ChatGPT से सेहत की सलाह लेने में जोखिम, विशेषज्ञों ने सुरक्षित इस्तेमाल के लिए दी SMART गाइडलाइन

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स्वास्थ्य संबंधी सवालों के लिए चैटबॉट का सहारा लेने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के बीच विशेषज्ञों ने इसके संभावित जोखिमों को लेकर आगाह किया है। एक अध्ययन के मुताबिक चैटबॉट द्वारा दिए गए 5 से 13 प्रतिशत तक चिकित्सकीय जवाब असुरक्षित पाए गए हैं। इससे बचाव के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ठहरने, सवाल स्पष्ट रखने और डॉक्टर से परामर्श करने समेत पांच अहम कदम सुझाए हैं।

(कर्स्टन मैककैफरी, जूली आयर और लिलियाना लारान्जो, सिडनी विश्वविद्यालय) सिडनी, 30 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) एरिन की उम्र 40 साल के आसपास है। वह एक ऐसी नौकरी में अंशकालिक रूप से काम करती हैं, जिसमें काफी मेहनत और समय देना पड़ता है। उनके दो बच्चे हैं, जो प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं।

वह अक्सर बेहद थका हुआ महसूस करती हैं और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाती हैं। उन्हें लगता है कि अब उनकी सोचने-समझने की क्षमता पहले जैसी नहीं रही। उनकी एक दोस्त उन्हें बताती है कि ये सभी लक्षण ‘पेरिमेनोपॉज’ यानी रजोनिवृत्ति से पहले के दौर के हो सकते हैं।

एरिन इस बारे में अपने पारिवारिक चिकित्सक (जीपी) से बात करने के लिए समय लेती हैं। उन्हें पेरिमेनोपॉज के बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए वह ‘चैटजीपीटी’ से पूछती हैं कि यह क्या है और इसके लिए कौन-कौन से उपचार उपलब्ध हैं। निश्चित तौर पर एरिन अकेली नहीं हैं।

30 से 55 प्रतिशत वयस्कों का कहना है कि उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए चैटजीपीटी या अन्य बड़े भाषा मॉडल अथवा चैटबॉट का इस्तेमाल किया है। यह चलन लगातार बढ़ रहा है। भले ही आप एआई चैटबॉट का इस्तेमाल न करते हों, लेकिन गूगल पर कुछ खोजने पर भी अक्सर आपको एआई की ओर से तैयार किया गया सारांश दिखाई देता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि इसका मरीजों के इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर क्या असर पड़ रहा है? और इस प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित तथा प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है? लोग स्वास्थ्य संबंधी सवालों के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल क्यों करते हैं : ब्रिटेन में हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि कुछ लोग अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए चैटबॉट से स्वास्थ्य संबंधी सवाल पूछते हैं, लेकिन एक-तिहाई से अधिक लोग यह तय करने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं कि उन्हें डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है या नहीं।

करीब आधे लोगों ने चैटबॉट को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना में अधिक सुविधाजनक पाया। वे अक्सर रात में या सुबह के समय सवाल पूछते हैं, जब पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं होतीं। चैटबॉट का इस्तेमाल करने वाले आधे से अधिक लोगों का मानना था कि इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लाभ पहुंचा है।

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित चैटबॉट ‘कोपायलट’ के साथ हुई पांच लाख से अधिक स्वास्थ्य संबंधी बातचीत के 2026 के एक विश्लेषण में पाया गया कि हर पांच में से एक बातचीत व्यक्तिगत लक्षणों और उपचार से जुड़ी थी। इनमें से कई सवाल लोग अपने बजाय किसी दूसरे व्यक्ति, जैसे बच्चे या परिवार के सदस्य के स्वास्थ्य को लेकर पूछ रहे थे। ये निष्कर्ष ऑस्ट्रेलिया में हमारे अपने राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि सर्वेक्षण के नतीजों से भी मेल खाते हैं।

इसमें पाया गया कि स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल करने वाले एक-तिहाई से अधिक लोगों ने यह जानने के लिए इसका सहारा लिया कि उनके लक्षणों का क्या मतलब है। वहीं, आधे लोगों ने किसी खास बीमारी या स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया। स्वास्थ्य संबंधी जानकारी अक्सर बेहद जटिल होती है और इसे कई बार ठीक से समझाया भी नहीं जाता।

डॉक्टरों के साथ परामर्श का समय सीमित होता है। मरीज अक्सर बताते हैं कि उनके पास अपने सभी सवाल पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता या वे डॉक्टर से सवाल पूछने में झिझक महसूस करते हैं। इसके मुकाबले चैटबॉट से सलाह आसानी से मिल जाती है।

यह व्यक्ति की जरूरत के हिसाब से जवाब दे सकता है। उपयोगकर्ता बिना किसी समय-सीमा या आलोचना के डर के जवाब को अधिक स्पष्ट और सरल बनाने के लिए बार-बार सवाल पूछ सकते हैं। एआई चैटबॉट के इस्तेमाल के क्या जोखिम हैं : चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि जब लोगों को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो, तब वे चैटबॉट से सलाह लें और उन्हें गलत या असुरक्षित जवाब मिल जाएं।

