भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज, बंगाल के लिए बीजेपी ने चुन लिया नया 'योगी'

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अभिनय आकाश । Mar 24 2026 1:19PM

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नाम उभर रहा है जो योगी आदित्यनाथ की याद दिलाता है। ये नाम उत्पल महाराज का है। मूल नाम स्वामी ज्योतिर्मयानंद। वह भारत के सेवा आश्रम संघ के प्रमुख चेहरे रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने संघ से निष्कासित होने के बाद भाजपा की टिकट स्वीकार कर ली है और वह उत्तर दिनाजपुर जिले की कालियागंज सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। यह कोई छोटा फैसला नहीं है। भाजपा ने जानबूझकर इस चेहरे को चुना है।

संयासी का भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज और राजनीति में कदम रखकर हिंदुओं की रक्षा का वादा। जब हम भारतीय राजनीति में भगवा और सत्ता के मिलन की बातें करते हैं तो सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आता है। कारण सीधा सा है कि एक संयासी और मठ के प्रमुख से लेकर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करके भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की एक नई परिभाषा लिखी। अब ठीक वैसा ही प्रयोग भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनावी समर में कर रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नाम उभर रहा है जो योगी आदित्यनाथ की याद दिलाता है। ये नाम उत्पल महाराज का है। मूल नाम स्वामी ज्योतिर्मयानंद। वह भारत के सेवा आश्रम संघ के प्रमुख चेहरे रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने संघ से निष्कासित होने के बाद भाजपा की टिकट स्वीकार कर ली है और वह उत्तर दिनाजपुर जिले की कालियागंज सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। यह कोई छोटा फैसला नहीं है। भाजपा ने जानबूझकर इस चेहरे को चुना है। 

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हिंदूवादी छवि और संगठनात्मक अनुभव

 उत्पल महाराज को टिकट देने का मुख्य कारण उनकी हिंदूवादी छवि और संगठनात्मक अनुभव है। वे भारत सेवाश्रम संघ के माध्यम से लंबे समय से लोगों की सेवा कर रहे थे। जिससे उनके स्थानीय स्तर पर जबरदस्त पकड़ है। भाजपा को उम्मीद है कि उत्पल महाराज के आने से ना केवल कालियागंज बल्कि आसपास की सीटों पर भी हिंदू मतदाताओं का भी भाजपा की ओर झुकाव होगा। अब जब भाजपा ने एक हिंदुत्ववादी नेता को टिकट दे ही दिया है तो सवाल उमड़ना लाजमी है कि क्या उत्पल महाराज बंगाल में पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि के प्रमुख नेता बन सकते हैं? जैसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ माने जाते हैं। तो इस सवाल का जवाब उत्पल महाराज के बयानों और भाजपा की रणनीति में मिलता है। जिस तरह से वे ममता बनर्जी सरकार पर हिंदुओं को हाशिए पर धकेलने का आरोप लगाते हैं उससे साफ है कि भाजपा उन्हें बंगाल में अपने सबसे बड़े हिंदूवादी चेहरे में से एक के रूप में पेश करना चाहती है।  

संघ ने किया किनारा

हालांकि, बीते दिनों जारी एक आंतरिक पत्र में संघ ने राजनीति में उतरने के कारण उन्हें संघ से निष्कासित करने की घोषणा की। उत्पल महाराज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों को चुनाव लड़ने के अपने निर्णय के बारे में सूचित कर दिया था, लेकिन जब वे सहमत नहीं हुए, तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के एक दिन बाद, 17 मार्च को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। आपको शायद पता होगा कि स्वामी ज्योतिर्मयानंद राजनीति के जाल में फंस गए हैं, आश्रम छोड़कर एक राजनीतिक दल में शामिल हो गए हैं। यह खबर मिलते ही संघ के अधिकारियों ने मुख्यालय में शासी निकाय की आपातकालीन बैठक बुलाई और उन्हें निष्कासित करने का निर्णय लिया। भारत सेवाश्रम संघ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, सामाजिक सेवा और धार्मिक संगठन है। संघ के महासचिव स्वामी विश्वत्मानंद ने पत्र में लिखा किसी भी परिस्थिति में संघ का कोई संन्यासी, ब्रह्मचारी या आश्रम निवासी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या प्रलोभन में आ जाता है, तो उसका धार्मिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह उसे त्याग के गौरव से विमुख कर देता है और सांसारिक सुखों की लत में डुबो देता है… जबकि हमें संसार के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, सांसारिक ऐश्वर्य की ओर लौटने के लिए अपनी अंतरात्मा और वैराग्य का त्याग करना कभी भी उचित नहीं है।

