डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है?

Supreme Court
ANI
कमलेश पांडे । Oct 28 2026 5:49PM

सरकार अब मीडिया को मिली बेलगाम स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहती है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुफिया रिपोर्टों के बाद ही ऐसे सख्त कानून अमल में लाए जाने की सोची गई। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया की खबरी अराजकता और सनसनीखेज झूठ सच न्यूज से जनता भी भ्रमित हो जाती है।

भारत में डिजिटल निजता की रक्षा के लिए बनाया गया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 अब व्यक्तिगत गोपनीयता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी कानूनी बहस का विषय बन गया है। लेकिन उससे भी बड़ी बहस की बात यह है कि आखिर मीडिया की आड़ में कब तक कुछेक संस्थान विपक्ष के लिए फर्जी न्यूज प्लांट करेंगे, विदेशी दूतावासों से सांठ- गांठ करके महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों और विभिन्न संस्थाओं की खुफिया गिरी करेंगे?

शायद यही वजह है कि सरकार अब मीडिया को मिली बेलगाम स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहती है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुफिया रिपोर्टों के बाद ही ऐसे सख्त कानून अमल में लाए जाने की सोची गई। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया की खबरी अराजकता और सनसनीखेज झूठ सच न्यूज से जनता भी भ्रमित हो जाती है।

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उल्लेखनीय है कि 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के लिए निर्धारित की।

इस विवाद का मूल प्रश्न यह है कि, क्या किसी व्यक्ति की डिजिटल निजता की रक्षा करते हुए पत्रकारों को भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और जनहित से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच करने की पर्याप्त छूट मिलनी चाहिए?

पहला सवाल है कि DPDP कानून क्या है? तो यह जान लीजिये कि इसका पूरा नाम "Digital Personal Data Protection Act, 2023" है। यह कानून डिजिटल माध्यमों से जुड़े व्यक्तिगत डेटा के संग्रह, इस्तेमाल और सुरक्षा के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी का दुरुपयोग रोकना और डेटा का इस्तेमाल करने वाले संस्थानों की जवाबदेही तय करना है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का नाम, फोन नंबर, पता, डिजिटल पहचान या उससे जुड़ी अन्य व्यक्तिगत जानकारी किसी संस्था के पास हो, तो उस जानकारी का इस्तेमाल कानून के अनुरूप होना चाहिए।

कानून के अंतर्गत डेटा संभालने वाली संस्था को "Data Fiduciary" और जिस व्यक्ति का डेटा है, उसे "Data Principal" कहा जाता है। सामान्यतः डेटा के इस्तेमाल के लिए सहमति या कानून में निर्धारित वैध आधार जरूरी होता है। उल्लंघन के कुछ मामलों में अधिकतम ₹250 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

दूसरा सवाल यह है कि आख़िर इस कानून को लेकर विवाद क्यों खड़ा हुआ? तो जवाब होगा कि,

एक, पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का अभाव: समाचार रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता को कानून में विशेष छूट नहीं दी गई है। प्रकाशकों का कहना है कि भ्रष्टाचार या किसी सार्वजनिक अनियमितता की जांच करते समय पत्रकार को संबंधित व्यक्ति की जानकारी इस्तेमाल करनी पड़ सकती है। यदि सहमति और अन्य डेटा-सुरक्षा नियमों का पालन हर मामले में अनिवार्य हुआ, तो जांच प्रभावित हो सकती है।

दो, खबर हटाने या उसमें बदलाव का दबाव की आशंका: प्रकाशकों को शक है कि डेटा मिटाने के अधिकार और सहमति वापस लेने से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल प्रकाशित खबरों को हटवाने या बदलवाने के लिए किया जा सकता है। इससे पुरानी रिपोर्टों और जनहित के दस्तावेजी रिकॉर्ड पर भी असर पड़ने की आशंका है। यह प्रकाशकों की कानूनी दलील है, अदालत द्वारा स्थापित निष्कर्ष नहीं, जो कि बहस के बाद स्पष्ट होगा।

तीन, गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा मंडराने के आसार प्रबल: पत्रकारों को कई बार गोपनीय सूत्रों से जानकारी मिलती है। प्रकाशकों का तर्क है कि सरकार को डेटा संबंधी जानकारी मांगने की व्यापक शक्ति देने और कुछ परिस्थितियों में ऐसी मांग की सूचना सार्वजनिक करने पर रोक लगाने से पत्रकारों के सूत्रों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।

चार, सूचना के अधिकार (RTI) पर प्रभाव: अधिनियम की धारा 44(3) ने RTI कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया। पहले व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े मामलों में निजता के साथ व्यापक जनहित को भी ध्यान में रखकर सूचना देने पर विचार किया जा सकता था। संशोधित प्रावधान व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को छूट देता है। आलोचकों को आशंका है कि इससे सरकारी कामकाज और सार्वजनिक पदाधिकारियों से जुड़े कुछ मामलों की जानकारी हासिल करना कठिन हो सकता है।

तीसरा सवाल है कि प्रकाशकों ने कानून की किन धाराओं को चुनौती दी है? प्राप्त जानकारी के मुताबिक, DNPA की याचिका में अधिनियम की कई धाराओं और 2025 के नियमों को चुनौती दी गई है। प्रमुख विवाद इस प्रकार हैं:

