BCI विवाद: Delhi High Court ने कहा- FIR और जांच के लिए BNSS के तहत मजिस्ट्रेट जाएं

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अभिनय आकाश । Sep 21 2026 4:15PM

दिल्ली हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया परिसर में वकीलों पर हुए कथित हमले की सीबीआई जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के पास मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराने का कानूनी विकल्प उपलब्ध है। इसके अलावा, मामले में लगे आरोप असंज्ञेय अपराध के दायरे में आते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें 20-21 अगस्त की रात को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) परिसर में वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और CBI से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास मजिस्ट्रेट के सामने एक असरदार वैकल्पिक उपाय मौजूद था। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत शिकायत दर्ज कराकर संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं, इसलिए किसी एजेंसी को केस दर्ज करने और मामले की जांच करने का निर्देश देने वाली 'रिट ऑफ मैंडमस' (आदेश) जारी करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट वकील कुणाल यादव और अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को BCI परिसर के अंदर और बाहर वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

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याचिका में BCI परिसर के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और सौंपने, साथ ही BCI को याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई अर्ज़ी पर फ़ैसला लेने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, युवा वकीलों का एक समूह 20 अगस्त को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए BCI ऑफ़िस के बाहर इकट्ठा हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 25-30 लोग, जिनमें से कई वकील की वेशभूषा में थे, रात करीब 1.15-1.20 बजे परिसर में घुस आए और विरोध प्रदर्शन कर रहे वकीलों पर हमला कर दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह घटना पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुई। याचिकाकर्ताओं ने 22 अगस्त को IP एस्टेट पुलिस स्टेशन के SHO को शिकायत और BCI तथा दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को अर्ज़ी सौंपी थी। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ताओं ने BNSS के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार संबंधित DCP (जो सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के बराबर होता है) या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया था।

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कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं दिखाया गया जिससे यह साबित हो कि SHO लापरवाही या कार्रवाई न करने का दोषी था, और न ही याचिका में यह बताया गया कि कानूनी उपाय क्यों असरदार नहीं थे। कोर्ट ने आगे यह भी देखा कि क्या आरोपों से कोई ऐसा संज्ञेय अपराध (cognizable offence) बनता है जिसके लिए FIR दर्ज करना ज़रूरी हो। कोर्ट ने पाया कि उसके सामने रखी गई शिकायतों के आधार पर आरोप यह था कि शामिल लोगों ने बिना किसी हथियार का इस्तेमाल किए याचिकाकर्ताओं को पीटा, थप्पड़ मारा, बुरी तरह मारा-पीटा और घसीटा। जस्टिस कथपालिया ने कहा कि ऐसे आरोप ज़्यादा से ज़्यादा 'भारतीय न्याय संहिता' की धारा 114 के तहत चोट पहुँचाने का अपराध बनते हैं, जो एक असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) है। इसलिए, कोर्ट ने माना कि BNSS की धारा 174 के तहत, मजिस्ट्रेट ही शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए सही अधिकारी थे और ऐसे हालात में कोई पुलिस अधिकारी इस तरह के अपराध की जाँच नहीं कर सकता था।

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