Modi लेकर आए ऐसा तगड़ा कानून, अर्बन नक्सलियों की पूरी प्रॉपर्टी हो जाएगी सीज!

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अभिनय आकाश । Mar 27 2026 12:09PM

एफसीआरए अमेंडमेंट बिल पेश किया गया है। विधेयक में एफसीआरए लाइसेंस रद होने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अनुदान से बनाई गई संपत्तियों जब्त करने और उनकी देख-रेख के लिए केंद्र और राज्य के स्तर पर नई अथॉरिटी बनाने का प्रविधान है।

भारत में जितने भी ऐसे एनजीओ चल रही हैं या जो सो कॉल्ड सामाजिक संस्थाएं चल रही हैं जो विदेशों से पैसा लेती हैं, उन सब पर अब सरकार का बड़ा प्रहार होने जा रहा है। कैसे? सारी रिपोर्ट देनी होगी फंडिंग की। एक-एक चीज का ब्यौरा देना होग। इसीलिए एफसीआरए अमेंडमेंट बिल पेश किया गया है। विधेयक में एफसीआरए लाइसेंस रद होने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अनुदान से बनाई गई संपत्तियों जब्त करने और उनकी देख-रेख के लिए केंद्र और राज्य के स्तर पर नई अथॉरिटी बनाने का प्रविधान है। 

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विपक्ष ने क्या कहा?

विपक्ष की ओर विधेयक को 'खतरनाक' बताकर पेश करने का विरोध का जवाब देते हुए गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि यह वास्तव में उन लोगों के लिए 'खतरनाक' है जो विदेशी योगदान का इस्तेमाल जबरन धर्मांतरण के लिए या व्यक्तिगत लाभ करते हैं।

एफसीआरए क्या है?

एफसीआरए का फुल फॉर्म Foreign Contribution Regulation Act जिसे हिंदी में  विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम  कहा जाता है। विदेशी दान को नियंत्रित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे योगदान आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते हैं। पहली बार 1976 में अधिनियमित किया गया था, इसे 2010 में संशोधित किया गया था जब विदेशी दान को विनियमित करने के लिए कई नए उपायों को अपनाया गया था। एफसीआरए उन सभी संघों, समूहों और गैर सरकारी संगठनों पर लागू होता है जो विदेशी चंदा प्राप्त करना चाहते हैं। इन संस्थाओं के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। शुरुआत में यह पंजीकरण पांच वर्षों के लिए होता है, जिसे सभी मानदंडों को पूरा करने पर रिन्यू करवाए जाने का प्रावधान है।

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एफसीआरए का इतिहास

समय समय पर भारत सरकार ने देश में विदेशी सहायता के प्रवाह को कंट्रोल और नियमबद्ध करने का प्रयास किया है। सबसे पहले 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने घरेलू राजनीति में विदेशी भागीदारी को सीमित करने के उद्देश्य से विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम को पारित किया था। 2010 में, विदेशी निवेश पर कुछ अंकुश लगाने के लिए कानून में संशोधन किया गया था। 2015 में, नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के एक साल बाद राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए फोर्ड फाउंडेशन सहित कुछ प्रमुख धार्मिक समूहों पर प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया। पिछले साल सितंबर में भारत सरकार ने फिर से इस कानून में संशोधन लाकर विदेशों से मिल रहे चंदे को और कड़ा कर दिया।

कानून में हो रहे इन बदलावों को आप आसान भाषा में इस तरह समझ सकते हैं:

1. पहला बड़ा बदलाव सजा और जांच के तरीके में है। सरकार ने इस कानून के उल्लंघन पर होने वाली जेल की सजा को 5 साल से घटाकर सिर्फ 1 साल कर दिया है। इसके पीछे सोच यह है कि छोटी गलतियों पर अपराधी बनाने के बजाय संस्थाओं को नियम सुधारने का मौका दिया जाए। साथ ही, अब किसी भी संस्था के खिलाफ पुलिस सीधे जांच शुरू नहीं कर पाएगी; इसके लिए पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। जानकारों का मानना है कि इससे अधिकारियों की मनमानी कम होगी और समाजसेवी संस्थाएं बिना डरे काम कर सकेंगी।

2. दूसरा बदलाव संस्था चलाने वाले लोगों की जिम्मेदारी से जुड़ा है। अब सरकार ने मुख्य पदाधिकारियों का दायरा बढ़ा दिया है। इसका मतलब है कि अब संस्था के केवल बड़े अफसरों ही नहीं, बल्कि ट्रस्टी, पार्टनर और कमिटी के अन्य महत्वपूर्ण सदस्यों पर भी कड़ी नजर रहेगी। अगर इनमें से किसी का भी पिछला रिकॉर्ड खराब है या उन पर कोई केस चल रहा है, तो उस संस्था को विदेशी चंदा लेने का लाइसेंस नहीं मिलेगा। आसान शब्दों में कहें तो, सरकार ने सजा तो कम कर दी है, लेकिन संस्था चलाने वाले लोगों की ईमानदारी की जांच का घेरा और चौड़ा कर दिया है।

मोदी सरकार का एफसीआरए अमेंडमेंट बिल 2026?

