London High Court पहुंचा हिंदू बच्चे को माथे पर तिलक लगाने से रोकने का मामला

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पश्चिमी लंदन के एक प्राथमिक स्कूल में नौ वर्षीय ब्रिटिश हिंदू बच्चे को तिलक लगाकर आने से रोका गया, जिसके खिलाफ परिवार ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। स्वामीनारायण संप्रदाय से जुड़े इस परिवार ने धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाते हुए 25,000 पाउंड के हर्जाने की मांग की है। वहीं स्कूल प्रशासन ने भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए अपनी नीतियों को समानता और एकजुटता बढ़ाने वाला बताया है।

(अदिति खन्ना) लंदन, आठ नवंबर लंदन के एक प्राथमिक स्कूल में नौ साल के ब्रिटिश हिंदू बच्चे को माथे पर तिलक लगाकर आने से रोक दिया गया, जिसके बाद उसके माता-पिता ने उसे स्कूल से निकाल लिया और इस मामले में ब्रिटेन के उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। स्वामीनारायण संप्रदाय से जुड़ा यह बच्चा 2021 से पश्चिमी लंदन के विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल में जाता था। वह माथे पर अपना धार्मिक चिह्न तिलक-चांदलो लगाकर स्कूल जाता था।

हालांकि, 2025 के अंत में स्कूल ने इस पर आपत्ति जताई। इसके बाद विवाद शुरू हो गया। आखिरकार माता-पिता ने बच्चे को स्कूल से निकाल लिया और कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया।

बच्चे के माता-पिता ने इस सप्ताहांत अपनी कानूनी टीम की जरिये जारी बयान में कहा, ‘‘माता-पिता के रूप में हमारे लिए यह देखना बेहद दुखद रहा कि हमारे बेटे को केवल इसलिए परेशानी से गुजरना पड़ा, क्योंकि वह अपनी धार्मिक आस्था का पालन करना चाहता था। उन्होंने कहा, ‘‘वह कई वर्षों से स्कूल में तिलक-चांदलो लगाकर जाता था और कभी कोई परेशानी नहीं हुई। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारे परिवार के लिए इतना पवित्र धार्मिक चिह्न परेशानी की वजह बन जाएगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारा बेटा एक सामान्य बच्चा है, जिसे पढ़ना और अपने दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद है।

उसके तिलक लगाने से किसी को कोई नुकसान नहीं होता था और न ही इससे एक अच्छा विद्यार्थी बनने में कोई बाधा आती है।’’ माता-पिता ने कहा, ‘‘हमने हमेशा अपने बच्चों को हर धर्म का सम्मान करना सिखाया है। हमारी बस इतनी अपेक्षा है कि हमारे धर्म का भी उसी तरह सम्मान किया जाए। हम उम्मीद करते हैं कि किसी दूसरे बच्चे को अपनी शिक्षा और धार्मिक आस्था में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न होना पड़े।’’ इस मामले में परिवार की ओर से आश्रय लॉ कानूनी पैरवी कर रही है।

उसने ब्रिटेन के समानता कानून, 2010 के तहत धार्मिक भेदभाव और मानवाधिकार कानून, 1998 के तहत मिले अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई शुरू की है। इंग्लैंड और वेल्स के उच्च न्यायालय में दायर इस मामले में परिवार ने 25,000 पाउंड के हर्जाने की मांग की है। मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और लगाए गए आरोपों पर विवाद बना हुआ है।

आश्रय लॉ के निदेशक अम्ब्रिश लिम्बाचिया ने कहा, यह मामला केवल एक बच्चे या एक स्कूल तक सीमित नहीं है। इससे ब्रिटेन की शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा, किसी भी बच्चे को अपनी धार्मिक आस्था और शिक्षा में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

हमें उम्मीद है कि इस कानूनी कार्रवाई से सभी धर्मों के बच्चों के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलेगी। तिलक-चांदलो एक धार्मिक चिह्न है। इसे आमतौर पर चंदन के लेप से अंग्रेजी के अक्षर यू के आकार में बनाया जाता है और बीच में कुमकुम से एक छोटा लाल गोल निशान लगाया जाता है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों के लिए यह भगवान के प्रति भक्ति और विनम्रता का प्रतीक है। परिवार का आरोप है कि स्कूल की ओर से इस धार्मिक चिह्न पर आपत्ति जताए जाने के बाद शिक्षकों ने बच्चे से उसकी धार्मिक परंपरा के बारे में बार-बार सवाल किए। साथ ही, उसे स्कूल की कुछ गतिविधियों में हिस्सा लेने से भी रोका गया।

हालांकि, स्कूल ने भेदभाव के आरोपों को सार्वजनिक रूप से खारिज किया है। स्कूल का कहना है कि उसने परिवार की धार्मिक मान्यताओं को समझते हुए संवेदनशीलता से काम लिया और वैकल्पिक व्यवस्था भी दी थी, लेकिन माता-पिता ने इसे स्वीकार नहीं किया। विकर्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल ने कहा है कि वह अलग-अलग सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का सम्मान करता है।

स्कूल के अनुसार, उसकी नीति का उद्देश्य आपसी तालमेल, निष्पक्षता, समानता और एकजुटता को बढ़ावा देना है। साथ ही, इसका मकसद स्कूल में किसी तरह के विभाजन या व्यवधान को रोकना है। इस मामले में बच्चे के माता-पिता को अंतरधार्मिक पहल एक्शन फॉर हार्मनी का भी समर्थन मिल रहा है।

एक्शन फॉर हार्मनी के प्रमुख नितिन पलान ने कहा, धार्मिक समानता का अधिकार सभी समुदायों को मिलना चाहिए। इसमें हिंदू बच्चे भी शामिल हैं, जिनकी धार्मिक परंपराएं और मान्यताएं उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, हमारा उद्देश्य किसी तरह का विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि आपसी समझ, निष्पक्षता और सभी के साथ समान व्यवहार को बढ़ावा देना है।

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