Great Nicobar Project राष्ट्रहित में है, इसका विरोध करना China का खुलकर समर्थन करने जैसा है

Great Nicobar Project
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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर छिड़ी बहस के बीच, इसे हिंद महासागर में चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति का मुकाबला करने और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मलक्का जलडमरूमध्य पर भारत की यह सामरिक बढ़त देश के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य के लिए एक निर्णायक कदम है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित विकास परियोजना को लेकर देश में तीखी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना को देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध और घोटाला बताया है। उन्होंने अपने दौरे के बाद कहा कि यहां के घने जंगल, जो सदियों में विकसित हुए हैं, अब बड़े पैमाने पर काटे जाने के खतरे में हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 160 वर्ग किलोमीटर वर्षावन क्षेत्र को समाप्त किया जाएगा और लाखों पेड़ों की कटाई होगी, जिससे स्थानीय आदिवासी समुदायों का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है। राहुल गांधी ने इसे विकास के नाम पर विनाश बताया और कहा कि वह इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे। उनका आरोप है कि स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना उनकी जमीन और संसाधनों को छीना जा रहा है। हम आपको याद दिला दें कि कांग्रेस की ओर से पहले भी इस परियोजना को लेकर चिंता जताई गई थी, जिसमें इसे शोंपेन जनजाति और द्वीप के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बताया गया। सोनिया गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए समाचार-पत्रों में एक विस्तृत लेख लिखा था।

दूसरी ओर, इस परियोजना को देश की सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नीति आयोग द्वारा तैयार और केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत इस योजना की लागत लगभग 81000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसमें चार प्रमुख घटक शामिल हैं, जिनमें एक विशाल ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, ऊर्जा संयंत्र और सैन्य ढांचे का विस्तार शामिल है। हम आपको बता दें कि ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे विशेष बनाती है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार के पास स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। चीन का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात और उसका बड़ा व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में भारत की मजबूत उपस्थिति उसे सामरिक बढ़त दिला सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि गैलेथिया खाड़ी में बनने वाला बंदरगाह भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में नई पहचान दिला सकता है। हम आपको बता दें कि वर्तमान में भारत का लगभग 25 प्रतिशत माल विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से स्थानांतरित होता है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है। इस परियोजना के पूरा होने पर भारत इस निर्भरता को समाप्त कर सकता है और अपनी समुद्री शक्ति को मजबूत कर सकता है।

चीन की रणनीति को देखते हुए यह परियोजना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पिछले दो दशकों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाह विकसित किए हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है। इनमें पाकिस्तान का ग्वादर, श्रीलंका का हम्बनटोटा और म्यांमार का क्याउकफ्यू शामिल हैं। इनका उद्देश्य समुद्री मार्गों पर प्रभाव बढ़ाना और भारत को घेरना है।

इसके जवाब में भारत ने भी अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर समुद्री रणनीति विकसित की है, जिसे नेकलेस ऑफ डायमंड्स कहा जाता है। इसमें ओमान, इंडोनेशिया और सेशेल्स जैसे देशों में बंदरगाहों तक पहुंच और सैन्य सहयोग शामिल है। ग्रेट निकोबार इस रणनीति का केंद्र बिंदु माना जा रहा है।

इसके अलावा, हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम भी इस परियोजना के महत्व को रेखांकित करते हैं। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य के उपयोग से वैश्विक तेल आपूर्ति पर प्रभाव डालने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समुद्री मार्गों पर नियंत्रण किसी भी देश के लिए कितना शक्तिशाली साधन हो सकता है। इस स्थिति में यदि भारत मलक्का जलडमरूमध्य के पास अपनी स्थिति मजबूत करता है, तो यह उसे वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बना सकता है।

