विवादित पोस्ट मामले में Bombay HC ने पुणे की छात्रा पर दर्ज FIR की रद्द

बंबई उच्च न्यायालय ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी आपत्तिजनक पोस्ट दोबारा साझा करने के मामले में इंजीनियरिंग की 20 वर्षीय छात्रा पर दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि छात्रा ने खुद दो घंटे में वह सामग्री हटाकर सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त कर दिया था। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी प्रकाशन के अप्रिय होने के आधार पर आपराधिक अभियोजन नहीं चलाया जा सकता।
मुंबई उच्च न्यायालय ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद एक विवादित टिप्पणी री-पोस्ट करने के लिए 20 वर्षीय इंजीनियरिंग की छात्रा के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला मंगलवार को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह एक बार किया गया कृत्य था, जिसके बाद छात्रा ने स्वेच्छा से पोस्ट हटा दी और अपने कृत्य पर खेद जताया। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में एक मौका दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि छात्रा पहले ही हिरासत में रह चुकी है। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा, “एक युवा छात्रा के लिए यह अपने आप में ऐसा दाग है, जिसे आसानी से मिटाया नहीं जा सकता।” पुणे के एक निजी कॉलेज की छात्रा को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव से संबंधित विवादित इंस्टाग्राम पोस्ट री-पोस्ट करने के मामले में नौ मई 2025 को गिरफ्तार किया गया था। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि आरोपी एक युवा छात्रा है और यह घटना संभवत: युवावस्था के जोश के कारण की गई सामग्री को दोबारा साझा करने का एक बार किया गया कृत्य प्रतीत होता है, जिसके बाद उसने स्वेच्छा से पोस्ट हटा दी और खेद जताया।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि छात्रा मूल पोस्ट की लेखक या निर्माता नहीं थी। अदालत ने कहा, “यह पोस्ट निस्संदेह विवादास्पद है और इससे नफरत भड़क सकती है। हालांकि, याचिकाकर्ता (छात्रा) की भूमिका उक्त पोस्ट को री-पोस्ट करने तक सीमित है, जो पहले से ही सोशल मीडिया मंच पर उपलब्ध थी।” न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि छात्रा द्वारा दोबारा साझा की गई सामग्री धर्म और धार्मिक भावनाओं से संबंधित थी, इसलिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोगों वाले समाज में इस पर संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ विचार करने की जरूरत है।
आदेश में कहा गया, “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पोस्ट की सामग्री से धार्मिक समुदायों के बीच अशांति की आशंका पैदा हो सकती थी। हालांकि, किसी प्रकाशन से नाराजगी या असंतोष पैदा होने की महज संभावना अपने आप में आपराधिक अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकती।” अदालत ने कहा कि केवल इसलिए आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती कि किसी खास प्रकाशन को आपत्तिजनक माना जा रहा है। उसने कहा कि ऐसा तभी किया जा सकता है, जब संबंधित कृत्य कानून के तहत निर्धारित निषेध के दायरे में आता हो।
उच्च न्यायालय ने कहा कि छात्रा ने दो घंटे के भीतर अपनी पोस्ट हटा दी थी और सामग्री री-पोस्ट करने के लिए तुरंत सार्वजनिक रूप से खेद जताते हुए माफी भी मांगी थी। न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि यह ध्यान देने योग्य है कि पोस्ट हटाने का फैसला छात्रा ने खुद लिया था और ऐसा जांच एजेंसी के किसी निर्देश के कारण नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि यह छात्रा की ओर से धार्मिक शत्रुता को बढ़ावा देने का कोई जानबूझकर किया गया प्रयास नहीं था।
सात मई 2025 को छात्रा ने इंस्टाग्राम पर ‘रिफॉर्मिस्तान’ नामक अकाउंट से एक सामग्री री-पोस्ट की थी, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध भड़काने के लिए भारत सरकार की आलोचना की गई थी। दो घंटे के भीतर उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और धमकियों की बौछार के बाद उसने पोस्ट हटा दी। छात्रा ने अपनी कथित आपत्तिजनक पोस्ट के कारण संस्थान से अस्थायी निष्कासन के फैसले को भी चुनौती दी थी।
उसने इस कार्रवाई को “मनमाना और गैरकानूनी” बताया था। उसने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध भी किया था। उच्च न्यायालय ने पिछले साल मई में छात्रा की गिरफ्तारी की आलोचना की थी और उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था।
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