ऊपर बताए गए ब्रिटेन के सर्वेक्षण में हर पांच में से एक व्यक्ति ने बताया कि चैटबॉट से सलाह लेने के बाद उसने किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेने का फैसला बदल दिया और डॉक्टर के पास नहीं गया। फिलहाल, स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित आंकड़े बहुत कम हैं। नुकसान के कुछ अलग-अलग मामलों के अध्ययन ही उपलब्ध हैं।

इसी सप्ताह मीडिया में 31 वर्षीय बोवेन वांग की मौत की खबर भी आई। फरवरी में उनकी मृत्यु हो गई थी। बताया गया कि मिर्गी की दवा की खुराक कम करने को लेकर चैटजीपीटी ने उन्हें गलत सलाह दी थी।

हालांकि, चैटबॉट से मिलने वाली स्वास्थ्य संबंधी सलाह की सटीकता पर किए गए सिमुलेशन अध्ययनों के नतीजे चिंता बढ़ाने वाले हैं। एक अध्ययन में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े मरीजों के 222 सवालों पर एआई के जवाबों की जांच की गई। इसमें पाया गया कि इस्तेमाल किए गए एआई चैटबॉट के आधार पर पांच से 13 प्रतिशत जवाब असुरक्षित थे और उनसे मरीजों को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका थी।

एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि शोधकर्ताओं की ओर से तैयार काल्पनिक चिकित्सकीय परिस्थितियों में चैटबॉट 94.9 प्रतिशत मामलों में सही जवाब दे रहे थे। लेकिन जब अध्ययन में शामिल लोगों ने उन्हीं परिस्थितियों और उन्हीं चैटबॉट का इस्तेमाल करके खुद सवाल पूछे, तो जवाबों की सटीकता घटकर 34.5 प्रतिशत रह गई। इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि किसी बीमारी के मूल कारण का पता लगाने के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करना इंटरनेट पर सामान्य खोज करने से कम प्रभावी हो सकता है।

वहीं, यह तय करने के मामले में कि डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए या नहीं, चैटबॉट का प्रदर्शन सामान्य वेब सर्च के लगभग समान था। इस मामले में जवाबों की सटीकता केवल 43 प्रतिशत रही। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि लोग अक्सर अपने सवालों में पर्याप्त जानकारी नहीं देते, जिससे उन्हें सटीक जवाब नहीं मिल पाता।

लेकिन सही और प्रभावी तरीके से सवाल पूछना भी आसान नहीं है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें इसका प्रशिक्षण नहीं मिला है। लोग चैटबॉट से मिली जानकारी की दूसरे स्रोतों से पुष्टि भी नहीं करते, जबकि कई बार उसमें दिए गए स्रोत गलत या अप्रासंगिक हो सकते हैं। गूगल के एआई सारांश में दिए गए लिंक पर केवल एक प्रतिशत उपयोगकर्ता ही क्लिक करते हैं।

मरीज हमेशा डॉक्टर को नहीं बताते कि उन्होंने एआई का इस्तेमाल किया है। आदर्श स्थिति में मरीज और डॉक्टर मिलकर इस बात पर चर्चा कर सकते हैं कि चैटबॉट से मिली सलाह कितनी सही है और इलाज से जुड़े फैसले लेने में उसका किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन डॉक्टर को यह बताने के मामले में मरीजों का रवैया अलग-अलग होता है।

कई मरीज यह जानकारी साझा नहीं करते। पोलैंड में किए गए एक सर्वेक्षण में ऐसे मरीजों का आंकड़ा 83 प्रतिशत था, जबकि अमेरिका में यह 32 प्रतिशत पाया गया। मरीजों के ऐसा न बताने की एक बड़ी वजह यह डर है कि डॉक्टर इस पर नकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकते हैं या उन्हें लग सकता है कि मरीज उनकी विशेषज्ञता पर सवाल उठा रहा है।

बेहतर नतीजों के लिए क्या करें : मरीज अगर डॉक्टर को बता दें कि उन्होंने एआई चैटबॉट का इस्तेमाल किया है, तो डॉक्टर उससे मिली गलत जानकारी को ठीक कर सकते हैं और इलाज से जुड़े फैसले लेने में मरीज के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल उन्हें मरीजों को एआई के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में सलाह देने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला है। इसके अलावा, उनके पास इसके लिए समय और आर्थिक संसाधनों की भी कमी है।

चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और एआई एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने नयी ‘स्मार्ट’ मार्गदर्शिका तैयार की है। इसमें एआई चैटबॉट का अधिक सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करने के लिए पांच अहम कदम बताए गए हैं: ठहरें और सोचें: स्वास्थ्य संबंधी सवाल पूछने से पहले विचार करें कि क्या चैटबॉट से पूछना उचित है। सवाल स्पष्ट रखें: अपनी समस्या और सवाल को साफ-साफ शब्दों में रखें।

अपनी निजी जानकारी का ध्यान रखें: खुद से पूछें कि आप चैटबॉट के साथ कौन-सी जानकारी साझा कर रहे हैं। तथ्यों की जांच करें: चैटबॉट से मिली जानकारी को सही मानने से पहले उसकी पुष्टि जरूर करें। जरूरत पड़ने पर किसी वास्तविक व्यक्ति से बात करें: स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में संकोच न करें।

डिस्क्लेमर: प्रभासाक्षी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।


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