बताया क्यों लिया संयासी बनने का फैसला

दक्षिण दिनाजपुर जिले के बलुरघाट में जन्मे उत्पल महाराज ने बताया कि वे 2000 में इस संगठन में शामिल हुए और चार साल बाद स्थानीय कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री पूरी की। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से ही संन्यासी जीवन से बहुत प्रभावित था, क्योंकि मैंने आश्रम के छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। तभी मैंने संन्यासी बनने का फैसला किया था। 1917 में स्थापित यह संघ राजनीति से दूर रहता है और परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत कार्यों में संलग्न रहता है, साथ ही यह देश भर में हिंदू मिलन मंदिरों का एक नेटवर्क भी संचालित करता है। उत्पल महाराज का दावा है कि इनका उद्देश्य हिंदुओं को एकजुट करना है। हिंदुओं की सेवा करते हुए मैंने महसूस किया कि राजनीति के कारण यह समुदाय खतरे में है। एक विशेष समुदाय को खुश करने की कोशिशों के कारण हिंदू पीड़ित हैं। आजकल रथ यात्रा या राम नवमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करने के लिए भी हिंदुओं को पुलिस की विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हिंदुओं की समस्याओं का समाधान किसी आध्यात्मिक संगठन के माध्यम से नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर और वरिष्ठ टीएमसी नेता फिरहाद हकीम की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उत्पल महाराज ने कहा कि मंदिरों में प्रार्थना करने का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ ने उन्हें निष्कासित कर दिया हो, लेकिन वे इसे हमेशा अपने दिल और दिमाग में रखेंगे और संगठन के संन्यासियों के साथ संपर्क में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं कालियागंज में रहता हूँ और इस इलाके की हर गली से वाकिफ हूँ। मैं यहाँ के लोगों को जानता हूँ और उनकी भावनाओं को समझता हूँ। वे कह रहे हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उम्मीदवार बनूँगा। एक भिक्षु होने के नाते मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन मैं एक भिक्षु के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहूँगा।

भाजपा की रणनीति बदल रही है

बंगाल में पिछले चुनावों में पार्टी को असफलता मिली। 2016 और 2021 में बड़े सपने देखे गए। लेकिन ममता बनर्जी की ताकत के सामने टिक नहीं पाई। अब भाजपा की रणनीति बदल रही है। स्थानीय हिंदूवादी अत्याधुनिक चेहरों को भाजपा आगे लाने का काम कर रही है। उत्पल महाराज ठीक वैसा ही चेहरा हैं। वो कहते हैं कि हिंदुओं की सेवा आध्यात्मिक संगठन से नहीं हो पा रही है। रथ यात्रा रामनवमी पर पुलिस की मदद लेनी पड़ रही है। टीएमसी के गुंडे पूजा तक नहीं करने देते। मुस्लिम तुष्टीरण की वजह से हिंदू हाशिये पर हैं। राजनीति में आकर ही इन समस्याओं का हल निकलेगा और यह बातें सीधे ममता बनर्जी की राजनीति पर प्रहार है। ममता की ताकत एक बड़ा आधार अल्पसंख्यक वोट है उनकी ताकत का। उनकी छवि तुष्टीरण की नहीं बल्कि सभी के लिए न्याय की रही है। लेकिन उत्पल महाराज जैसे चेहरे के आने के बाद हिंदू वोटरों में एक नई ऊर्जा आ सकती है। खासकर उत्तर बंगाल में उत्तर दिनाजपुर दक्षिण दिनाजपुर अलीपुर द्वार जैसे इलाकों में जहां हिंदू मुस्लिम समीकरण संवेदनशील है। भाजपा पहले ही वहां अपनी पकड़ बढ़ा रही है। उत्पल महाराज का योगी जैसा स्टाइल, सन्यासी होने का वादा, हिंदू एकीकरण की बात, तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी चुनौती यह सब हिंदू अस्मिता को जगा सकता है। लेकिन अब सवाल यह है कि ममता दीदी को इससे क्या नुकसान हो सकता है? तो इसका जवाब है इससे दीदी का सबसे बड़ा नुकसान हिंदू वोट का विभाजन है। उत्तर बंगाल में हिंदू वोटर पहले ही भाजपा की तरफ झुक रहे हैं। अब एक सन्यासी चेहरा जो खुद कह रहा है कि हिंदू खतरे में है पूजा नहीं करने देते। यह संदेश सीधे दिल में उतर सकता है। और इतना ही नहीं इससे ममता बनर्जी की छवि पर सवाल उठेंगे कि क्या वह हिंदुओं की अनदेखी कर रही हैं? क्या तुष्टीरण की वजह से हिंदू हाशिए पर हैं? और यह सवाल वोट में तब्दील हो सकता है। 

खैर इन संतों में सबसे बड़ा नाम उत्पल बाबा के लिए राह जितनी आसान लग रही है असल में है नहीं। उनके विरोधी और टीएमसी उम्मीदवार नितई वैश्य ने महाराज के राजनीति में आने पर आश्चर्य जताया है। वैश्य का कहना है वे पहले महाराज का बहुत सम्मान करते थे। लेकिन उनके राजनीति में आने से उनके आध्यात्मिक कद को ठेस पहुंची है। अभी जो दिख रहा है वो भाजपा की सी सदी हुई चाल है और यह ममता दीदी की ताकत पर सीधा प्रहार है। और देखिए बंगाल की राजनीति में यह एक नया टर्निंग पॉइंट हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उत्पल महाराज भाजपा के योगी साबित होंगे या ममता दीदी इसे भी संभाल लेंगी?  

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