Supreme Court ने Digital Arrest पर जताई चिंता, बैंक लापरवाही पर मुआवजा देने का विचार

उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए हो रही वित्तीय धोखाधड़ी पर चिंता जताते हुए सवाल उठाया कि पढ़े-लिखे लोग भी फोन पर गिरफ्तारी के डर में कैसे फंस रहे हैं। अदालत ने कहा कि बैंकों को ग्राहकों के लिए सुरक्षा कवच बनना चाहिए और लापरवाही पाए जाने पर बैंक को पीड़ित को पूरा मुआवजा देना होगा। अटॉर्नी जनरल ने पीठ को बताया कि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ऐसे मामलों में पचास फीसदी की गिरावट आई है।
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए सवाल किया कि जन जागरूकता अभियान चलाए जाने, समाचार प्रकाशित होने और अदालतों के आदेशों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी के नाम पर ठगी का शिकार कैसे हो रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी में कहा, ‘‘इन पीड़ितों को क्या हो गया है? वे इस तरह जाल में कैसे फंस रहे हैं?
क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते? मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी का डर कैसा?’’ उन्होंने कहा, ‘‘मोबाइल को दीवार पर मार दीजिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी। लोगों के साथ कुछ गड़बड़ है।
भगवान जाने क्या है। लोकतांत्रिक देश में आप किस तरह के व्यक्ति हैं, अगर आपको लगता है कि मोबाइल फोन पर आपकी गिरफ्तारी हो रही है।’’ मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एन एस नप्पिनई ने अदालत को बताया कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों को रोकने के लिए कई कदम उठाए जाने के बावजूद ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं। उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताह ही एक महिला को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.5 करोड़ रुपये की ठगी का सामना करना पड़ा।
प्रधान न्यायाधीश ने आगे कहा, ‘‘क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते? मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी का डर कैसा? मोबाइल को दीवार पर मार दीजिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी।
लोगों के साथ कुछ गड़बड़ है। भगवान जाने क्या है। आप खुद को पीड़ित बना रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह देखकर निराशा होती है कि पढ़े-लिखे लोग भी ठगी का शिकार हो रहे हैं।
अगर इस उम्र में आप डिजिटल अरेस्ट के शिकार हो रहे हैं, तो अगली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे? लोग यह पता लगाने के लिए अदालत की वेबसाइट देख सकते हैं कि गिरफ्तारी का कोई आदेश है या नहीं।’’ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की सदस्यता वाली पीठ जाली दस्तावेजों से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की गई सुनवाई कर रही थी। यह मामला डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बड़े पैमाने पर की जा रही वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि बैंकों को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी के प्रति संवेदनशील ग्राहकों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम करना चाहिए। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने शीर्ष अदालत को बताया कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद डिजिटल अरेस्ट के मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने कहा कि बैंक अब संदिग्ध लेनदेन की पहचान कर रहे हैं और नियम बनाने के संबंध में उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ बैठकें की हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह ऐसे निर्देश देने पर विचार कर रही है, जिनके तहत डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी धोखाधड़ी में उचित सावधानी बरतने में बैंक की विफलता सामने आने पर उसे पीड़ित को मुआवजा देना होगा और अभियोजन का सामना भी करना पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम यह निर्देश देने का प्रस्ताव कर रहे हैं कि जहां भी ऐसी धोखाधड़ी होती है, बैंक पीड़ित को मुआवजा देगा और अभियोजन का सामना करेगा। ऐसा करना होगा।’’ पीठ ने कहा कि वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों के नुकसान की भरपाई के लिए बैंकों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
उसने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों के पीड़ितों को कम से कम उतनी राशि का मुआवजा मिलना चाहिए, जितना उन्हें नुकसान हुआ है, बशर्ते यह पाया जाए कि धोखाधड़ी वित्तीय संस्थान की उचित सावधानी बरतने में विफलता के कारण हुई।
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