं, जो कभी वास्तविक तो कभी काल्पनिक होते हैं।
हमारे सामने समस्याएं होती हैं और हमारे फैसलों में उनका समाधान होता है।’’ न्यायमूर्ति दयाल ने कहा, ‘‘एक अच्छी कहानी का मूल आधार पात्र, समस्या और समाधान होता है। हम हर दिन यही करते हैं, रोजाना 60 से 100 मामलों में। मुझे लगता है कि मैं साहित्य महोत्सव में शामिल होने के योग्य हूं।’’ उन्होंने बच्चों के लिए ‘कैन इट गेट वर्स?’ नाम से एक काव्य संग्रह भी लिखा है।
अदालत, साहित्य और पहाड़ों की दुनिया के अपने अनुभव साझा करते हुए न्यायमूर्ति दयाल ने कहा कि पहली नजर में ये तीनों एक-दूसरे से असंबद्ध लग सकते हैं। इनमें से एक ‘नियमों’, दूसरी ‘कल्पना’ और तीसरी प्रकृति की ‘अछूती’ शक्ति से संचालित होती है, लेकिन हर एक से उन्हें कुछ न कुछ सीखने को मिला है। अदालत को ‘‘एक असाधारण रंगमंच’’ बताते हुए उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे मीडिया में अक्सर सुर्खियां बनने वाले सनसनीखेज मामलों से आगे बढ़कर भी अदालती कार्यवाही को देखें।
उन्होंने कहा, ‘‘ज्यादातर मामले आम लोगों के होते हैं। ये सामान्य लोग होते हैं, जो सबसे आखिरी पंक्ति में खड़े होते हैं।’’ न्यायाधीश ने कहा कि अदालत में सुने जाने वाले लगभग 80 प्रतिशत मामले आम लोगों से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि केस फाइलों की दिखने में ‘‘नीरस भाषा’’ के पीछे मानवीय जीवन के कई पहलू छिपे होते हैं।
इनमें भावनाएं, संघर्ष, पीड़ा, उत्पीड़न, दमन, वैवाहिक विवाद और परिवारों में बिखराव शामिल हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम हर दिन वास्तविक कहानियां पढ़ते हैं।’’ न्यायमूर्ति दयाल ने आपराधिक मामलों से जुड़े भावनात्मक पहलू का जिक्र करते हुए बताया कि इनमें पीड़ितों के अनुभवों के कई विवरण सामने आते हैं।
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