मुख्य प्रावधान और विवाद का मुख्य मुद्दा निम्नलिखित है:-                                                             
एक, धारा 7 और 17  में डेटा के वैध इस्तेमाल तथा छूट के प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट अपवाद नहीं होना चाहिए।
दो, धारा 12- व्यक्तिगत डेटा मिटाने के अधिकार का समाचार अभिलेखों और रिपोर्टिंग पर संभावित प्रभाव।
तीन, धारा 36 तथा नियम 23- सरकार द्वारा डेटा संबंधी जानकारी मांगने की शक्ति और उससे जुड़े सुरक्षा उपाय।
तीन, धारा 44(3)- RTI कानून में व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण संबंधी बदलाव।                        

प्रकाशकों का दावा है कि इन प्रावधानों का संयुक्त प्रभाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता और नागरिकों के जानने के अधिकार पर पड़ सकता है। याचिका में संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है; हालांकि इस पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।

चौथा सवाल है कि, इन 21 प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स में कौन-कौन शामिल हैं? याचिका डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की ओर से दायर की गई है। इससे जुड़े प्रमुख समाचार संगठनों में अधिकांश बड़े समूह शामिल हैं।

पांचवां सवाल है कि सरकार के पास डेटा मांगने की शक्ति को लेकर चिंता क्या है? इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अधिनियम की धारा 36 और इससे संबंधित नियम 23 है। प्रकाशकों के अनुसार, इन प्रावधानों के तहत सरकार डेटा संभालने वाली संस्थाओं से जानकारी मांग सकती है और कुछ परिस्थितियों में उन्हें उस मांग के बारे में दूसरों को बताने से भी रोका जा सकता है।

उनकी चिंता है कि यदि पर्याप्त प्रक्रियागत सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी और न्यायिक समीक्षा नहीं हुई, तो इससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आने या उनके संचार की जानकारी उजागर होने का जोखिम पैदा हो सकता है। 
हालांकि, सरकार द्वारा जानकारी मांगने की शक्ति अपने आप में हर मांग को गैरकानूनी नहीं बनाती। वास्तविक प्रश्न यह है कि इस शक्ति के इस्तेमाल पर क्या सीमाएं हैं, उसका औचित्य कैसे तय होगा और उसके दुरुपयोग के विरुद्ध क्या उपाय उपलब्ध हैं?

छठा सवाल है कि क्या व्यक्तिगत निजता की रक्षा जरूरी नहीं है? निश्चित रूप से जरूरी है। इस विवाद में केवल मीडिया की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आम नागरिकों की निजता भी महत्वपूर्ण है। अब दोनों पक्षों के हित बारीकी पूर्वक समझिए: व्यक्तिगत निजता की रक्षा पत्रकारिता और जनहित-       
                         
एक, निजी जानकारी का अनधिकृत इस्तेमाल रोका जाए।  दो, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच हो।
तीन, निजी डेटा हटाने और सहमति से जुड़े अधिकार सुरक्षित रहें।
चार, जनहित की खबरों को अनुचित दबाव में न हटाना पड़े।     
पांच, नागरिकों को डेटा के दुरुपयोग से सुरक्षा मिले।
छह, गोपनीय समाचार सूत्रों की पहचान सुरक्षित रहे।
सात, डेटा संभालने वाले संस्थानों की जवाबदेही तय हो।   
आठ, सरकार और सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही भी बनी रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। अदालत ने मीडिया संगठनों से भी पूछा कि व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं।

सातवां सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट में अब तक क्या हुआ? तो यह जान लीजिए कि अगस्त, 2023, DPDP अधिनियम पारित। संसद ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए कानून बनाया।

नवंबर, 2025: नियम अधिसूचित। DPDP Rules, 2025 जारी हुए। उनका क्रियान्वयन अलग-अलग चरणों में निर्धारित किया गया।

27 अक्टूबर, 2026: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस दिया। अदालत ने सरकार से जवाब मांगा, लेकिन तत्काल अंतरिम रोक नहीं लगाई।

17 नवंबर, 2026: अगली सुनवाई निर्धारित। अदालत को कानून की संवैधानिक वैधता, पत्रकारिता संबंधी छूट और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन से जुड़े प्रश्नों पर आगे विचार करना है। इस विश्लेष्ण स्रोत सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें हैं।

अठवंत सवाल यह है कि, इस विवाद के व्यापक राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक मायने क्या हैं? इस मामले का महत्व केवल 21 मीडिया संगठनों तक सीमित नहीं है। इसके संभावित प्रभाव तीन स्तरों पर देखे जा सकते हैं:-

एक, लोकतंत्र: यदि जनहित की खबरों के लिए अत्यधिक कठिन शर्तें लागू होती हैं, तो सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।

दो, निजता: यदि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा कमजोर होती है, तो आम नागरिकों की निजी जानकारी का दुरुपयोग बढ़ सकता है।

तीन, डिजिटल अर्थव्यवस्था: स्पष्ट और व्यावहारिक नियम नागरिकों, मीडिया संस्थानों तथा तकनीकी कंपनियों के बीच भरोसा बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

प्रकाशकों की मांग पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा की है। दूसरी ओर, ऐसी छूट बनाते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मीडिया के नाम पर किसी नागरिक की निजी जानकारी का अनावश्यक खुलासा न हो।

वस्तूतः DPDP कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की रक्षा करना है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में पत्रकारिता और RTI पर पड़ने वाले प्रभाव गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाते हैं। आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीय समाचार सूत्रों और नागरिकों के जानने के अधिकार के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है।

इस मामले का अंतिम न्यायिक परिणाम अभी सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अदालत कानून को असंवैधानिक घोषित करेगी या उसमें बदलाव का निर्देश देगी।

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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