विदेशी फंडिंग सिस्टम पर नियंत्रण और सख्त होगा। विदेशी धन और संपत्तियों की निगरानी के लिए अलग से अथॉरिटी बनेगी। एनजीओ का रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं हुआ तो सारी संपत्ति अथॉरिटी के पास चली जाएगी। एनजीओ का लाइसेंस रद्द हुआ तब भी सारी संपत्ति अथॉरिटी के पास जाएगी। विदेशी फंड से जुड़ी किसी भी संपत्ति को बेचने से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी। अगर कोई संस्था सस्पेंड है तब भी वह संपत्ति का लेनदेन नहीं कर सकती। गड़बड़ी पर पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। फॉरेन फंड्स की जांच के लिए केंद्र की अनुमति लेनी होगी और कोई भी गड़बड़ी एनजीओ में अगर पाई जाती है तो अथॉरिटी के अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। 2018 में राजनाथ सिंह ने सिर्फ एक लाइन कहा कि जो विदेशों से आप पैसा प्राप्त करते हैं ना वो एसबीआई के अकाउंट में लीजिए। नई दिल्ली वाला एसबीआई का अकाउंट पता चला कि 506000 एनजीओ बंद हो गए। आपका एसबीआई अकाउंट है जो फॉरेन फंडिंग है सिर्फ वहां से ले लीजिए। वहीं मंगवा लीजिए। बंद हो गए। सरकार ने कहा कि यह बंद क्यों हो गए? जितना पैसा आप विदेश से प्राप्त करते हैं वो तो समाज सेवा के नाम पर आप प्राप्त करते हैं। तो उसका सिर्फ आप 30% प्रशासनिक खर्चे में जैसे कि अपने एनजीओ के कर्मचारियों को सैलरी देना हो गया। अगर कहीं ऑफिस खोल के रखा है तो उसका रेंट देना हो गया। वो 30% यहां खर्च कीजिए। लेकिन 70% तो उस काम के लिए खर्च कीजिएगा ना जिसके लिए पैसा प्राप्त किया है। तो उन्होंने कहा एक कैप लगा दिया कि 30% ही प्रशासनिक खर्चे कर सकते हैं। बाकी आपको जिस काम के लिए पैसे लिए हैं वो करने होंगे। पता चला कि 1.5 लाख एनजीओ फिर बंद। 

प्रविधानों का उल्लंघन

विधेयक को पेश करते हुए नित्यानंद राय ने कहा कि मोदी सरकार विदेशी फंडिंग के किसी भी दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगी और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। वहीं, प्रस्तावित विधेयक में सजा को भी कम किया गया है। एफसीआरए के प्रविधानों का उल्लंघन कर विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए पहले पांच वर्ष की सजा का प्रविधान था, जिसे घटाकर एक वर्ष कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुन सक्सेना ने द प्रिंट के साथ बातचीत में बिल की बारिकियों को समझाते हुए कहा कि प्रस्तावित धारा 14B कहती है कि यदि किसी एनजीओ का प्रमाणपत्र उसकी समाप्ति तिथि से पहले रिन्यू नहीं किया जाता है, तो उसे एक्सपायर्ड माना जाएगा। सक्सेना का कहना है कि यह प्रावधान सरकार को एक प्रकार का पॉकेट वीटो दे देता है, जिसे किसी भी चरण पर प्रयोग कर, केवल प्रशासनिक देरी के कारण, एनजीओ की वैधता समाप्त की जा सकती है। भले ही एनजीओ अन्य सभी नियमों का पालन कर रहा हो। एफसीआरए (एफसीआरए) के तहत जारी प्रमाणपत्र अक्सर समय पर नहीं मिलते और नवीनीकरण के लिए लंबी कतारें लगती हैं। ऐसे में प्रस्तावित धारा 14B उन मामलों में भी वैधता समाप्त कर सकती है, जहाँ एनजीओ ने समय पर आवेदन कर दिया हो, लेकिन मंजूरी अभी तक नहीं मिली हो। ऐसी स्थिति में,उस एनजीओ के खाते में मौजूद संपत्ति या धन स्वतः सरकार/प्राधिकरण में निहित हो सकते हैं। प्रस्तावित धारा 16A यह भी कहती है कि कोई संपत्ति, चाहे वह आंशिक रूप से विदेशी चंदे और आंशिक रूप से अन्य स्रोतों से बनाई गई हो, वह भी निर्दिष्ट प्राधिकरण के अधिकार में जा सकती है। हालांकि, संगठन को यह अधिकार दिया गया है कि वह प्राधिकरण के समक्ष आवेदन कर यह साबित कर सके कि संपत्ति का कोई स्पष्ट हिस्सा अन्य (घरेलू) स्रोतों से बनाया गया था और उसे वापस किया जाना चाहिए। सक्सेना का कहना है कि यह प्रावधान एनजीओ की लगभग सभी संपत्तियों को प्रशासक के अधिकार क्षेत्र में ले आता है। संवैधानिक दृष्टि से देखें तो यह मूल कानून की भावना से अलग है, जिसका उद्देश्य केवल विदेशी चंदे को नियंत्रित करना था। 

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