पेपर खरीदने वालों के खिलाफ भी आंदोलन होना चाहिए

नीट मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अब तक 13 मुख्य मास्टरमाइंड और दलालों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में कोचिंग संस्थानों के शिक्षक, प्रोफेसर और डॉक्टर शामिल हैं। नीट समेत देश की कई प्रतिष्ठित परीक्षाएं आयोजित कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की है।
मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी-2026 पेपर लीक इन दिनों मामला सुर्खियों में है। 3 मई को आयोजित हुई परीक्षा पेपर लीक के बाद रद्द कर दी गई थी जिसके बाद परीक्षा के लिए नई तारीखों की घोषणा की गयी थी। 21 जून को पुनर्परीक्षा संपन्न हो चुकी है। नयी नवेली कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही है। आखिरकार ये परीक्षा की शुचिता के साथ ही साथ लाखों छात्रों के भविष्य का प्रश्न जो ठहरा।
इस घटना के दो पक्ष हैं। एक पेपर लीक करने वाले और दूसरे पेपर खरीदने वाले। पेपर लीक करने और बेचने वालों का तंत्र देश में मौजूद है। इस तंत्र या रैकेट का मकसद परीक्षा की शुचिता भंग कर, मोटी कमाई करना होता है। आजाद भारत का इतिहास देखें तो हजारों छोटी बड़ी परीक्षाओं के पेपर अब तक लीक हो चुके हैं। इस तंत्र की पहुंच इतनी ऊपर और इतने स्तर पर होती है कि असली गुनहगार कानून के शिकंजे से बच जाते हैं। वहीं, पेपर लीक करने और बेचने वालों के खिलाफ कभी ऐसे कड़ी कार्रवाई भी नहीं हुई, जो दूसरों के लिए नजीर बनती। दो चार दिन के हो हल्ले और बयानबाजी के बाद गाड़ी पुरानी पटरी पर दौड़ने लगती है।
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नीट मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अब तक 13 मुख्य मास्टरमाइंड और दलालों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में कोचिंग संस्थानों के शिक्षक, प्रोफेसर और डॉक्टर शामिल हैं। नीट समेत देश की कई प्रतिष्ठित परीक्षाएं आयोजित कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की है। पेपर लीक मामले में एनटीए के महानिदेशक सुबोध कुमार को सरकार ने पद से हटा दिया है।
इस प्रकरण का दूसरा पक्ष पेपर खरीदने वालों का है। इस पक्ष की चर्चा न के बराबर है। पेपर खरीदने वालों की एक जमात हमारे समाज में सदा से विद्यमान है। जो येन केन प्रकारेण दाखिले से लेकर नौकरी के लिये पेपर खरीदने से लेकर तमाम गैर कानूनी काम से करने से बाज नहीं आती। चूंकि समाज में ऐसे लोग भी हैं जो परिश्रम के बजाय तिकड़म के सहारे सफल होना चाहते हैं। ऐसे में ये लोग लाखों रुपये में पेपर खरीदने का पा करते हैं। व्यवस्था में भ्रष्टाचार का पुराना घुन लगा ही हुआ है। ऐसे में मोटी कमाई के लालच में पेपर लीक करने वाले सजा या दंड की परवाह किये बिना परीक्षा की शुचिता को तार—तार करने का दुस्साहस करते हैं।
पेपर लीक होने पर अभ्यर्थी, अभिभावक, समाज सेवी, राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता सरकार, प्रशासन और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी के खिलाफ धरना, प्रदर्शन और आंदोलन करते हैं। सोशल मीडिया पर लंबे चौड़े पोस्ट लिखे जाते हैं। ये गुस्सा और नाराजगी जायज भी है। वास्तव में, किसी परीक्षा की शुचिता कायम रखना संबंधित विभाग, एजेंसी या सरकार की जिम्मेदारी होता है। किसी भी स्तर पर चूक से लाखों अभ्यर्थी और उनके परिवार प्रभावित होते हैं। लेकिन सरकार और व्यवस्था के खिलाफ धरना, प्रदर्शन और गुस्सा प्रकट करने वाले कभी पेपर खरीदने वालों के खिलाफ कोई प्रदर्शन या आंदोलन नहीं करते। उसूलन,पेपर खरीदने वाले भी पेपर बेचने वालों जितने बराबर के दोषी हैं। गलत तरीके से परीक्षा पास करने की चाहत रखने वाले चंद भ्रष्ट अभ्यर्थियों और अभिभावकों के कारण परिश्रमी अभ्यर्थियों के सपने चकनाचूर होते हैं। ऐसे में आंदोलन, प्रदर्शन के साथ सख्त कानूनी कार्रवाई पेपर खरीदने वालों के खिलाफ भी होनी चाहिए।
