Allahabad High Court ने अवैध हिरासत पर लगाया ₹1.25 लाख का हर्जाना

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने देवरिया के एक व्यक्ति को पांच दिनों तक गैरकानूनी तरीके से थाने में बंद रखने के मामले में 1.25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी ने बिना कानूनी प्रक्रिया के अधिकारों का दुरुपयोग किया। इसके अलावा पीड़ित पुलिस विभाग के विरुद्ध दीवानी मुकदमा भी दर्ज कर सकता है।
प्रयागराज, दो नवंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पांच दिन तक अवैध पुलिस हिरासत में रखे गए एक व्यक्ति को 1.25 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना व्यक्ति को हिरासत में लेकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने ज्ञांती देवी और दो अन्य की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने देवरिया निवासी चंदन राजभर की रिहाई का अनुरोध किया था। अदालत ने अवैध हिरासत में रखे जाने के प्रत्येक दिन के लिए 25,000 रुपये की दर से मुआवजा देने का आदेश दिया और स्पष्ट किया कि मुआवजा मिलने के बावजूद राजभर पुलिस विभाग के खिलाफ नुकसान की भरपाई के लिए दीवानी मुकदमा दायर कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि विभागीय जांच में जांच अधिकारी को दोषी पाया जाता है, तो उसके जानबूझकर किए गए कृत्यों के लिए उसे कड़ी से कड़ी सजा देने पर विचार किया जाना चाहिए।
मामले के विवरण के अनुसार, देवरिया के सलेमपुर थाने में 18 जुलाई, 2026 को भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता की धारा 87 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि चंदन राजभर उसकी 18 वर्षीय बेटी को भगा ले गया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, राजभर और शिकायतकर्ता की बेटी ने बाद में बिहार के सिवान में एक दुर्गा मंदिर में विवाह कर लिया था और दोनों पुणे चले गए थे, जहां वे पति-पत्नी की तरह रह रहे थे।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 24 अगस्त की रात लड़की के पिता कुछ पुलिसकर्मियों के साथ पुणे में दंपति के घर पहुंचे, जहां पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया और 27 अगस्त की रात उन्हें संबंधित थाने लाया गया। राजभर को 28 अगस्त से दो सितंबर तक अवैध हिरासत में रखा गया और उसकी गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेज दो सितंबर को तैयार किए गए। राज्य सरकार के वकील ने बताया कि क्षेत्राधिकारी की ओर से 21 अक्टूबर को तैयार की गई जांच रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि जांच अधिकारी दीप नारायण यादव ने राजभर को जानबूझकर हिरासत में लिया और दो सितंबर तक उसे हिरासत में रखा।
इस रिपोर्ट के आधार पर देवरिया के पुलिस अधीक्षक ने 21 अक्टूबर को जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की।
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