Kasturirangan Report पर कर्नाटक विधानसभा में प्रस्ताव पारित, मौजूदा प्रारूप खारिज

कर्नाटक विधानसभा ने पश्चिमी घाट के संरक्षण से जुड़ी कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को मौजूदा स्वरूप में नामंजूर करने का प्रस्ताव पारित किया है। सदन ने केंद्र सरकार से रिपोर्ट की खामियों को दूर करने की मांग करते हुए कहा कि बिना जमीनी सर्वेक्षण केवल उपग्रह आंकड़ों से सीमाएं तय की गई हैं। इससे राज्य के 10 जिलों के 1,449 गांवों के प्रभावित होने पर स्थानीय लोगों में भारी असंतोष है।
कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को एक प्रस्ताव पारित कर पश्चिमी घाट के संरक्षण पर बनी के. कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट को उसके वर्तमान स्वरूप में खारिज कर दिया। रिपोर्ट पर हुई एक विशेष चर्चा के अंत में पारित इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से इसमें मौजूद “कमियों” को दूर करने का आग्रह किया गया। सदन में प्रस्ताव पढ़ते हुए मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने कहा कि कर्नाटक में पश्चिमी घाट का इलाका राज्य के प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
प्रस्ताव में कहा गया, “भारत सरकार ने 27 जुलाई 2026 को कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर सातवीं पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) मसौदा अधिसूचना जारी की, जिसमें कर्नाटक के 10 जिलों के 1,449 गांवों में फैले लगभग 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसए के तहत वर्गीकृत किया गया है।” प्रस्ताव में कहा गया कि ईएसए के तहत गांवों में जंगलों के साथ-साथ खेती की जमीन, बागानों और लोगों के घरों तक को शामिल कर लिया गया है। वहीं, जमीन पर जाकर कोई संयुक्त सर्वेक्षण करने के बजाय केवल उपग्रह से एकत्रित आंकड़े के आधार पर ही सीमाएं तय कर दी गईं। इसमें कहा गया कि राज्य में ‘बगैर हुकुम’ (बिना मंजूरी के जोती जा रही जमीन) पर वन अधिकारों, आधिकारिक रूप से जंगल न होकर भी जंगल माने जाने वाले क्षेत्रों, जमीनों को वैध बनाने की प्रक्रिया, और इनसे जुड़ी अपीलों व अदालती मुकदमों के कई मामले पहले से ही लंबित हैं।
प्रस्ताव में कहा गया, “किसी गांव का पांचवां हिस्सा वन सीमा में आने के आधार पर पूरे गांव को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने से स्थानीय लोगों में गहरा असंतोष व्याप्त है।” कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में पश्चिमी घाट पर्वत शृंखला के लगभग 37 प्रतिशत यानी लगभग 56,825 से 60,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत कर उसके संरक्षण की सिफारिश की गई थी।
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