जब समाज में नैतिकता का स्तर ऊंचा होगा तो गलत काम करने वाले निरूत्साहित होंगे। लेकिन जब समाज स्वयं अनैतिक कृत्यों में शामिल होगा या उसका भागीदार बनेगा तो सख्त से सख्त कानून और फूलप्रूफ व्यवस्था के भी नाकाम होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। नीट यूजी मामले में समाज के चंद भ्रष्ट लोगों ने लाखों में पेपर खरीदा। लेकिन पेपर लीक होने का असर 22 लाख अभ्यर्थियों पर पड़ा। मतलब, समाज की चंद गंदी मछलियों का भुगतान पूरे तालाब की मछलियों को उठाना पड़ा। ऐसे में चंद गंदी मछलियों की खिलाफत भी जरूरी है।
नीट पेपर लीक केस में लगातार अपडेट सामने आ रहे हैं। देश के सात राज्यों में लीक हुए इस पेपर को जयपुर के जमवारामगढ़ के मांगीलाल और दिनेश ने 26 अप्रैल को ही 30 लाख में खरीदा था। इन दोनों भाइयों ने सीकर में तैयारी कर रहे अपने बेटे को यह पेपर दिया। उसके बाद दोनों भाई सीकर पहुंचे और वहां 29 अप्रैल कई लोगों को सीकर में बेचा। इस परिवार से पिछले साल ही चार बच्चे नीट में चयनित हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, माफियाओं ने छात्रों को 5 से 50 लाख रुपये में पेपर बेचा था। सुरक्षा के नाम पर दलालों ने छात्रों के ब्लेंक चेक और ओरिजनल मार्कशीट गिरवी रख ली थी। भुगतान को लेकर दलालों और परिजनों में विवाद भी हुआ। अब समाज की इस मनोवृत्ति और कृत्य को क्या संज्ञा दी जाए?
21 जून को नीट री-एग्जाम के दौरान बिहार के लखीसराय में सॉल्वर गैंग के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। वहीं गुलाबी नगरी जयपुर में री-एग्जाम के दौरान एक छात्रा मोबाइल से नकल करते हुए पकड़ी गई। छात्रा ने मोबाइल को अंडरगारमेंट्स में छिपाकर परीक्षा परीक्षा केंद्र में पहुंचाया था। राजस्थान एसआई भर्ती परीक्षा-2021 पेपर लीक मामले में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने एक अभ्यर्थी को गिरफ्तार किया था। उसके पिता ने 45 लाख में पेपर खरीदा था। राजस्थान में प्राध्यापक 2022 की परीक्षा में मेरिट में 20वां स्थान हासिल करने वाली शिक्षिका ने 25 लाख रुपये में नकल माफिया से पेपर खरीदा था। ये किसी एक प्रदेश की समस्या नहीं है, कमोबेश देशभर में ऐसे प्रकरण सामने आ चुके हैं।
असल में, पेपर लीक करने वालों को कानून के छिद्रों की जानकारी है। दो चार दिन के हो हल्ले और मीडिया में खबरें तैरने के बाद मामला शांत हो जाता है। थोड़ा वक्त बीतने के बाद आम लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि कब आरोपी कानून के शिकंजे से आजाद हो चुके हैं। सार्वजनिक परीक्षाओं में नकल और धांधली रोकने के लिए केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया है। कानून के मुताबिक, प्रश्न पत्र या उत्तर कुंजी लीक करना और अनधिकृत रूप से प्राप्त करना (खरीदना), दोनों ही गंभीर अपराध माने गए हैं।
पेपर बेचने और खरीदने वाले दोनों एक ही समाज का हिस्सा हैं। पेपर बेचना अपराध है तो पेपर खरीदना भी अपराध है। ऐसे में पेपर खरीदने वालों पर कानून की गंभीर धाराओं में केस दर्ज होना चाहिए। पेपर खरीदने के दोषियों को आजीवन किसी भी परीक्षा में बैठने से वंचित किया जाना चाहिए। पेपर बेचने और खरीदने वालों की तस्वीरें सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जानी चाहिए, जिससे समाज अपने आस पास की गंदी और भ्रष्ट मछलियों का पहचान सकें, जिनकी वजह से सारा तालाब गंदाता है।
असल में, परीक्षा की शुचिता भंग करने और पेपर खरीदने वालों के साथ कानून और समाज दोनों को नरमी नहीं बरतनी चाहिए। नीट मामले में अपराधी भले कोई भी हो उसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो आने वाले वर्षों तक किसी को भी ऐसा करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर कर दे। क्योंकि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है। सरकार और परीक्षा एजेंसी को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगली बार कोई छात्र परीक्षा देकर बाहर निकले… तो उसके चेहरे की मुस्कान किसी “पेपर लीक” की खबर से न छीनी जाए।
- डॉ. आशीष वशिष्ठ
लेखक-पत्रकार
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