किताबों और खिलौनों की उम्र में हिंसा का पाठ क्यों पढ़ रहे हैं बच्चे?

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यहां स्कूलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पंचकूला की घटना ने सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी और वास्तविक निगरानी के बीच के अंतर को उजागर किया है। कैमरे लगे होना सुरक्षा नहीं है, उनकी सतत निगरानी, समय पर हस्तक्षेप और जवाबदेही ही सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

बचपन को मासूमियत, निश्छलता, संवेदनशीलता और खिलखिलाती मुस्कान का पर्याय माना जाता है। बच्चों के हाथों में खिलौने अच्छे लगते हैं, पत्थर और ईंटें नहीं, उनकी आंखों में सपने अच्छे लगते हैं, किसी के प्रति नफरत और हिंसा नहीं। लेकिन जब 8-10 वर्ष की उम्र के बच्चे भी किसी दूसरे मासूम की जान लेने पर उतारू हो जाएं, तब सवाल केवल एक बच्चे के असामान्य व्यवहार का नहीं रह जाता बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश, पारिवारिक संस्कारों, शिक्षा व्यवस्था और हमारी बदलती जीवनशैली का हो जाता है। हरियाणा के पंचकूला में छह साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची पर तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बर्बर हमला इसी भयावह वास्तविकता का आईना है। जब पंचकूला के सेक्टर-20 स्थित राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल में हुई इस हृदयविदारक घटना का वीडियो देखा तो मन बेहद विचलित हो उठा। आरोपी छात्र बच्ची को एक खाली कक्षा में ले गया, वहां उसके बाल पकड़कर घसीटा, बेंच पर सिर पटका, लातें मारी तथा ईंट, पत्थर और गमले से उसके सिर तथा चेहरे पर बार-बार प्रहार किए। करीब 96 सैकेंड तक चली इस हिंसा का दृश्य कक्षा में लगे सीसीटीवी कैमरे में दर्ज हुआ।

सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि हमला करने वाला कोई व्यस्क अपराधी नहीं बल्कि 8 वर्ष का बच्चा है। यह घटना जितनी पीड़ित बच्ची के लिए भयावह है, उतनी ही उस बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। आखिर इतनी छोटी उम्र में किसी बच्चे के भीतर इतनी आक्रामकता कहां से आती है? क्या उसने हिंसा को सामान्य व्यवहार मान लिया है? क्या वह किसी के दर्द और असहायता को महसूस करने की क्षमता खो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि हमारे घरों, स्कूलों और समाज में ऐसा क्या बदल रहा है कि बचपन की भाषा में प्रेम और संवेदना की जगह हिंसा प्रवेश करती जा रही है? उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में जिस तरह बच्ची के असहाय हो जाने के बाद भी हमला जारी रहने की बात सामने आई है, वह सामान्य बाल-सुलभ झगड़े से कहीं अधिक गंभीर है।

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इस घटना ने एक ऐसा प्रश्न हमारे सामने खड़ा किया है, जिससे मुंह मोड़ना अब संभव नहीं है कि आखिर बच्चों के मन में हिंसा के बीज कौन बो रहा है? बच्चों और किशोरों में हिंसक व्यवहार का कोई एक कारण नहीं होता। परिवार में हिंसा देखना, कठोर अथवा असंगत अनुशासन, भावनात्मक उपेक्षा, कमजोर अभिभावकीय निगरानी, साथियों का दबाव, सामाजिक अलगाव और व्यवहार पर नियंत्रण की कठिनाइयां इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं। सबसे पहले सवाल परिवारों से है। आज अनेक घरों में बच्चों को महंगे खिलौने, स्मार्टफोन, टैबलेट और मनोरंजन के तमाम साधन तो उपलब्ध करा दिए जाते हैं लेकिन उनके साथ बैठकर बातचीत करने, उनकी भावनाएं समझने और उनके व्यवहार को दिशा देने का समय लगातार कम होता जा रहा है। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में उलझे हैं और कई बार बच्चे अपनी भावनात्मक उलझनों के साथ अकेले रह जाते हैं। घर में माता-पिता के झगड़े, गाली-गलौज, मारपीट, अपमानजनक भाषा और छोटी-छोटी बातों पर हिंसक प्रतिक्रिया देखने वाले बच्चों के मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। बच्चा वही सीखता है, जो अपने आसपास बार-बार देखता है। यदि घर में समस्या का समाधान संवाद से नहीं बल्कि चीखने, धमकाने और हाथ उठाने से होता है तो उसके लिए हिंसा धीरे-धीरे व्यवहार का स्वीकार्य तरीका बन सकती है।

