पंजाब में बेअदबी मामले पर जमकर होती है राजनीति, पिछले चुनाव में अमरिंदर ने पलटा था पासा

हाल के दिनों में पंजाब में बेअदबी के दो मामले सामने आए हैं। ऐसे में तमाम राजनीतिक दलों ने बेअदबी मामले में नाप-तौल पर ही अपनी बात रखी है और किसी ने भी लिंचिंग की आलोचना तक नहीं की। जिससे साफ-साफ समझा जा सकता है कि चुनाव के वक्त यह कितना संवेदनशील मुद्दा है।
चंडीगढ़। पंजाब समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बिगुल बज गया है। ऐसे में राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है क्योंकि कोरोना महामारी के बीच होने वाले चुनावों में फिजिकल नहीं वर्चुअल माध्यमों से नेता मतदाताओं को लुभाने की कोशिशों में जुट गए हैं। इसी बीच हम पंजाब की बात करेंगे, जहां पर सत्ता हमेशा कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के आस-पास ही रही है। साल 2017 में मोदी लहर के बावजूद अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि इस बार अमरिंदर सिंह खुद की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के साथ चुनावी मैदान में उतरे हैं।
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बेअदबी का मामला छाया
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कानून बनाने की कोशिशें भी हुईं ?
साल 2015 से राजनीति के केंद्र में बने बेअदबी मामलों को रोकने के लिए शिअद-भाजपा सरकार ने एक विधेयक पारित किया था। जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान करने वाले के खिलाफ आजीवन कारावास का प्रावधान था लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए इसे लौटा दिया था। इसके अलावा साल 2018 में कांग्रेस सरकार ने भी कोशिश की थी, जो सफल नहीं हुई।सिखों का मानना है कि बेअदबी मामले में अगर आरोपी को दोषी करार दिया भी जाता है तो उस पर आईपीसी की धारा 295 और 295ए लगती है। जिसमें अधिकतम 3 साल की सजा का प्रावधान है। जिसे सिख समुदाय पर्याप्त नहीं मानता है। अमृतसर और कपूरथला में हुई बेअदबी को लेकर सिख समुदाय काफी आक्रोशित है। ऐसे में राजनीतिक दल इसका फायदा उठाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।अन्य न्यूज़