मोदी सरकार का कहना है कि परियोजना को पर्यावरणीय और सामाजिक सुरक्षा मानकों के तहत स्वीकृति दी गई है। शोंपेन जनजाति की सुरक्षा के लिए विशेष नीतियां, निगरानी तंत्र और अन्य उपाय लागू किए गए हैं। सरकार के अनुसार परियोजना द्वीप के कुल क्षेत्रफल के सीमित हिस्से पर ही आधारित है और विकास तथा संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है। हम आपको यह भी बता दें कि इस परियोजना का विरोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है। कुछ विदेशी संगठनों ने इसे जनजातीय अस्तित्व के लिए खतरा बताया है। लेकिन इस परियोजना के रणनीतिक महत्व को देखते हुए यह साफ नजर आ रहा है कि चीन के समर्थक कभी नहीं चाहेंगे कि भारत की यह परियोजना साकार रूप ले सके।

उधर, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है और इस पर आगे बढ़ने का समय आ गया है। पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया ने विभिन्न साक्षात्कारों और समाचारपत्रों में अपने आलेखों के जरिये इस परियोजना की महत्ता पर प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा है कि विपक्ष के नेता ने हाल में इस द्वीप का दौरा किया और सोशल मीडिया के माध्यम से परियोजना को इकोलॉजी और पर्यावरण के विनाश का कारण बताते हुए एक बड़ा घोटाला और 'राष्ट्रीय धरोहर के खिलाफ अपराध' करार दिया। उन्होंने लिखा है कि पर्यावरण की चिंता होना स्वाभाविक है, लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और भविष्य की रणनीतिक दिशा की बात हो, तो तस्वीर का केवल एक हिस्सा देखना उचित नहीं लगता। यह परियोजना देश के भविष्य की एक सख्त सामरिक और आर्थिक आवश्यकता है।

आर.के.एस. भदौरिया लिखते हैं कि भारत लंबे समय तक अपनी सुरक्षा सोच में भूमि-सीमाओं पर अधिक केंद्रित रहा। हिंद महासागर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक शक्ति का केंद्र है। ग्रेट निकोबार का भूगोल अपने आप में भारत के लिए एक प्राकृतिक वरदान है। यह द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित है और स्ट्रेट ऑफ मलक्का के पश्चिमी प्रवेश द्वार से मात्र 40 समुद्री मील की दूरी पर है। इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया का लगभग 30% कंटेनर व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। उन्होंने लिखा है कि मैंने अपने कॅरियर में कई बार महसूस किया कि जब आपकी निगरानी की क्षमता सीमित होती है, तो आपकी प्रतिक्रिया भी सीमित हो जाती है। लेकिन जब आपके पास अग्रिम मोर्चे पर ठोस ढांचा हो यानि हवाई पट्टी, बंदरगाह, संचार प्रणाली आदि हो तो आप स्थिति को नियंत्रित करने की स्थिति में आ जाते है।

उन्होंने लिखा है कि ग्रेट निकोबार को अनसिंकेबल एअरक्राफ्ट कैरियर कहा जाता है। इसका मतलब है कि हमारे पास समुद्र के बीच एक ऐसा स्थायी ठिकाना होगा, जो किसी जहाज की तरह डूब नहीं सकता, लेकिन उसकी तरह काम कर सकता है। यहां से वायुसेना के विमान उड़ सकते हैं, नौसेना के जहाज संचालन कर सकते है और तीनों सेनाएं मिलकर एक संयुक्त रणनीति बना सकती है। अंडमान और निकोबार में पहले से ही त्रि-सेवा कमान है, लेकिन उसे आधुनिक और व्यापक ढांचे की जरूरत लंबे समय से महसूम की जा रही थी। उन्होंने लिखा है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे सबसे बड़े भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन का 60% से 75% ऊर्जा व तेल आयात इसी मलक्का कॉरिडोर से होकर गुजरता है। उन्होंने लिखा है कि बीजिंग में बैठे चीनी रणनीतिकार इसे अपनी सबसे बड़ी कमजोरी मानते है, जिसे वे 'मलक्का डिलेमा' कहते है। चीन दशकों से स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत हमारे पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और म्यामार के क्याउकफ्यू बंदरगाह में अपने सैन्य और दोहरे उपयोग वाले बेस बनाकर हमें घेरने की कोशिश कर रहा है। साथ ही वह थाईलैंड में 'क्रा कैनाल' बनाने की फिराक में है ताकि मलक्का स्ट्रेट को बाईपास कर सीधे हिंद महासागर में प्रवेश कर सके। ऐसे में ग्रेट निकोबार में एक मजबूत, आधुनिकीकृत और सैन्यीकृत उपस्थिति दर्ज करना चीन के इस विस्तारवादी चक्रव्यूह का सबसे सटीक, अचूक और 'हार्ड-पावर' जवाब है।