दूसरा बड़ा सवाल डिजिटल दुनिया का है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने बच्चों के सामने ज्ञान और मनोरंजन के असंख्य अवसर खोले हैं लेकिन इसी दुनिया में हिंसक वीडियो, मारधाड़ वाले खेल, अपमानजनक सामग्री और आक्रामक व्यवहार को महिमामंडित करने वाले दृश्य भी मौजूद हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब बच्चा बिना किसी निगरानी के घंटों ऐसी सामग्री देखता है और उसे यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिंसा वास्तविक जीवन में किसी के शरीर, मन और अस्तित्व को कितनी गहरी चोट पहुंचाती है। तीसरी चिंता बच्चों में संवेदनशीलता और सहानुभूति के विकास की है। आज हम बच्चों को प्रतियोगिता में आगे निकलना, जीतना और दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करना तो सिखा रहे हैं लेकिन हार स्वीकार करना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना, कमजोर की मदद करना और क्रोध पर नियंत्रण रखना कितना सिखा रहे हैं? क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सिमट गई है? क्या बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि किसी को चोट पहुंचाना बहादुरी नहीं, कमजोरी है? किसी दूसरे की पीड़ा देखकर मन में करुणा पैदा होना ही मानवीय संवेदना का आधार है। यदि यही संवेदना विकसित नहीं होगी तो शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियां भी सभ्य समाज की गारंटी नहीं बन सकतीं।

यहां स्कूलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पंचकूला की घटना ने सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी और वास्तविक निगरानी के बीच के अंतर को उजागर किया है। कैमरे लगे होना सुरक्षा नहीं है, उनकी सतत निगरानी, समय पर हस्तक्षेप और जवाबदेही ही सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। सवाल है कि एक छह साल की बच्ची स्कूल परिसर में एक अन्य छात्र के साथ ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गई, जहां उस पर लगातार हमला होता रहा और किसी शिक्षक या कर्मचारी को समय रहते इसकी जानकारी नहीं मिली? यदि स्कूल में शिक्षकों की कमी थी, एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही थी अथवा ड्यूटी व्यवस्था में कोई खामी थी तो यह भी जांच का विषय है।

यह पहली घटना नहीं है, जब स्कूलों में बच्चों के बीच हिंसा ने पूरे देश को झकझोरा हो। वर्ष 2017 में गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात वर्षीय प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या, 2018 में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में चाकूबाजी, 2019 में तमिलनाडु के कोडईकनाल में क्रिकेट विवाद के बाद छात्र की हत्या, 2021 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में छात्र की चाकू मारकर हत्या, 2025 में अहमदाबाद में छात्र की हत्या और 2026 में सूरत में स्कूल परिसर में चाकूबाजी जैसी घटनाएं अलग-अलग समय पर सामने आ चुकी हैं। इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग हैं लेकिन एक बात समान है कि स्कूल, जिन्हें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होना चाहिए, वहां भी हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और शिक्षा विभाग स्कूलों की सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण और कागजी दिशा-निर्देशों तक सीमित न रखें। प्रत्येक स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, प्रशिक्षित काउंसलर, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित सहयोगी कर्मचारी, संवेदनशील स्थानों पर सतत निगरानी और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों और प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। बच्चों के व्यवहार में अचानक आक्रामकता, दूसरों को चोट पहुंचाने की प्रवृत्ति, क्रोध पर नियंत्रण न रहना, पश्चाताप का अभाव, जानवरों अथवा कमजोर बच्चों के प्रति क्रूरता जैसे संकेतों को सामान्य शरारत समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को दंडित करने के बजाय उनकी भावनाओं को समझना, उन्हें अपनी बात कहने का अवसर देना और प्रेम के साथ स्पष्ट अनुशासन सिखाना जरूरी है। खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियां, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियां भी उनमें सहयोग, धैर्य और सहानुभूति विकसित कर सकती हैं। पंचकूला की घटना हमें एक कठोर सच्चाई से रूबरू कराती है कि बच्चों का भविष्य केवल अच्छे स्कूल, महंगी शिक्षा, आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाओं से सुरक्षित नहीं हो सकता। उसके लिए अच्छे संस्कार, भावनात्मक सुरक्षा, मानवीय संवेदना और जिम्मेदार अभिभावक भी उतने ही आवश्यक हैं। जिस समाज में बच्चे दूसरों का दर्द महसूस करना भूलने लगें, वहां विकास के तमाम दावे खोखले साबित होने लगते हैं।

आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि पंचकूला में एक 8 वर्षीय बच्चे ने 6 साल की बच्ची पर हमला क्यों किया बल्कि यह है कि हम ऐसी नौबत आने से पहले क्या कर रहे थे और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या करेंगे? जिस उम्र में बच्चों को अक्षर ज्ञान, दोस्ती, खेल और मानवीय रिश्तों का अर्थ समझना चाहिए, उस उम्र में यदि उनके हाथों में ईंट और पत्थर दिखाई देने लगें तो यह केवल एक परिवार या स्कूल की विफलता नहीं बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना की पराजय है। हमें तय करना होगा कि बच्चों को केवल प्रतियोगिता में जीतना सिखाना है या इंसानियत के साथ जीना भी क्योंकि बचपन यदि हिंसक हो गया तो भविष्य सभ्य कैसे होगा? और यदि स्कूलों में बच्चे सुरक्षित नहीं तो फिर उनके सुरक्षित भविष्य की गारंटी कौन देगा?

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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