SC/ST Act की Section 18A रहेगी बरकरार, Supreme Court ने खारिज की जनहित याचिका

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के अपने फैसले में इस संशोधन को पहले ही सही ठहराया था, जिसमें इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय भी बताए गए थे। याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से पेश वकील हरि शंकर जैन ने बेंच से 2020 के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून की धारा 18A भेदभावपूर्ण है और इसका दुरुपयोग हो सकता है; यह धारा अग्रिम ज़मानत पर रोक लगाती है और FIR दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और गिरफ्तारी से पहले मंज़ूरी लेने की ज़रूरत को खत्म करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। इस संशोधन ने कानून के तहत मामलों में गिरफ्तारी और अग्रिम ज़मानत से जुड़े कड़े प्रावधानों को फिर से लागू किया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के अपने फैसले में इस संशोधन को पहले ही सही ठहराया था, जिसमें इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय भी बताए गए थे। याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से पेश वकील हरि शंकर जैन ने बेंच से 2020 के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून की धारा 18A भेदभावपूर्ण है और इसका दुरुपयोग हो सकता है; यह धारा अग्रिम ज़मानत पर रोक लगाती है और FIR दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और गिरफ्तारी से पहले मंज़ूरी लेने की ज़रूरत को खत्म करती है।
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हालांकि, बेंच ने इस मामले पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि कथित गलत इस्तेमाल के अलग-अलग मामलों के आधार पर उस कानून पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता, जिसे पहले ही तीन जजों की बेंच सही ठहरा चुकी है। बेंच ने यह भी कहा कि अदालतें उन मामलों में दखल दे सकती हैं जहां कानूनी प्रावधानों का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल हुआ हो। इसके बाद PIL को खारिज कर दिया गया। याचिका में SC/ST एक्ट के कई प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि ये प्रावधान आर्टिकल 14, 21 और 22 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। याचिका में नागरिकों की जान, सम्मान और निजी आज़ादी की सुरक्षा के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी, साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल न हो। सैनी और 18 अन्य लोगों की ओर से दायर इस याचिका में एक्ट की धाराओं 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18A और 19 को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने FIR दर्ज करने और इस कानून के तहत आरोपी लोगों की गिरफ्तारी के मामले में सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश देने की मांग की है।
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याचिका में खास तौर पर धारा 18A को चुनौती दी गई है। इसे 2018 के संशोधन के ज़रिए जोड़ा गया था और इसमें प्रावधान है कि एक्ट के तहत FIR दर्ज करने के लिए किसी शुरुआती जांच की ज़रूरत नहीं है और गिरफ्तारी के लिए भी किसी पूर्व मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने 'सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में झूठे मामलों में फंसाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बाद में किए गए कानूनी संशोधन ने उन सुरक्षा उपायों को कमज़ोर कर दिया।
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