आर.के.एस. भदौरिया ने अपने आलेख में लिखा है कि बिना मजबूत अर्थव्यवस्था के कोई भी सेना लंबे समय तक युद्ध नहीं लड़ सकती। आर्थिक दृष्टिकोण से यह परियोजना भारत की दशकों पुरानी रसद और ढांचागत कमियों को दूर करने का एक अचूक उपाय है। मजबूत सप्लाई चेन, तेज लॉजिस्टिक्स और आत्मनिर्भर ढांचा, ये सभी किसी भी राष्ट्र की शक्ति को परिभाषित करते हैं। अगर हम अपने व्यापारिक मार्गों को मजबूत करते हैं, तो हम न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनते हैं। उन्होंने लिखा है कि आज वास्तविकता यह है कि भारत के 75% ट्रांसशिपमेंट कार्यों का प्रबंधन विदेशी बंदरगाहों, मुख्य रूप से श्रीलंका के कोलंबो (45%), सिंगापुर और मलेशिया के पोर्ट क्लैग द्वारा किया जाता है। दूसरे देशों के बंदरगाहों पर इस निर्भरता के कारण हमारे देश को हर साल 20 से 40 करोड़ डॉलर का भारी नुकसान उठाना पड़ता है और सप्लाई चेन में भी देरी होती है। ग्रेट निकोबार के गैलेथिया बे की टोपोग्राफी और भौगोलिक स्थिति दुनिया में अद्वितीय है। यहां समुद्र तट से मात्र एक नॉटिकल मील की दूरी पर 20 मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई उपलब्ध है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यहां दुनिया के सबसे बड़े अल्ट्रा लार्ज कटेनर जहाज, जो 10 हजार से 25 हजार TEU माल ढोते हैं, बिना किसी भारी और महंगी डेजिंग के आसानी से डॉक कर सकते हैं। गैलेथिया बे में 16.2 मिलियन TEU क्षमता का 'इंटरनैशनल कटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल' (ICTT) बनने से भारत विदेशी बंदरगाहों पर अपनी निर्भरता खत्म करेगा और स्वयं पूरे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्राथमिक वैश्विक व्यापार नोड बन जाएगा। इससे भारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही साथ इस क्षेत्र में । लाख से अधिक प्रत्यक्ष और 1.5 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा होंगे।

पूर्व वायुसेना प्रमुख ने लिखा है कि इस परियोजना के लिए द्वीप के कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82% हिस्सा ही डाइवर्ट किया जा रहा है। पर्यावरण मंत्रालय के मास्टर प्लान के तहत, ग्रेट निकोबार का 82% जंगल पूरी तरह से अछूता, संरक्षित और विकास कार्यों से मुक्त रहेगा। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) जैसी शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं के अध्ययन के बाद इसे मंजूरी मिली है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी परियोजना के विरोध में सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

उन्होंने लिखा है कि असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन राष्ट्रीय हितों को समझने के लिए हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। सीमा केवल जमीन पर नहीं होती। सीमा वहां भी होती है, जहां से हमारे जहाज गुजरते हैं, जहां से हमारी ऊर्जा आती है, और जहां से दुनिया हमें देखती है। उस सीमा पर मजबूत खड़े रहना केवल एक विकल्प नहीं, हमारी जिम्मेदारी है।

बहरहाल, अब यह स्पष्ट है कि यह परियोजना केवल एक बुनियादी ढांचा निर्माण योजना नहीं है, बल्कि भारत की भविष्य की रणनीतिक दिशा से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसे में इसका विरोध छोड़ कर सभी को इसका समर्थन करना चाहिए।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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